Friday, May 27, 2022
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उत्तर प्रदेश चुनाव 2022- चुनावी महाभारत से पहले विदुर कुटिया में पक रहा कुछ खास

  • Updated on 1/29/2022

नई दिल्ली/शेषमणि शुक्ल। उत्तर प्रदेश के चुनावी महाभारत में इस बार विदुर की कुटिया (बिजनौर) में कुछ अलग सियासी पकवान पक रहा है। 2017 के चुनाव में जिले की आठ में से छह विधानसभा सीटें भाजपा ने जीती थी। इस बार नकारात्मक रिपोर्ट के बाद भी भाजपा ने अपने तीन विधायकों का टिकट रिपीट किया है। किसान आंदोलन के साए में सपा-रालोद का गठबंधन और बसपा के प्रचार में आक्रामकता की कमी वोट ध्रुवीकरण में बाधक बन रहा है। ऐसे में भाजपा के सामने 2017 दोहराने की बड़ी चुनौती दिख रही है।

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बिजनौर जिला सियासी दृष्टि से बहुत अहम है। महाभारत काल में कौरव-पांडवों की राजधानी रही हस्तिनापुर से बिजनौर कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर है। कहा जाता है कि महाभारत शुरू होने से पहले शांति का संदेश लेकर पहुंचे श्रीकृष्ण ने विदुर की कुटिया में ही रात्रि विश्राम किया था। शाही थाली ठुकराकर कृष्ण ने विदुर की साग-रोटी खाई थी। वही, विदुर जो हस्तिनापुर राजदरबार में महामंत्री और महाराज धृतराष्ट्र के सलाहकार की भूमिका में थे। कहते हैं कि वे साधु स्वभाव के थे।

राजमहल में रहने की बजाए हस्तिनापुर से दूर गंगा के किनारे एक कुटिया में निवास करते थे। यह कुटिया आज भी बिजनौर में है और उत्तर प्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। बिजनौर की सांझी सांस्कृतिक विरासत है। साधारण जीवन जीने वाले लोग हैं। मुख्य रूप से लोग खेती-किसानी से जुड़े हैं। छोटे-मोटे उद्योग धंधे और कारोबार भी है। 26,90,448 मतदाता वाले इस जिले में आठ विधानसभा सीटें हैं। आबादी की दृष्टि से करीब 54 फीसद हिंदू और 45 फीसद मुस्लिम हैं। 80 के दशक तक इस जिले पर कांग्रेस का एकक्षत्र राज था।

90 के दशक की शुरुआत में आरक्षण और राम मंदिर आंदोलन के चलते मंडल-कमंडल की सियासत शुरू हुई तो धीरे-धीरे कांग्रेस हाशिए पर जाती रही और भाजपा, बसपा,  सपा ने अपनी जड़ें जमा ली। बीते 30 साल में जिले में कांग्रेस प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा सके। 2017 का चुनाव 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के साए में हुआ था। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बिजनौर में भी एक घटना को लेकर सांप्रदायिक बवाल हुआ था।

धार्मिक ध्रुवीकरण का फायदा भाजपा ने उठाया और छह सीटें झटक ले गई। सपा के हाथ दो सीट लगी। नूरपुर के भाजपा विधायक रहे लोकेंद्र सिंह की अचानक हुई मृत्यु के बाद उपचुनाव में यह सीट भी सपा के हाथ लग गई। इस तरह मौजूदा वक्त में बिजनौर की पांच सीट भाजपा के पास और तीन पर सपा काबिज है। राममंदिर आंदोलन के दौरान 1991 में जिले में सात सीटें थीं, सातो पर भाजपा जीती थी। 1993 में चार सीटें भाजपा मिली थी। लेकिन 2007 में सातों सीटें बसपा ले उड़ी थी। 2012 में बसपा को तीन और भाजपा को दो सीटें मिली थीं। दो सीट पर सपा जीती थी।

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बिजनौर के वरिष्ठ पत्रकार अशोक मधुप का कहना है कि सियासी माहौल तो 2017 जैसा ही है। इसमें ज्यादा बदलाव नहीं है। हालांकि बिजनौर, चांदपुर और धामपुर में भाजपा विधायकों के खिलाफ लोगों में नाराजगी है। उनकी इमेज ठीक नहीं। भाजपा की अंदरूनी रिपोर्ट भी इन विधायकों के खिलाफ है। लेकिन भाजपा में नेताओं के पार्टी छोड़ने से जो भगदड़ मची, उसका फायदा इन विधायकों को मिल गया और टिकट रिपीट कर दिया गया।

फिलहाल भाजपा की स्थिति ठीक दिखती है। एक बड़े वर्ग में राम मंदिर और काशी विश्वनाथ कॉरीडोर जैसे प्रोजेक्ट का अच्छा असर है। 2013 के कैराना दंगे का असर थोड़ा कम जरूर हुआ है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का कैराना से चुनाव प्रचार शुरू करने का सियासी मकसद और मतलब साफ समझा जा सकता है। गरीबों को आवास और मुफ्त गैस सिलेंडर जैसी लुभावनी योजनाएं भी भाजपा के पक्ष में हैं।

बिजनौर के ही रहने वाले सुप्रीमकोर्ट के वकील तारिक अहमद कहना है कि भाजपा के प्रति लोगों में 2017 जैसा उत्साह तो नहीं दिखता, लेकिन जिले की सभी सीटों पर टक्कर भाजपा और सपा-रालोद गठबंधन के बीच ही दिख रहा है। बसपा इस बार कहीं भी प्रचार करती नहीं दिख रही है। ऐसे में यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि दलित और मुस्लिम वोट कितना विभाजित हो रहा है। जिले में किसान आंदोलन और 2017 में विकास के किए गए वादे अपेक्षानुरूप पूरे नहीं होने से भाजपा को कुछ नुकसान हो सकता है।

इस बार क्या है सियासी गणित

भाजपा ने इस बार पूर्व सांसद भरतेंद्र सिंह और यशवंत सिंह को क्रमश: नजीबाबाद और नगीना (सु) से  टिकट दिया है। जबकि नूरपुर में दिवंगत विधायक लोकेंद्र सिंह के भाई सी.पी. सिंह को उतारा है। बाकी सीटों पर मौजूदा विधायकों को ही टिकट दिया है।

नगीना सीट पर कांग्रेस ने पूर्व मंत्री ओमवती की पुत्रवधू हेनरीता राजीव सिंह को प्रत्याशी बनाया है। ओमवती पिछले चुनाव में इसी सीट पर भाजपा प्रत्याशी थीं और सपा से चुनाव हार गई थीं। इस बार इस सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला बनता दिख रहा है। सपा ने यहां मनोज कुमार पारस पर ही अपना भरोसा जताया है। वहीं, नजीबाबाद में तसलीम अहमद, बढ़ापुर में कपिल कुमार, धामपुर में नईमुल हसन, चांदपुर में स्वामी ओमवेश और नूरपुर में राम अवतार सिंह को सपा ने उम्मीदवार बनाया है।

बसपा ने भी जातीय समीकरण बैठाते हुए अपने प्रत्याशी दिए हैं। पत्रकार अशोक मधुप का कहना है जाति के आधार पर कुछ सीटों पर प्रत्याशी को प्रमुखता मिल सकती है लेकिन कुछ सीटों पर स्थानीय मुद्दे हावी रहेंगे। गन्ना किसानों का भुगतान भी एक मुद्दा है और किसान आंदोलन का भी असर है। विधायकों के प्रति लोगों में उपजी नाराजगी अगर संभला नहीं तो भाजपा की चुनौतियां बढ़ सकती हैं।

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