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3 जून को सालों बाद बन रहा है ऐसा संयोग, पूजा करने से मिलेंगे अद्भुत लाभ

  • Updated on 5/28/2019

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। वट सावित्री 2019 इस बार ज्येष्ठ के पहले सप्ताह में पढ़ रहा है। हिंदू धर्म में ज्‍येष्‍ठ मास को धार्मिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। साथ ही ज्येष्ठ मास को बड़ और वट अमावस्या भी कहते हैं। ये पर्व 3 जून को पड़ रहा है। इस दिन सुहागन औरतें अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं। इस व्रत को रखने के लिए सुहागन औरतों के अलावा कुंवारी कन्या, विधवा या फिर कुपुत्रा, सुपुत्रा आदि भी इस व्रत को रख सकती हैं। बता दें कि, वट सावित्री व्रत पर काफी अच्छा संयोग बन रहा है जिससे आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाएगी। वट सावित्री व्रत के अलावा इस दिन शनि जयंती का भी संयोग बन रहा है। इस दिन शनि भगवान का जन्म हुआ था। सोमवार को अमावस्या होने से इसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है।  

व्रत के पीछें कि पौराणिक कथा

भद्र देश के राजा अश्वपति के कोई संतान न थी। तब सावित्री ने उनके घर जन्म लिया था। कहते हैं सावित्री का जन्म विशिष्ट परिस्थितियों में हुआ था। जब राजा के घर कोई संतान जन्म नहीं ले रही थी तब उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियां दीं थी और 18 वर्षों तक यह क्रम जारी रहा। इसके बाद सावित्रीदेवी ने प्रकट होकर वरदान दिया कि 'राजन तुझे एक तेजस्वी कन्या पैदा होगी।' सावित्रीदेवी की कृपा से जन्म लेने की वजह से कन्या का नाम सावित्री रखा गया।

कन्या बड़ी होकर बेहद रूपवान बनी थी और इसी रूपवान के चलते सावित्री को योग्य वर (पति) नहीं मिल पा रहा था जिसकी वजह से सावित्री के पिता काफी हताश हो गए थे। और इस परेशानी कि वजह से उन्होंने कन्या को स्वयं वर तलाशने के लिए भेजा। सावित्री तपोवन में भटकने लगी। वहां साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे। चुंकी, राजा का राज-पाट छिन गया था इसलिए वे वनों में रहने लगे। जब सावित्री ने उनके पुत्र सत्यवान को देखा तो उन्होंने (सावित्री) सत्यवान को अपने पति के रूप में चुन लिया।

चुंकी, सत्यवान अल्पायु व वे वेद ज्ञाता थे। नारद मुनि ने सावित्री से मिलकर सत्यवान से विवाह न करने की उन्हें सलाह दी। परंतु सावित्री ने सत्यवान से विवाह करने का फैसला अटल रखा और उन्होंने सत्यवान से शादी रचायी। पति की मृत्यु की तिथि में जब कुछ ही दिन बाकि रह गए तब सावित्री ने वट वृक्ष कि घोर तपस्या की थी जिसके बाद उन्हें फल के रूप में अपने पति सत्यवान के प्राण बचा लिए थे। आज भी ऐसा कहा जाता है कि सावित्री स्वंय पाताल गयी थी अपने पति के प्राण बचाने के लिए वे खुद यमराज से लड़ गई थी। 

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