RLD के सामने झुक कर राष्ट्रीय छवि चमकाने के साथ जाट वोट बैंक को लुभाने की जुगत में अखिलेश!

  • Updated on 1/17/2019

नई दिल्ली/अमरदीप शर्मा। आगामी लोकसभा चुनाव के लिए शंखनाद हो चुका है। सभी राजनीतिक पार्टियों ने इसके लिए कमर कस ली है। इस महासंग्रास में ऐसा लग रहा है कि एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी के साथ भारतीय जनता पार्टी अकेली खड़ी नजर आ रही है तो दूसरी और तमाम दल एक साथ होकर बीजेपी के विजय रथ को थामने की जद्दोजदह में लगे हुए हैं।

यूपी में तो 25 साल से लगातार एक दूसरे के धुर विरोधी माने जाने वाले सपा-बसपा ने एक साथ आकर इस बात को सिद्द कर दिया है कि राजनीति में सब जायज है। इस बात से सब इत्तेफाक रखते हैं कि दिल्ली के किले तक पहुंचने के लिए यूपी के दंगल को जीतना बेहद जरुरी है। इस परिस्थिति को देखते हुए सपा और बसपा एक साथ आ गए हैं।

यूपी में सपा-बसपा- रालोद एक साथ

यूपी में  समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी ने 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। इस बात का ऐलान मायावती और अखिलेश यादव ने एक साथ साझा प्रेस कॉफ्रेंस करके किया। इस गठबंधन में कांग्रेस को शामिल नहीं किया गया था। हालांकि उसके लिए दरियादिली दिखाते हुए अमेठी और रायबरेली की सीटों पर प्रत्याशी नही उतारने का फैसला लिया है। इसके अलावा 2 सीटें और खाली छोड़ दी थी।

जिसमें कयास लगाए जा रहे थे कि राष्टीय लोकदल को इन दो सीटों पर चुनाव लड़ाकर गठबंधन में शामिल किया जा सकता है। हालांकि रालोद को 2 सीटें मंजूर नहीं थी। जिसके चलते उन्होंने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ चर्चा की। अखिलेश ने भी जयंत के लिए अपना दिल खोल दिया और अपने हिस्से की एक सीट पर  रालोद का प्रत्याशी उतारने का आश्वासन दे दिया। खबर मिल रही है कि मथुरा की लोकसभा की सीट पर रालोद का प्रत्याशी उतरेगा। 

अखिलेश ने क्यों छोड़ी मथुरा सीट

मथुरा जाट बाहुल्य क्षेत्र है। इस लिहाज से उसे लोकदल का गढ़ भी कहा जाता है। हालांकि पिछले चुनाव में मोदी लहर की आंधी में खुद जयंत चौधरी बीजेपी की प्रत्याशी हेमामालिनी से हार गए थे। पिछले चुनावों का समीकरण इस बार नहीं लगाया जा सकता है। वक्त काफी बदल गया है। जिसके चलते रालोद ने मथुरा सीट की मांग की है। उम्मीद लगाई जा रही है कि इस बार भी खुद जयंत चौधरी इस सीट पर चुनाव लड़ सकते हैं। हालांकि अखिलेश यादव की रालोद के प्रति दरियादिली के कई राजनैतिक समीकरण निकाले जा रहे हैं। तो चलिए हम कुछ ऐसे ही पहलुओं पर चर्चा करते हैं कि आखिर क्यों झुके अखिलेश यादव। 

राष्ट्रवादी नेता की छवि बनाना

समाजवादी पार्टी काफी लंबे समय से उत्तर प्रदेश में एक बड़ी पार्टी बनी हुई है। मुलायम सिंह यादव ने सपा के गठन के साथ ही यूपी में अपनी धाक जमा ली थी। कई बार वे प्रदेश के मुखिया भी चुने गए। लेकिन पार्टी ने इतने समय में भी यूपी के बाहर कोई कमाल नहीं दिखा पाया। जब 2012 में यूपी के विधानसभा चुनाव जीतने के बाद अखिलेश को सीएम बनाया गया तो नए उदय की उम्मीद जगी। हालांकि इसके बाद 2014 में मोदी लहर के सामने सपा, बसपा, कांग्रेस और लोकदल बेबस ही दिखे। बसपा अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी, जब्कि कांग्रेस 2 और सपा महज 5 सीटों पर सिमट कर रह गई।

यही कारण रहा कि 2019 में चुनाव के लिए अखिलेश यादव काफी समय से गठबंधन करने को आतुर दिखे।  इसके लिए वे कई बार ये भी कहते रहे कि अगर किसी तरह के त्याग की जरुरत पड़ी तो सबसे पहले हम आगे आएंगे। इससे साफ जाहिर होता है कि अखिलेश अपने त्याग को दिखाकर बड़प्पन हांसिल करना चाहते हैं। इसके साथ वे सभी पार्टियों को एक साथ जोड़ने की कोशिस करके अपनी छवि को राष्ट्रीय स्तर पर चमकाना चाहते हैं। रालोद को अपने खाते से एक सीट देकर अखिलेश यादव ये भी जाहिर करना चाहेंगे कि बीजेपी को हराने के लिए जब एकता की बात आई तो सबसे पहले हम आगे आए।

जाट वोट बैंक पर अखिलेश यादव का निशाना

इस बात में कोई शक नहीं है कि जाट वोटों पर रालोद अच्छी पकड़ रखता है। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के वक्त से ही लगातार रालोद को जाटों का मसींहा माना जा रहा है। अजीत सिंह भी जाटों के वोट के सहारे अपनी राजनीति चमकाते हैं। इसके अलावा जयंत चौधरी मथुरा से सांसद रह चुके हैं। मथुरा में जाटों के वोटों की संख्या काफी है। इसके अलावा भी यूपी की कई सीटों पर जाटों का बोलबाला है।

इससे रालोद को गठबंधन से अलग करने की अहमियत अखिलेश अच्छी तरह समझ रहे हैं। इसलिए उन्होंने रालोद को अपने साथ मिलकर चुनाव लड़ने के लिए राजी किया है। इन तीन सीटों के अलावा भी बाकी 77 सीटों पर रालोद के सहारे जाटों का वोट अपने पाले में डालवे की कोशिश होगी। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि जहां लोकदल का प्रत्याशी नहीं होता है वहां जाट बीजेपी को वोट करते हैं। इशलिए इन वोटों में सेंध लगाने के लिए अखिलेश ने ये त्याग करने का फैसला लिया है। 
 

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