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कर्नाटक में सियासी संकट का अंत था जरुरी

  • Updated on 7/24/2019

नई दिल्ली/कुमार आलोक भास्कर। राजनीति में अनिश्चितता अच्छी बात नहीं है। इसका ताजा उदारहण कर्नाटक की राजनीति में पिछले 1 महीने से चल रही भूचाल से स्पष्ट हो गया है। सबसे ज्यादा तो राज्य की जनता उबाउ हो गई और यह सोचने को मजबूर हो रही थी कि सरकार बनती हो क्यो है। इसे विडंबना ही कहा जा सकता है कि सरकार के बनते ही तलवार लटक रही थी- कि अब गिरी तो तब गिरी। 


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संविधान का हवाला देकर होती रही गलतियां
लंबे समय तक भारतीय राजनीति में इस सरकार की चर्चा की जाएगी कि आखिर अल्पमत में रहते हुए भी किस तरह सीएम विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने से भागती रही। सीएम को बचाने के लिए किस तरह विधानसभा अध्यक्ष संविधान का हवाला देकर बार-बार विधानसभा को आहुत करने से  बचने के लिए नए-नए पैंतरा गढ़ते रहे। इस सरकार को इसलिए भी याद किया जाएगा गठबंधन सरकार के गठन के साथ ही देश के विपक्षी नेताओं को एक बार तो संजीवनी दे दी थी।

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पिछले साल सभी विपक्षी दल हुए थे एकजुट

मई 2018 में जब मोदी सरकार अपना चौथा कार्यकाल के पूरे होने पर जश्न मना रही थी तो सुदूर दक्षिण के राज्य कर्नाटक में सभी विपक्षी दलों के नेता, बड़े-बड़े सुरमा बंगलोर में एकत्रित हो रहे थे। जहां से मोदी सरकार को एकजुट होकर संदेश भी दे रही थी और सरकार के उल्टी गिनती का दम भी भर रही थी। यह तो सच है कि विपक्ष को एकजुट करने में कुमारस्वामी सरकार ने पहला कदम तो बढ़ा ही दिया था।


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राज्य के हालात के लिए कौन जिम्मेदार

लेकिन यह विपक्ष का दुर्भाग्य ही था कि लोकसभा चुनाव के आते-आते यह एकजुटता हवा में तैरने लगी। लेकिन जो राज्य की राजनीति में घटित हो रहा है उसके लिए कौन जिम्मेदार है। सत्ताधारी की कहानी तो यही हैं कि आखिर विधानसभा में सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी बीजेपी जब विधानसभा में बहुमत हासिल नहीं कर सकी तो कांग्रेस ने जिसके 78 विधायक थे, जेडीएस के 38 विधायकों के साथ मिलकर सरकार तो बना ली। कुमार स्वामी सीएम भी बने, लेकिन स्थिर सरकार देने में नाकामयाब रहे।

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बीजेपी को खुद आईना देखने की जरुरत

उधर खुन्नस खाए बीजेपी और उसके नेता येदुरप्पा ने भी कुमारस्वामी सरकार को गिराने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। जिसकी भी चर्चा भी जरुरी है। लोकतंत्र आखिर किधर जा रहा है। अगर यह सरकार स्वाभाविक तरीके से गिर जाती तो अलग बात थी। लेकिन जिस तरह से हर हथकंडे अपनाए गये वो भी सवालों के घेरे में है। कैसे कुमारस्वामी सरकार के विधायकों के टुकड़े-टुकड़े को उठाकर मुंबई के आलीशान होटल में ठहराया गया। फिर तो हर दिन नाटक ही चलती रही। जो आज शाम जाकर कुमारस्वामी के इस्तीफे के साथ खत्म हुई है। कभी सुप्रीम कोर्ट को भी हस्तक्षेप करना पड़ा। 

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सियासी ड्रामा का लंबा खींचा जाना उचित नहीं

लेकिन विचार तो करना पड़ेगा कि अगर सरकार अल्पमत में है तो सियासी ड्रामा को लंबा भी खींचा जाना उचित नहीं है। साथ ही विपक्ष को भी  किसी गठबंधन सरकार को गिराने के तरकीब से बचना चाहिए। ज्यादा अच्छा होता कि यदि बीजेपी अपना हाथ नहीं जलाती और कुमारस्वामी सरकार अपने बोझ तले खुद ही गिर जाती। कारण लोकसभा में जिस तरह से 28 सीट जीतकर राज्य की जनता ने बीजेपी की झोली भर दी थी उसके सामने इस तरह के गैरजिम्मेदाराना हरकत से पार्टी की ही फजीहत होती है।


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कमजोर बुनियाद पर  बनेगी अगली सरकार 

वैसे भी लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस और जेडीएस के बीच अंदरखाने में सब कुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा था। दोनों दलों के समर्थकों के भी स्वाभाविक रुप से विरोधी होने से सरकार बनाने के बाद से ही उठापठक चल रही थी। इसलिए स्वाभाविक रुप से बीजेपी दावेदार ही होती। अब आगे देखना दिलचस्प होगा कि अगर येदुरप्पा के नेतृत्व में बीजेपी तकी सरकार बनती है तो कितनी स्थिर सरकार बन पाएगी। क्योंकि जिसकी बुनियाद ही कमजोर तैयार हो गई है उसके भी स्थिरता पर सवाल तो उठते रहेंगे।             

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