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पटेल व मुखर्जी को सच्ची श्रद्धांजलि : कश्मीर को पूरी आजादी

  • Updated on 8/9/2019

वर्षों से असंभव लगने वाला एक संकल्प, जिसे पूरा होने की शायद कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था, उसे नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) जी ने पूरा कर दिखाया। उन्हें यह संकल्प पूरा करने की शक्ति इस चुनाव (Election) में भारत की जनता ने दी थी। यह देश का दुर्भाग्य था कि 15 अगस्त 1947 को भारत तो आजाद हुआ परन्तु भारत माता का मुकुट, केसर की क्यारी कश्मीर पूरी तरह से आजाद नहीं हुआ। देश के गृह मंत्री सरदार पटेल थे, उन्होंने अपनी दूरदर्शी राजनीति से 500 रियासतों के राजाओं को कहीं समझा कर, कहीं डरा कर, कहीं कुछ देकर भारत (India) के साथ मिला लिया। यह अपने आप में बहुत कठिन कार्य था। हैदराबाद (Hyderabad) को मिलाने के लिए उन्हें शक्ति का प्रयोग भी करना पड़ा। प्रधानमंत्री (Prime Minister) पंडित जवाहर लाल नेहरू उनसे नाराज हुए, परन्तु सरदार पटेल (Sardar Patel) ने कहा केवल पुलिस (Police) एक्शन किया जा रहा है। जब भारत की सेना (Indian Army) हैदराबाद में प्रवेश कर गई तो प्रधानमंत्री ने गुस्से में आकर गृह मंत्री को फोन किया। सरदार पटेल ने उत्तर दिया- अब तक पूरी रियासत को कब्जे में लिया जा चुका है। पंडित नेहरू चुप हो गए। पंडित नेहरू जी की शेख अब्दुल्ला (Abdulla) के साथ विशेष मित्रता थी, इसलिए कश्मीर के लिए एक समझौता किया गया, जिसके अनुसार कश्मीर को विशेष दर्जा दिया गया और अलग विधान, अलग प्रधान और अलग निशान का अधिकार दे दिया गया।

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जम्मू (Jammu) में प्रजा परिषद ने इसके विरुद्ध आंदोलन शुरू किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ न पूरी सहायता की। सेवानिवृत्त उपायुक्त प्रेम नाथ डोगरा आंदोलन का नेतृत्व करने लगे। आंदोलन उग्र हुआ। कई जगह गोलियां चलीं। कुछ कार्यकत्र्ता शहीद हुए। प्रेम नाथ डोगरा ने स्वयं सत्याग्रह करने का संकल्प किया और सब प्रकार की पूरी तैयारी की। यहां तक कि अपना गो-दान तक करके जेल गए। इससे आंदोलन और अधिक तेज हो गया।

मुखर्जी ने लोकसभा में उठाया मुद्दा
भारतीय जन संघ के प्रथम अध्यक्ष डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने लोकसभा में बड़े जोर से कश्मीर के मुद्दे को उठाया। भारतीय जनसंघ ने पूरे देश में कश्मीर आंदोलन प्रारम्भ करने का निर्णय किया। डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने घोषणा की कि एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान नहीं रह सकते। उस समय कश्मीर में जाने के लिए परमिट लेना पड़ता था। 1953 में दिल्ली में भारतीय जनसंघ हिन्दू महासभा और राम राज्य परिषद ने कश्मीर के मुद्दे पर सत्याग्रह करने का निर्णय किया। डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने घोषणा की कि वह बिना परमिट के कश्मीर में प्रवेश करेंगे। भारतीय जनसंघ नया-नया बना था, परन्तु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पूरे देश में इस आंदोलन के लिए अपनी शक्ति को झोंक दिया। इसी आंदोलन से भारतीय जनसंघ की एक राष्ट्रीय पहचान बनी।

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11 मई को डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने माधोपुर के रास्ते से जम्मू-कश्मीर में प्रवेश किया। लखनपुर में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। अटल बिहारी वाजपेयी उनके साथ थे। डा. मुखर्जी गिरफ्तार होकर जब जाने लगे तो उन्होंने अटल जी से कहा, ‘‘यद्यपि मैं आज एक कैदी के रूप में कश्मीर में प्रवेश कर रहा हूं, परन्तु मैं कश्मीर को साथ लेकर ही भारत में प्रवेश करूंगा।’’ उनकी गिरफ्तारी के बाद पूरे देश में आंदोलन तेज हो गए। पूरे भारत से सत्याग्रहियों के जत्थे पठानकोट के रास्ते से जम्मू-कश्मीर में जाकर सत्याग्रह करने लगे।

देश सेवा का संकल्प
1951 में मैट्रिक करने के बाद मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रचारक बन कर कांगड़ा आ गया था। परिवार आॢथक कठिनाई में था परन्तु मैंने सब कुछ छोड़ कर देश सेवा का संकल्प किया था। मां ने विशेष संदेश देकर मुझे घर बुलाया, कहने लगीं, ‘‘तुम जीवन भर प्रचारक रहो मुझे कोई आपत्ति नहीं, परन्तु सामने देखो तुम्हारी बहन विवाह के योग्य हो गई है। तुम्हारे पिता जी का स्वर्गवास हो चुका है। तुम भाइयों पर ही इसके विवाह की जिम्मेदारी है। कुछ समय के लिए घर आओ। विवाह का प्रबंध करो और उसके बाद चले जाना।’’ यह कह कर मां की आंखें सजल हो गईं। मैं भी चुप बैठा रहा। मैं कांगड़ा आया और अपने प्रमुख प्रचारक से कहा कि मैं कुछ समय के लिए घर जाऊंगा और बहन के विवाह के बाद वापस आ जाऊंगा।

