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1969 में शुरू हुआ था रामविलास पासवान का राजनीतिक जीवन, ऐसे दलितों के एकछत्र नेता बन उभरे....

  • Updated on 10/9/2020

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। देश के दिग्गज दलित नेता और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान का बीते गुरूवार निधन हो गया। लोजपा के संस्थापक और उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री पासवान कई सप्ताह से दिल्ली के एक निजी अस्पताल में भर्ती थे। यहां उपचार के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली।

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छोड़ी थी पुलिस सेवा
खगड़िया जिला के शहरबन्नी गांव में जन्में रामविलास पासवान ने कोसी कॉलेज, खगड़िया से स्नातक एवं पटना विश्वविद्यालय से एमए किया। इसके बाद 1969 में उनका चयन डीएसपी पद के लिए हुआ लेकिन उन्हें पुलिस सेवा में नहीं जाना था इसलिए डीएसपी जैसे पद को छोड़ कर पासवान संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर एमएलए बने। 

इसके बाद 1970 में पासवान एसएसपी के संयुक्त सचिव बनाए गए। पांच साल बाद इंदिरा गांधी की इमरजेंसी का विरोध करने पर उन्हें जेल जाना पड़ा और 1977 में जेल से रिहा हुए। इसके बाद उन्हें 1985 में लोकदल का महासचिव बनाया गया। इसके बाद पासवान ने 1987 में जनता दल का महासचिव पद संभाला। 

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मिलनसार पासवान
पासवान काफी मिलनसार और दोस्ताना लहजे वाले रहे थे। शुरूआत से ही राजनीति में जयप्रकाश नारायण, कर्पूरी ठाकुर, राजनारायण और सत्येंद्र नारायण सिन्हा से पासवान की काफी नजदीकियां रहीं थीं। पासवान दूरदर्शी थे इसलिए 2002 में जब गुजरात दंगा हुआ तब उन्होंने कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था। इस वक्त वो जानते थे कि एनडीए का पतन होना शीघ्र है। उन्होंने यह देख लिया था कि बीजेपी और बसपा साथ होने जा रही है जिसकी वजह से मायावती को यूपी सीएम का पद मिला। 

इसी गठबंधन में 2004 में पासवान को केंद्र में रसायन एवं उर्वरक मंत्री बनाया गया और उन्होंने फिर एक बार इस्पात मंत्रालय का भी प्रभार संभाला। लेकीन डायरेक्ट फॉरेन इंवेस्टमेंट के मसले को लेकर उन्होंने यूपीए 2012 में छोड़ दिया।

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बीजेपी से गठबंधन
नरेंद्र मोदी के कमान संभालते ही पासवान की लोजपा ने बीजेपी के साथ गठबंधन किया और एक साथ लोकसभा का चुनाव लड़ा। इसमें बीजेपी को बड़ी जीत मिली और लोजपा को इससे 6 सीट मिली। इसके साथ ही रामविलास पासवान नौंवी बार चुनाव जीत गए। इसके बाद उन्हें कैबिनेट में उपभोक्ता संरक्षण मंत्रालय मिला और एक बार फिर उन्हें राज्य सभा का सदस्य बनाया गया। इस तरफ रामविलास पासवान को 6 प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने का मौका मिला।

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दलितों के एकछत्र नेता
इंदिरा गांधी ने 1971 में गरीबी हटाओ का नारा दिया और तभी से दलित मतदाताओं को लुभाने की राजनीति शुरू हो गई। दलित पैंथर के 1972 में बनने के बाद से दलित वोट बैंक बनना शुरू हुआ। 1977 में चुनाव होने थे लेकिन उससे पहले ही जगजीवन राम कांग्रेस छोड़ गए। उनके जाते ही दलितों का कांग्रेस से मोह भंग होने लगा लेकिन इसी दौरान कानपुर और लखनऊ में दलितों की नाराजगी बढ़ गई। 

फिर जब कांशीराम नेता बन उभरे तब दलित पैंथर और बामसेफ जैसे संगठनों को बल मिला। मायावती 2014 का चुनाव हार गईं वरना यह दलित बल बना रहता। उधर बिहार में रामविलास पासवान ने दलितों और दूसरी जातियों के साथ मिल कर राजनीति की। भोला पासवान शास्त्री और रामसुंदर दास की लोकप्रियता कम हुई और रामविलास बिहार के दलितों के एकछत्र नायक बने।

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