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tibet also yearned to come out of the clutches of china victim of expansionary policy albsnt

चीन के चंगुल से बाहर आने के लिये तिब्बत भी तड़प रहा, विस्तारवादी नीति का बना शिकार

  • Updated on 6/23/2020

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। भारत और चीन के बीच मौजूदा विवाद से पहले भी दोनों देशों के बीच झड़पे होती रही है। इसी तरह से तीन साल पहले डोकलाम में भी दोनों देशों की सेना 73 दिनों तक आमने-सामने रही। फिर विवाद जैसे-तैसे समाप्त भी हुआ। लेकिन ऐसे कई शहर और देश है जहां चीन अपने विस्तारवादी नीतियों के चलते अपने सीमा क्षेत्र में मिलाने के लिये तत्पर रहता है। ऐसा ही दर्द तिब्बत का है जो दशकों से चीन के चंगुल से बाहर निकलने के लिये तड़प रहा है। लेकिन आज तक तिब्बत चीन के दायरे से बाहर नहीं आ सका है। 

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मालूम हो कि दुनिया भर में तिब्बत की पहचान 'संसार की छत' के नाम से भी की जाती है। हालांकि अरुणाचल प्रदेश के तवांग पर भी चीन की पैनी नजर रहती है। चीन का तर्क है कि तवांग और तिब्बत में काफी सांस्कृतिक समानता  है। जिस कारण तवांग भी तिब्बत का ही हिस्सा है। लेकिन भारत इसका प्रतिकार करता रहा है। दूसरी तरफ तिब्बत पर चीन का दावा है कि 13 वीं सदी से ही उसके देश का हिस्सा रहा है। जबकि तिब्बत हमेशा से एक अलग देश के तौर पर अपनी पहचान कराने के लिये बैचेन रहा है। लेकिन तिब्बत को उस समय बड़ा झटका लगा जब 1949 में चीन ने हजारों सैनिकों के बल पर चीन का ही स्वायत्तशासी क्षेत्र  घोषित कर दिया। जिसके बाद 14 वें दलाईलामा को भी 1959 में तिब्बत को मजबूरन छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी।

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वहीं चीन हमेशा से भारत से दलाईलामा को शरण देने को लेकर नाखुशी जताई है। हालांकि दलाईलामा एक आध्यात्मिक नेता के तौर पर पूरे विश्व में एक अलग पहचान कायम किये हुए है। लेकिन चीन दलाईलामा को अलगाववादी नेता मानता है। जबकि दलाई लामा को उनके अनुयायी एक जीवित ईश्वर मानते है। हालांकि दलाईलामा ने तिब्बत पर अपनी पकड़ सुनिश्चित करने के लिये भारत से ही निर्वासित सरकार का भी अपरोक्ष तरीके से संचालन भी करते है।   
     
 

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