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भद्दा मजाक : 6.50 रुपया प्रतिदिन में कैसे पलेगी गाय

  • Updated on 8/13/2019

देहरादून/ ब्यूरो: क्या एक गाय अथवा बैल (गोवंशीय पशु) को पालने में एक दिन का खर्च महज 6.50 रुपया आता है। इसका जवाब ‘नहीं’ होगा। लेकिन राज्य सरकार का मानना है कि साढ़े छह रुपये प्रतिदिन प्रति गोवंश की दर से गाय और बैल का पालन-पोषण आसानी से किया जा सकता है। सरकार ने यह दर उत्तराखण्ड गौवंश सरंक्षण अधिनियम 2011 के तहत रजिस्टर्ड गौ सदनों को अनुदान देने के लिए निर्धारित की है। यह गौवंश संरक्षण के नाम पर भद्दा मजाक नहीं तो और क्या है।

उत्तराखण्ड सरकार ने 16 दिसम्बर 2008 में जारी शासनादेश में वृद्ध, बीमार, विकलांग, अनुत्पादक, निराश्रित और केस प्रापर्टी (पुलिस द्वारा जब्त की गई) गौवंश को शरण देने के लिए नियमावली जारी की गई थी। नियमावली के तहत निजी संस्थाओं जो सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत हों, उन्हें गौसदन की स्थापना और गोपालन के लिए सरकार की ओर से अनुदान दिए जाने का प्रावधान है।

पशुपालन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक मौजूदा समय में उत्तराखण्ड में पंजीकृत निजी गोसदनों की कुल संख्या 22 हैं, जिन पर बेसहारा और केश प्रापर्टी गोवंश को सहारा देने का जबरदस्त दबाव है। वो इसलिए क्योंकि पृथक राज्य बनने के बाद उत्तराखण्ड में एक के बाद एक 52 सरकारी कांजी हाउस बंद हो गए। लिहाजा आवारा गाय और बैलों को पूरा बोझ निजी गौ सदनों के ऊपर आ गया है। स्थिति यह है कि उत्तराखण्ड में कुल लगभग 23 लाख गोवंशीय पशु हैं।

इनमें से लगभग 58 हजार पशु आवारा श्रेणी के हैं। राज्य में जो पंजीकृत 22 गौसदन हैं मौजूदा समय में उनमें 5497 गौवंश शरण लिए हुए हैं। शेष गौवंश आवारा घूम रहे हैं। गाया और बैलों की संख्या क्षमता से अधिक होने से गौसदनों की व्यवस्था लड़खड़ाने लगी है। ऊपर से सरकार की बेरुखी से कई गो सदन भी बंद होने की कगार पर हैं। सरकार ने इन गौ सदनों के लिए अनुदान की जो दर तय की है वो साढ़े छह रुपया प्रतिपशु प्रतिदिन है। इतना ही नियमावली में यह भी निर्धारित है कि किसी भी गौसदन को एक साल में एक लाख रुपया से अधिक अनुदान नहीं दिया जा सकता।

प्रतिदिन 90-100 रुपए होता है व्यय
गौसदन संचालकों के मुताबिक एक गौवंश को पालने में प्रतिदिन कम से कम 90-100 रुपए व्यय होता है। सरकार उन्हें साढ़े छह रुपया प्रतिपशु प्रतिदिन के हिसाब से दे रही है जो ऊंट के मुह में जीरा के समान है।

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