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विवाह के लिए धन की आवश्यकता थी। पिता जी के मित्र रहे पंडित अमर नाथ सनातन धर्म की ओर से कुछ स्कूल चलाते थे। उनके पास गया और उन्होंने बैजनाथ के निकट कृष्णानगर सनातन धर्म स्कूल में मुझे अध्यापक लगा दिया। बैजनाथ आया। कमरा किराए पर लिया। एक कार्यकत्र्ता की साइकिल ली और बैजनाथ से साइकिल पर उस समय की टूटी, कच्ची सड़क पर कृष्णानगर जाने लगा। नौकरी लगे अभी 17 दिन ही हुए थे कि पालमपुर के संघ प्रचारक देवराज जी आए और मुझे कहा कांगड़ा से कार्यकत्र्ताओं का जत्था लेकर मुझे कश्मीर में सत्याग्रह करना है। मैं एक दम सकते में आ गया। कुछ सोचा, फिर उन्हें कहा कि मैं तो बहन का विवाह करने के लिए घर आया हूं। नौकरी लगे केवल 17 दिन हुए हैं। वह कहने लगे हम संघ के स्वयंसेवक हैं। हमारे लिए सबसे पहले देश है और शेख अब्दुल्ला कश्मीर को भारत से अलग करने का षड्यंत्र कर रहे हैं।

सत्याग्रह की तैयारी
मैं कुछ नहीं कह सका। मन ही मन संकल्प किया। घर आया और चुपचाप सत्याग्रह में जाने की तैयारी करने लगा। दूसरे दिन रविवार था। सोमवार को परिवार के लिए स्कूल जाने लगा। हमारी एकमात्र बहन पुष्पा बीमार थी। वैद्य ने कहा था कि टमाटर के अलावा और खट्टी चीज खाने के लिए नहीं देना। वह खटाई की बहुत शौकीन थी। मुझे कहने लगी, ‘‘भईया! अगले शनिवार को आते समय मेरे लिए टमाटर जरूर लेते आना।’’ घर से बाहर निकलते हुए मेरे कदम एकदम रुक गए। आंखें सजल हो गईं, सोचा  मैं तो जेल जा रहा हूं और बहन टमाटर ...मुड़ कर देखा और फिर एकदम आगे बढ़ चला।

कांगड़ा से 10 सत्याग्रहियों का जत्था जाना था, परन्तु केवल दो, एक सलियाणा से रामरतन पाल और एक डरोह से इंद्रनाथ मेरे साथ आए। पठानकोट में सत्याग्रह का संचालन केदारनाथ साहनी कर रहे थे। हम तीनों संघ के स्वयंसेवक थे। हमें वहीं पर जनसंघ का सदस्य बनाया गया। हमने दूसरे दिन अन्य सत्याग्रहियों के साथ सत्याग्रह किया और हम गुरदासपुर जेल पहुंच गए। जेल में सैंकड़ों लोग थे। बलराम जी दास टंडन और पठानकोट के एल.आर. वासुदेवा तथा और भी बहुत से नेता व कार्यकत्र्ता वहां थे। पूरा दिन जेल में कार्यक्रम होते थे। शाखा लगती थी। बड़ी मस्ती से हमने दो महीने वहां काटे। हमारे मुकद्दमे का निर्णय करने के लिए जेल में ही अदालत लगती थी। सत्याग्रहियों को बुला कर पूछा जाता था कि धारा 144 तोड़ी है? उत्तर कुछ भी मिले, लगभग सबको तीन मास की सजा सुनाई जाती थी।

जेल में हंसी मजाक
हमारे साथ अमृतसर के कार्यकत्र्ताओं ने भी सत्याग्रह किया था। हम लगभग 20 सत्याग्रही अदालत में पेश हुए, पूछा गया कि तुमने धारा 144 तोड़ी? इससे पहले कि हम उत्तर देते, अमृतसर के एक बहुत उत्साही और शरारती स्वभाव के वेद प्रकाश जोर से पंजाबी में बोल पड़े, ‘‘साहनूं की पता, असीं तां कश्मीर दा नारा लगाया सी। धारा 144 कोई शीशे दा गलास सी, जेहड़ी टुट जांदी, तुसीं जानो टुट्टी कि नहीं टुट्टी।’’ इसका अंदाज भी बहुत मजेदार होता था। सब जोर से हंस पड़े। सरकारी वकील नाराज होने लगा। परिणाम यह हुआ कि मैजिस्ट्रेट को गुस्सा आया और हमें दुगनी 6 महीने की सजा सुनाई गई। कई दिन तक ‘शीशे दा गलास’ गूंजती रही। जेल में कुछ दिन तक वेद प्रकाश की बात पर खूब हंसी मजाक होता रहा।  (क्रमश:)
शांता कुमार


 

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