Monday, Oct 22, 2018

स्त्री सम्मान को लेकर एक शिक्षक की ‘अनूठी पहल’

  • Updated on 10/11/2018

सामान्य भारतीय जीवन में स्त्री को बहुत सम्मान से देखा जाता है। यहां तक कहा गया है कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:’ अर्थात जहां नारी का सम्मान और पूजन होता है वहां देवता भी निवास करते हैं। हमारे भारतीय समाज में तो कन्याओं को साक्षात् देवी स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है। 

भारतीय संस्कृति में कन्या पूजन हमारी सनातन परम्परा का एक अंग है। हजार-बारह सौ वर्षों की गुलामी के कालखंड के दौरान भारतीय जनमानस संघर्षरत रहा। इसका प्रभाव हमारी विभिन्न सांस्कृतिक विरासत और परम्पराओं पर भी पड़ा। काल के प्रवाह में कन्या पूजन की परम्परा कुछ शिथिल हुई, विज्ञापनों और टी.वी. चैनलों ने स्त्री का विकृत स्वरूप दर्शाना शुरू किया, पश्चिमी देशों की आधुनिकता सिर चढ़ी तो परिणाम सब देख ही रहे हैं, भुगत भी रहे हैं।

कहते हैं जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। व्यक्ति का देखने और सोचने का नजरिया यदि ठीक होगा तो वह कोई भी गलत कार्य करने से पहले सौ बार सोचेगा। नारी के प्रति, लड़कियों के प्रति दृष्टि में सकारात्मक बदलाव लाया जाए तो इस प्रकार की घटनाओं पर एक सीमा तक नियंत्रण पाया जा सकता है और उसका उपाय है विद्यालय और गली-मोहल्लों में कन्या पूजन जैसे सार्वजनिक आयोजन। ये आयोजन नारी सम्मान की दिशा में एक बड़ी लाइन खींचने का प्रयास है। 

मनुष्य और पशु में बड़ा अंतर भावनाओं और समझ का ही है। आदिकाल से हम गाय को मां मानते हैं तो वैसी ही पवित्र सोच गाय के प्रति जन सामान्य की बन गई। ऐसे ही लगातार कन्या पूजन कार्यक्रमों के आयोजनों से ही स्त्री के प्रति, सहपाठी छात्राओं के प्रति भी अच्छी दृष्टि बनने लगेगी। तब ही ‘‘मातृवत परदारेषु पर द्रब्येषु लोश्ठ्वत्’’ चरितार्थ होगा, ये सब घटनाएं रुकेंगी।‘‘मातृवत परदारेषु’’ यदि सिद्धांत है तो कन्या पूजन उसका प्रायोगिक स्वरूप है। कन्या पूजन के इस एक कार्यक्रम से कई संदेश मिलेंगे। 

ऐसी ही सोच है राजस्थान के एक सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक संदीप जोशी की, जो पिछले कई वर्षों से स्कूल में ‘कन्या पूजन कार्यक्रम’ का आयोजन कर समाज में बालिका सम्मान व शिक्षा का संदेश देने का काम कर रहे हैं। जोशी बताते हैं कि उन्होंने अपने स्कूल में कुछ वर्ष पूर्व कन्या पूजन कार्यक्रम का आयोजन प्रारम्भ किया था, जिसका आज सभी के सहयोग से प्रदेश के 18 जिलों में 500 से अधिक विद्यालयों में बिना किसी सरकारी आदेश व सरकारी बजट के सफल आयोजन किया जा रहा है। उनका मानना है कि स्त्री के पूज्य भाव का जागरण होने से समाज की दृष्टि बदलेगी और इस प्रकार की घटनाओं पर रोक लगेगी। 

कन्या पूजन का कार्यक्रम केवल छात्रों को ही संस्कारित नहीं करता है, वरन छोटी बच्चियों के मन में भी आत्मविश्वास का संचार करता है। उनका मानना है कि समाज में व्यापक परिवर्तन का केन्द्र विद्यालय ही बनेंगे। शिक्षण केवल वृत्ति नहीं है, एक दायित्व है। यह एक माध्यम है समाज और देश के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने का। इसलिए निरंतर कुछ न कुछ अच्छा करने का प्रयास जारी रहना ही चाहिए। 

                                                                                                                                      ---देवेन्द्रराज सुथार

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी समूह) उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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