Friday, Jul 01, 2022
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The wall of mistrust is higher than the wall of China between india and dragon ALBSNT

चीन की दीवार से भी ऊंची है अविश्वास की दीवार, न भरे जख्म तो जारी रहेगी तकरार

  • Updated on 6/30/2020

नई दिल्ली/कुमार आलोक भास्कर। भारत (India) और चीन के बीच विवाद गहराता जा रहा है। हालिया खूनी संघर्ष के बाद दोनों देशों की सेना जिस तरह से आपस में भिड़ी और उसके बाद देश भर में चीनी सामानों के बहिष्कार की मुहिम ही चल चुकी है। इसके बाद ऐसा लगता है कि शायद ही बातचीत का कई दौर चले लेकिन जो अविश्वास का दीवार बीते 15 दिनों में पैदा हुआ उससे जख्म लंबे समय तक हरे रहेंगे। इसमें अब कोई दो राय नहीं रहा। लेकिन सवाल पैदा होता है कि आखिर बार-बार यह विवाद पैदा क्यों हो रहा,दूसरा चीन के सामने भारत किस तरह की चुनौती पैदा कर दी है?

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पीएम नरेंद्र मोदी को मिला विपक्षी दलों का साथ

इन सवालों के जवाब जानने के लिये पहले पूर्वी लद्दाख के इन इलाकों को जानना होगा जहां से विवाद पैदा हुआ है। भले ही देश के अंदर पीएम नरेंद्र मोदी को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश में कांग्रेस जी-जान से जुटी हो और सवाल पर सवाल दाग कर असहज करने की मुहिम ही छेड़ दी है। लेकिन पीएम मोदी को तब बड़ी राहत मिली जब शरद पवार और तमाम विपक्षी दलों ने  मौजूदा चीन के तरफ से पैदा किये गए चुनौतियों के क्षण में एकजुटता जाहिर किया उससे कांग्रेस पार्टी ही अलग-थलग पड़ गई है।  

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भारतीय सेना ने दिया करारा जवाब

वहीं पूर्वी लद्दाख के इन गलवान घाटी और पेंगोंग झील पर पैदा हुए विवाद की बात करें तो भारतीय सेना चीनी सेना से उन्नीस नहीं बीस ही साबित हो रही है। इसमें भी किसी को संदेह नहीं होना चाहिये। एक तरफ भारत ने अपने 20 शहीद जवानों को नम आंखों से विदाई दी तो चीन ने चीनी सैनिकों के मारे जाने तक सूचना उनके परिवारों को नहीं दी। जिससे चीन के भीतर ही असंतोष पैदा हो गया है। यह खोखली और कम्यूनिस्ट पार्टी की अपने देश को पूरे विश्व से बंद करने की कोशिश तब हो रही है जब पूरी दुनिया में सूचना की आवाजाही तेज गति से हो रही है।

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विदेश नीति और रक्षा नीति पर एक सुर जरुरी

ऐसे में भारत के सभी दलों को विदेश नीति और रक्षा नीति पर एक सुर से सुर मिलाते हुए आवाज उठानी चाहिये कि चीन के साथ तभी आर्थिक गतिविधि सामान्य होगी जब सीमा पर शांती रहे और दूसरा यह बंद देश अपने देश को दुनिया के लिये सूचना क्रांति के जरिये पूरी तरह खोले। इस मुहिम में सभी देशों का सहयोग लेना चाहिये।

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भारत फिंगर-4 से हटने को राजी नहीं

अब जब विवादित जगह की बात करेंगे तो सबसे पहले हमारे सामने पैंगॉन्ग झील के फिंगर-4 से भारतीय सेना पीछे एक इंच नहीं हटने को राजी है। तो वहीं भारत ने एक कदम आगे बढ़ते हुए दावा कर दिया है कि फिंगर-4 हमेशा से भारत के अधिकार क्षेत्र में रहा है,यहां से पीछे हटना नामुमकिन है। साथ ही भारत ने दावा किया है कि  फिंगर-8 पर ही LAC है। जबकि दोनों देशों के बीच दूसरा विवाद पीपी- 14 को लेकर है। भारत फिर से दावा करता है कि यहीं पीपी-14 पर से ही LAC गुजरता है।

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LAC पर कैंप गाड़ना संधि का उल्लंघन

आप यहां यह ध्यान रखें कि यहीं पीपी-14 हैं जहां जब हिंसक झड़पे हुई तो उसे खूनी होने में देर नहीं लगी। भारत इसी पीपी-14 पर जब बातचीत के लिये अस्थाई तौर पर कैंप बनाया गया था उसे ही हटाने के लिये चीनी सैनिक से कहा था। क्योंकि दोनों देशों के बीच पहले से ही समझौता है कि LAC पर पेट्रोलिंग के लिये दोनों सेनाएं जाएगी लेकिन कोई भी देश यहां अपना कैंप नहीं लगा सकता। 

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विवाद के हैं कई और क्षेत्र 

यहीं नहीं चीन गलवान घाटी और पैंगॉन्ग झील के अलावा चुमार, डेपसांग, डेमचोक, गोगरा, ट्रीग हाईट्स पर LAC के नजदीक कैंप गाड़ने के फिराक में रहती है। जबकि भारत उसे हटाने के लिये दवाब बनाता है तो झड़पें हमें सुनने को मिलती है। लेकिन इतना साफ है कि भारतीय सेना के शौर्य पर पूरे देशवासियों को गर्व है। जिस तरह से LAC पर चीनी सैना के खिलाफ डटकर मोर्चा लिया है वो प्रशंसनीय ही नहीं है बल्कि बेहद संतोष भी किया जा सकता है।

 

 

 

 

 

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