Wednesday, Dec 11, 2019
the public is watching all the head of the capital will look like taj

पब्लिक तो सब देख रही है, राजधानी में किसके सर लगेगा ताज!

  • Updated on 7/19/2019

नई दिल्ली/कुमार आलोक भास्कर।  जी हां। स्टेज तैयार हो रहा है। बस पर्दा उठने का इंतजार कीजिए। राजधानी में फिर से राजनीति की धड़कन तेज होने वाली है। लोकसभा चुनाव से ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं। लगभग रोज मीडिया को बुलाकर, पीसी सजाकर, तिवारी साहब सीएम अरविंद केजरीवाल पर एक से बढ़कर एक खुलासा कर रहे है। कभी बच्चों के स्कूल के क्लास बनाने में घोटाला, तो कभी बिजली कंपनी को सब्सि़डी का मामला हो, तिवारी जी आते है ऐसे जैसे कि आज तो केजरीवाल सरकार को उखारकर फैंक ही देंगे। लेकिन जाने समय यह बताना नहीं भूलते कि पब्लिक सब देख रही है।

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प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी भी अब गायक से राजनीतिज्ञ होते जा रहे है। अब गाना भी नहीं गाते है। पहले जब राजनीति में धीरे-धीरे कदम रख रहे थे तो चुनाव में मतदाता से वोट की अपील करते तो पहले पब्लिक गाना गाने की अपील कर देते। तिवारी जी के गाने पर ही पब्लिक ताली बजाकर अपना सपोर्ट भी कर देता। लेकिन अब तो तिवारी राजनीति में फिसल गए है जब से अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली है। जनता के बीच उठना-बैठना पड़ता है तो गाना भी भूल गए है।

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अब तो सीधा सीएम अरविंद केजरीवाल पर वार, प्रहार से मैदान जीत लेना चाहते है। उनके पीछे मोदी है तो आगे पब्लिक है। लेकिन जब वे अध्यक्ष है तो उन्हें यह याद रखना चाहिए कि जिस केजरीवाल से दो-दो हाथ करने को कभी- भी तैयार हो जाते है। उसके पिछले इतिहास को भी पलटिए। खुद इतिहास के छात्र रहे तिवारी को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी बस 2006 से केजरीवाल के पहले कदम और फिर 2011 से तेज कदम का विश्लेषण ईमानदारी से करना पड़ेगा।Navodayatimes

यहीं नहीं जनसंघ के जमाने में भी दिल्ली में बीजेपी की एक समय अच्छी पकड़ हुआ करती थी। यहां तक कि 1993 में विधानसभा के चुनाव में बीजेपी की सरकार भी मदनलाल खुराना के नेतृत्व में बना था। लेकिन इस बीजेपी का दुर्भाग्य देखिए कि महज 5 साल में यानी 1998 तक 3 सीएम हो गए। जो उस समय पार्टी की अंदरुनी खटपट की ओर इशारा करती है। लेकिन यह भी सच है कि पार्टी की यही भीतरी लड़ाई सत्ता के करीब पहुंचने पर भी दूर चली जाती है। उस समय तो प्याज ने पार्टी को ऐसा रुलाया कि सत्ता से ही बाहर कर दिया। 

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फिर शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने अगले 15 साल तक राज किया। बीजेपी सड़क पर कभी आंदोलन करती कि शीला को भगाएंगे, बीजेपी को लाएंगे। लेकिन आज तक पार्टी फिर से सत्ता पाने के लिए तरस ही रही है। क्यों न हो, अब इस शीला को भगाओ, बीजेपी को लाओ के पार्टी के संघर्ष का हवा निकाल दिया केजरीवाल साहब ने। 

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धमाकेदार राजनीति में Entry करके 2013 में अरविंद केजरीवाल ने बीजेपी के सामने से सजे प्लेट को उड़ा ले गया। वो एक कहावत है कि मुंह का निवाला खींच लेना। उसी तर्ज पर केजरीवाल ने बीजेपी को निराश कर दिया। लेकिन फिर से 2015 के चुनाव में तो केजरीवाल करिश्मा ही कर दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी सात पर सात सीट जीतकर 'How is the josh' के थीम पर नाच ही रही थी कि यह उबाल भी ज्यादा दिन नहीं चला वैसे ही जैसे चाय की प्याली में तूफान आती तो है लेकिन जल्द ही थम जाती है। 

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प्रदेश दिल्ली बीजेपी के नेताओं की किया बिसात यहां तक कि मोदी और शाह के चमत्कार ने भी केजरीवाल के तेज कदम को रोकने में नाकामयाब रहा। आप पार्टी ने इतिहास रचते हुए 70 विधानसभा सीट में से 67 सीट जीतकर बीजेपी को सन्न कर दिया। वैसे ही जैसे कभी-कभी हाथ-पैर सुन्न हो जाते है। लेकिन समझ में नहीं आता कि आखिर ऐसा क्यो हो रहा है।
अब फिर से बीजेपी तैयार हो गई है केजरीवाल सरकार को जड़ से उखाड़ फैंकने के लिए, लेकिन तैयारी कितनी है पार्टी की कभी ओर लिखेंगे।
 

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