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बिहार : हर साल बाढ़ के बाद आती है ये भयंकर बीमारी, इलाज की नहीं है कोई व्यवस्था

  • Updated on 7/26/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। बिहार के 12 जिलों की जनता बाढ़ आने के बाद एक गंभीर मनोवैनिक बीमारी से जूझती है। इस खतरनाक बिमारी का नाम पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर है। आईए विस्तार से जानते हैं इस बिमारी के प्रकोप के बारे में ...   

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बाढ़ आने से जान व माल का नुकसान तो होता ही है, परन्तु इसका दूरगामी मनोवैज्ञानिक असर भी अत्यंत गंभीर होता है। बाढ़ के बाद प्रभावित क्षेत्र में 'पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर' (PTS Disorder) का खतरा बढ़ जाता है। वहीं शुरुआत में इसके लक्षणों का पता नहीं चल पाता है। इसके बावजूद हैरान करने वाली बात ये है कि बाढ़ से प्रभावित इलाकों में सरकार व प्रशासन का इस पर बिल्कुल ध्‍यान नहीं है। 

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क्‍या है पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर
बाढ़ के बाद प्रभावित लोगों के मन पर होने वाले असर के कारण पैदा होने वाला मनोविकार ही पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस (पीटीएस) डिसऑर्डर कहलाता है। बाढ़ में जानमाल एवं खेती में हुए नुकसान के बाद इसका गहरा असर देखने को मिलता है। यह बिमारी मुख्य रुप से महिलाओं में अधिक होती है। इस बिमारी के शुरुआती लक्षणों में नींद में कमी, झुंझलाहट, उदासी तथा व्यवहार परिवर्तन आदि है, जिससे इसकी पहचान की जा सकती है।

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बाढ़ग्रस्‍त क्षेत्रों में अभी से दिखने लगे मामले
मुजफ्फरपुर में रहने वाली तेतरी देवी का मकान बाढ़ में बह गया है। जिससे उनके पूरे परिवार के पास कोई सामान नहीं बचा है। और इस पर वे कहतीं हैं कि जिंदगी बोझ लगने लगी है।

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मोतिहारी के रवि साव के पूरे जीवन की कमाई उनके घर के साथ बाढ़ में बह गई है जिसके बाद उन्‍हें अपनी बेटी की शादी की चिंता हो रही है। बाढ़ की त्रासदी झेल रहे अन्य कुछ व्यक्ति दिन-रात बड़बड़ाते नजर आ रहे हैं। बिहार में बाढ़ से प्रभावित ईलाकों में मनोवैाज्ञानिक असर के ऐसे सैकड़ों उदाहरण लगातार देखने को मिल रहे हैं। 

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सरकार द्वारा अब तक कोई योजना नहीं
बिहार के कटिहार में क्लिनिकल साइकोलोजिस्‍ट के पद पर तैनात डॉ. राकेश कुमार के अनुसार ऐसे मामलों में काउंसेलिंग एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर इलाज करवाना अत्यंत जरूरी होता है, लेकिन सरकार द्वारा ऐसी कोई योजना अब तक नहीं है। 

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शुरुआत में किया जाता है नजरअंदाज 
पटना की क्लिनिकल साइकोलोजिस्‍ट डॉ. बिंदा सिंह ने जानकारी देते हुए कहा कि इस बीमारी के की खास बात यह है कि लागों द्वारा शुरुआत में इसे यह सोचकर नजरअंदाज किया जाता है कि धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। परन्तु ऐसे मामलों में लंबे समय तक मनोवैज्ञानिक सलाह व उपचार न मिलने की वजह से ये बीमारी धीरे-धीरे गंभीर रूप धारण कर लेती है।

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मानसिक इलाज की नहीं कोई व्यवस्था
आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा बाढ़ से निपटने के लिए राहत कार्य चलाने के साथ अनुदान राशि का भुगतान भी होता है। लेकिन मानसिक दबाव से राहत के लिए सरकार की कोई विशेष नीति नहीं है। हालांकि केरल, महाराष्ट्र सहित अन्य राज्यों में किसी भी आपदा के बाद लोगों को अनुदान देने के साथ ही आपदा के कारण मानसिक दबाव से उबरने के लिए काउंसेलिंग की व्यवस्था भी की जाती है परन्तु बिहार में अब तक ऐसी कोई मुहीम चालु नहीं की गई है।

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