Monday, Jan 21, 2019

27 फीसदी आरक्षण देकर भी हार गए थे वीपी सिंह, क्या 10% के सहारे सत्ता बचा पाएगी मोदी सरकार

  • Updated on 1/8/2019

नई दिल्ली/ अमरदीप शर्मा। 2019 लोकसभा चुनाव के लिए मोदी सरकार ने एक बड़ा दांव खेला है। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया है। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 15 में संशोधन किया जाएगा। विपक्ष इसे महज चुनावी जुमला करार दे रहा है। विपक्ष का कहना है कि ये बस राजनीतिक फायदे के लिए गया फैसला है।

बड़ा सवाल है कि क्या सरकार को इसका राजनीतिक फायदा मिल पाएगा या नहीं? इससे 29 साल पहले जब तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने गरीब पिछड़ों को 27 फीसदी आरक्षण वाली सिफारिशों को लागू किया तो उनका व्यापक विरोध किया गया। इसके बाद सवाल ये खड़ा होता है कि 27 फीसदी आरक्षण देकर भी वीपी सिंह हार गए तो क्या मोदी इसके सहारे अपनी सत्ता को बचा पाएंगे। 

चुनावी हार से खुली आंखे

राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की चुनावी हार सरकार की आखें खोलने का काम कर गई। एससी/एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के बाद सवर्ण समाज में सरकार के प्रति नाराजगी हो गई। सवर्ण समाज के लोगों ने इस नाराजगी को एक दिन के लिए भारत बंद का आहृान करके जताया भी। भारत बंद का असर हिंदी भाषी राज्यों में काफी हद तक दिखा। इसके बाद भी सरकार इसे नजरअंदाज करके दलितों की तरफ ही झुकती गई। 

2014 के लोकसभा चुनाव में 54 प्रतिशत सवर्ण समाज ने बीजेपी को वोट किया जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीत की राह आसान हो गई। बीजेपी दलितों को साधने के चक्कर में अपने मूल वोटरों को भूल गई। जिसके बाद सवर्ण समाज में सरकार के खिलाफ गुस्सा दिखा। इस अभियान में तमाम बड़े दिग्गज भी सामने आए।

इसके बाद भी सरकार ने इस पर कोई अमल नहीं किया। इसी दौरान नोटा के लिए लोगों ने वोट करने का निर्णय लिया। सरकार को इस चेतावनी का कोई असर नहीं दिखा। इसके बाद जब सरकार की आंख खुली तो पता चला की तीन बड़े हिंदी भाषी राज्य सरकार के हाथ से निकल गए हैं। मध्यप्रदेश और राजस्थान में तो 15 साल बाद बीजेपी का किला ढ़ह गया। 

प्रधानमंत्री की लोकप्रियता में भी गिरावट आने लगी। सरकार के नोटबंदी और जीएसटी तक के बड़े फैसलों पर भी पीएम की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं दिखी। इसके बाद भी उत्तर प्रदेश में प्रचंड़ बहुमत की सरकार ने दिखा दिया की जनता ने इसे स्वीकार कर लिया है। इसके बाद जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटा गया तो सरकार के लिए बड़ी मुसीबत बनकर दिखी। इसका नतीजा तीनों राज्यों में हार के रुप में सामने आया। फिलहाल सरकार के इस फैसले को 2019 के लिए राजनीतिक फायदे के लिए लिया गया फैसला बताया जा रहा है। 

 मोरारजी देसाई ने किया मंडल कमीशन का गठन

चलिए तो हम आपको उस वक्त की बात बताने हैं जब देश में पहली बार मोरारजी देसाई के नेतृत्व की गैर कांग्रेसी सरकार बनी। जिसने  20 दिसंबर, 1978 को बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की अगुवाई में एक आयोग बनाया। इस मंडल आयोग का नाम दिया गया। मंडल कमीशन ने सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को 27 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की। आयोग ने  12 दिसंबर,1980 को अपनी रिपोर्ट पूरी की, हालांकि उस वक्त तक मोरारजी देसाई की सरकार गिर चुकी थी। जिसके बाद एक बार फिर इंदरा गांधी सरकार में वापस आईं। इसके बाद इंदरा गांधी की हत्या हो गई। जिसके बाद राजीव गांधी को देश का पीएम घोषित किया गया। लेकिन उन्होंने भी इस सिफारिश पर कोई अमल नहीं किया। 

वीपी सिंह के अपने हुए पराये

जब एक बार फिर जनता दल सरकार  में वापस आया तो विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू कर दिया। राजनीतिक गलियारों में इस बात की कहासुनी थी कि  देवीलाल के बढ़ते कद को रोकने के लिए उन्होंने ये दाव खेला है। हालांकि इसके बाद सवर्ण समाज के युवा छात्र सड़क पर उतर आए थे। इसके साथ ही आरक्षण विरोधी आंदोलन के नेता बने राजीव गोस्वामी ने आत्मदाह कर लिया। कांग्रेस भी खुलकर इसके विरोध में आती हुई दिखी।

भारतीय जनता पार्टी ने नए पैंतरे के साथ खुद को किनारे कर लिया। इसके बाद उनके अपने ही साथी पराए हो गए। जिन्होंने वीपी सिंह के इस फैसले का खुलकर विरोध किया। इसमें विरोध करने वालों में ओडिया के मुख्यमंत्री बीजू पटनायक सबसे पहले सामने आए। जोकि जनता दल के साथ सरकार मिलकर सरकार चला रहे थे। उन्होंने पीएम को जातिगत बढ़ावा देने का आरोप लगाया था। इसके अलावा यशवंत सिन्हा,  हरमोहन धवन ने, चंद्रशेखर, अरुण नेहरू और आरिफ मोहम्मद खां भी विरोध करते दिखे। 

इन नेताओं ने किया खुलकर समर्थन

वीपी के समर्थम में कुछ दिग्गज नेता भी खड़े होते हुए दिखे। जिन्होंने जातिगत तरीके से अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश की। ताकि वे आगे चलकर ओबीसी वोटरों के सहारे सत्ता के सिंहासन पर पहुंच सकें। जिनमें दो बड़े नाम खुलकर समर्थन में दिखे। जिसमें लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव हैं। दरअसल ये दोनों ही नेता ओबीसी समाज से आते हैं। चंद्रशेखर के करीबी होने के बावजूद भी मुलायम ने इसका समर्थन किया। जिसके बाद उन्होंने 1992 समाजवादी पार्टी का गठन करते अपनी राजनीति को नया स्वरूप दे दिया और ओबीसी वोटरों के मसीहां बनकर उत्तर प्रदेश की सत्ता के सिंहासन तक पहुंचे। 
 

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