Saturday, Jul 31, 2021
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there was a stir in the last fort of left parties questions raised on vijayans decision albsnt

वाम दलों के आखिरी किले में मची हलचल, विजयन के फैसले पर उठे सवाल

  • Updated on 5/20/2021

नई दिल्ली/कुमार आलोक भास्कर। अभी हाल के संपन्न विधानसभा चुनाव में वाम दलों ने उम्मीद के मुताबिक अपने आखिरी किला केरल में सरकार बनाने में सफलता हासिल की है। हालांकि कभी  पश्चिम बंगाल में वाम दलों का डंका बजता था। ज्योति बसु से लेकर बुद्धदेव भट्टाचार्य तक ने बंगाल को अभेद किला बनाकर रखा। लेकिन इस बार के विधानसभा चुनाव में यह पार्टी कांग्रेस की ही तरह शून्य पर सिमट गई।

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खैर पिनलई विजयन के नेतृत्व में केरल में पार्टी ने दुबारा सरकार बनाने में कामयाबी हासिल की। लेकिन कहते है कि सत्ता जब सर पर सवार हो जाती है तो अपने साथ कई बार बुराईयां भी लाती है। आज इसका अपवाद वाम दल भी नहीं रहा है। राज्य में सीएम विजयन विरोधी दलों समेत अपने ही पार्टी के निशाने पर है।

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दरअसल सीएम ने एक अभूतपूर्व फैसला लेते हुए शैलजा जैसे लोकप्रिय मंत्री को अपने मंत्रीमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया तो वहीं अपने दामाद को मंत्री बनाकर विवादों में फंस गए है। हमेशा से वाम दल समाज और राजनीति में एक आदर्श बनने की परिकल्पना की पैरोकारी करने के लिये जानी जाती रही है। लेकिन अन्य दलों की तरह भाई-भतीजावाद,आंतरिक लोकतंत्र की कमी जैसे महामारी से यह दल भी अब अछूता नहीं रहा है।

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भले ही केरल में दुबारा विजयन के नेतृत्व में सरकार बन गई हो लेकिन वाम दलों के विचारधारा के साथ जिस तरह से उन्होंने समझौता किया उससे वे कटघरे में खड़े है। राज्य के वाम दलों के नेताओं से लेकर पार्टी के शीर्ष नेताओं तक विजयन के इस फैसले से नाराजगी बताई जा रही है। हालांकि पार्टी सूत्रों की मानें तो पार्टी नेतृत्व फिलहाल विजयन पर शिकंजा न कसें लेकिन आने वाले दिनों में सही समय पर एक्शन लेने से भी नहीं चूकेगी।

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मालूम हो कि वाम दलों के नेता लगातार पार्टी के सिमटते जनाधार से चिंतित है। खासकरके पश्चिम बंगाल में इस बार के विधानसभा चुनाव में खाता भी नहीं खुलने से पार्टी सकते में है। एक तरफ वाम दल अपनी विचारधारा से बेरुख नेताओं को फिर से जनता से जमीनी तौर पर जुड़े रहने की सलाह दे रही है,ताकि देश में बीजेपी के खिलाफ माहौल तैयार कर सकें। लेकिन जिस तरह से पार्टी के वरिष्ठ नेता ही विचारधारा के साथ समझौता करने पर उतारु है निश्चित रुप से पार्टी के लिये अच्छे संकेत नहीं है।

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पार्टी की चिंता है कि केरल को एक मॉडल राज्य की तरह पेश करके देश भर में वाम दलों के प्रति आकर्षण पैदा कर सकें। वैसे विजयन की लोकप्रियता अभी-भी बरकरार है। उन्होंने जनता के हित में कदम उठाकर जनमानस के दिल को जीतकर दुबारा सत्ता हासिल की है। लेकिन उनके कंधे पर अब सवार होकर पार्टी दूसरे राज्यों में भी सत्ता हासिल करने का सपना देखती है तो इसमें कोई गलत भी नहीं है। इसके लिये विजयन को पार्टी की विचारधारा पर लगातार चलने का साहस भी दिखाना होगा। लेकिन सवाल उठता है कि विजयन इसके लिये कितने तैयार है?

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