Thursday, Jan 20, 2022
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आखिर जोधपुर के राजा आजादी के बाद पाकिस्तान में रियासत को क्यों मिलाना चाहते थे? जानें वजह

  • Updated on 12/1/2020

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। देश जब आजाद हुआ तो कई ऐसे रियासतों के राजा थे जो अलग और स्वतंत्र राज्य बनाने की मांग रखा। यानी ये सभी राजा भारत और पाकिस्तान में  मिलने के लिये स्वतंत्र थे। साल 1947 में आजादी मिलने के साथ ही मुगल और अंग्रेजों का सूरज अस्त हो चुका था। लेकिन राजाओं ने स्वतंत्र राज्य बनने के सपने नहीं छोड़े थे। ऐसा ही एक वाकया राजस्थान के जोधपुर रियासत के राजा हनवंत सिंह का भी है। जो काफी दिलचस्प भी है।

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बता दें कि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के करारों के मुताबिक राजाओं को भारत और पाकिस्तान में मिलने की छूट प्राप्त थी। राजस्थान के 22 रियासतों में मात्र अजमेर रियासत ही अंग्रेज के अधीन था। जो आजादी के साथ ही भारत का हिस्सा बन गया। लेकिन बाकी 21 रियासतों को मिलाना आसान नहीं था। कारण इन रियासतों के राजाओं के महात्वाकांक्षा आसमान को छूने को बेताब थी।  

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इसी कड़ी में जोधपुर के राजा हनमंत सिंह ने पाकिस्तान में शामिल होने को लेकर गंभीरता से विचार भी शुरु कर दिया। यहां तक कि जिन्ना के साथ मिलकर कुछ शर्तें भी रखी। जिसे पर जिन्ना भी तैयार हो गए। लेकिन ऐन वक्त पर उदयपुर के महाराज ने हनमंत सिंह को आगाह किया कि जब रियासत को शामिल करने का प्रस्ताव है तो उसे भारत में शामिल करें। उन्होंने स्पष्ट किया कि एक हिंदू शासक भारत के साथ मिलकर ज्यादा सुख-शांति के साथ रह सकता है। जिसके बाद हनमंत सिंह ने भी अपना रुख बदल लिया। फिर इस तरह भारत-संघ के विलय पत्र पर 1 अगस्त 1949 को हस्ताक्षर कर अपने रियासत को भारत में विलय कर दिया।  

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