Friday, Jul 01, 2022
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बुजुर्ग माता-पिता के अपमान और उपेक्षा का भारत में फैलता दुष्चक्र

  • Updated on 6/16/2018

भारत में जहां कभी संतानें पिता के चेहरे में भगवान और मां के चरणों में स्वर्ग देखती थीं, आज उसी देश में संतानों की उपेक्षा के कारण बड़ी संख्या में बुजुर्ग माता-पिता की स्थिति दयनीय होकर रह गई है। अत: चैरीटेबल संगठन ‘हैल्पएज इंडिया’ द्वारा देश के 23 शहरों में बुजुर्गों की स्थिति बारे करवाए गए नए शोध में यह पता लगाने की कोशिश की गई कि बुजुर्गों के साथ दुव्र्यवहार किस सीमा तक, कितना, किस रूप में और कितनी बार होता है तथा इसके पीछे कारण क्या हैं।  
शोध के अनुसार बुजुर्गों के साथ सर्वाधिक दुव्र्यवहार मेंगलूर (47 प्रतिशत), उसके बाद अहमदाबाद (46), भोपाल (39), अमृतसर (35) और दिल्ली (33 प्रतिशत) में होता है। शोध में पता चला कि 82 प्रतिशत पीड़ित बुजुर्ग अपने परिवार के सम्मान के चलते इसकी शिकायत नहीं करते और या फिर उन्हें मालूम नहीं कि इस समस्या से कैसे निपटा जा सकता है।

‘विश्व बुजुर्ग दुव्र्यवहार जागरूकता दिवस’ के अवसर पर 14 जून को हैल्पएज इंडिया के सी.ई.ओ. मैथ्यू चेरियन द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘हर वर्ष हम अपने बुजुर्गों के विरुद्ध किए जाने वाले इस घिनौने अपराध को समझने और इसके विरुद्ध लोगों में जागरूकता पैदा करने की कोशिश करते हैं। दुर्भाग्य से बुजुर्गों का उत्पीडऩ घर से शुरू होता है और इसे वे लोग अंजाम देते हैं जिन पर वे सर्वाधिक विश्वास करते हैं।’’ 

‘‘परिजनों के हाथों बुजुर्ग अपमान (56 प्रतिशत), गाली-गलौच (49 प्रतिशत), उपेक्षा (33 प्रतिशत), आॢथक शोषण (22 प्रतिशत) और शारीरिक उत्पीडऩ का शिकार (12 प्रतिशत) होते हैं और ऐसा करने वालों में बहुओं (34 प्रतिशत) की अपेक्षा बेटों (52 प्रतिशत) की संख्या अधिक है जबकि पिछले सर्वेक्षणों में बहुओं की संख्या अधिक पाई जाती थी।’’

प्रौद्योगिकी ने भी बुजुर्गों की उपेक्षा और उनसे दुव्र्यवहार में अपना योगदान डाला है और संतानें अपने माता-पिता की अपेक्षा मोबाइल फोन और कम्प्यूटरों को अधिक तवज्जो देती हैं। इसका बुजुर्गों के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। बुजुर्ग महसूस करते हैं कि उनके बच्चे मोबाइल फोनों पर अत्यधिक व्यस्तता के कारण उनकी ओर ध्यान ही नहीं दे पाते जिससे वे स्वयं को उपेक्षित और अपमानित अनुभव करने लगे हैं।

मैथ्यू चेरियन के अनुसार,  ‘‘60 प्रतिशत से अधिक बुजुर्गों के अनुसार बच्चों और पोतों की मोबाइल फोनों और कम्प्यूटरों पर व्यस्तता के कारण वे उनके साथ कम समय बिता पाते हैं और 78 प्रतिशत बुजुर्गों ने कहा कि सोशल मीडिया ने परिवार के साथ बिताया जाने वाला उनका समय छीन लिया है।’’

उक्त रिपोर्ट से स्पष्ट है कि भारत में आज अधिकांश बुजुर्गों की स्थिति कितनी दयनीय होकर रह गई है। पिंगलवाड़ा चैरीटेबल सोसायटी, अमृतसर की अध्यक्ष डा. इंद्रजीत कौर के अनुसार अनेक मामलों में संतानें अपने बुजुर्गों के साथ गाली-गलौच तथा उनका घोर अपमान करती हैं और उनकी  सारी जमा पूंजी छीन लेने के बाद उन्हें सड़कों पर ‘फैंक’ देती हैं।

अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर कमलदीप सिंह का कहना है कि उनके पास हर समय संतानों द्वारा बुजुर्गों की उपेक्षा संबंधी 4-5 शिकायतें निपटारे के लिए आई ही रहती हैं जो इस समस्या की गंभीरता का प्रमाण है। उनके अनुसार,‘‘बुजुर्गों की उपेक्षा संबंधी यदि ये आंकड़े सही हैं तो इसका मतलब यह है कि हमारे लिए न सिर्फ अपने बुजुर्गों के सम्मानजनक जीवन-यापन के लिए बहुत कुछ करना बाकी है बल्कि बच्चों में अपने माता-पिता और बुजुर्गों का सम्मान करने के संस्कार भरना भी अत्यंत आवश्यक है। लिहाजा बच्चों को बचपन से ही इसकी शिक्षा देनी चाहिए।’’ 

इसी को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों ने ‘अभिभावक और वरिष्ठï नागरिक देखभाल व कल्याण’ संबंधी चंद कानून बनाए हैं परंतु इन कानूनों तथा अपने अधिकारों की ज्यादा बुजुर्गों को जानकारी नहीं है। अत: इन कानूनों के व्यापक प्रचार की जरूरत है ताकि बुजुर्गों को अपने अधिकारों का पता चले और उन्हें जीवन की संध्या में अपनी ही संतानों की उपेक्षा का शिकार होकर अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए तरसना न पड़े। 

आवश्यकता इस बात की भी है कि माता-पिता अपनी सम्पत्ति की वसीयत तो बच्चों के नाम अवश्य कर दें परंतु सम्पत्ति उनके नाम ट्रांसफर न करें। ऐसा करके ही वे अपने जीवन की संध्या में आने वाली अनेक परेशानियों से बच सकते हैं।     —विजय कुमार 

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