Monday, Jan 21, 2019

आखिर गडकरी की बातों के ‘मायने’ क्या हैं

  • Updated on 1/8/2019

कांग्रेस, साम्यवादियों अथवा समाजवादियों के विपरीत भारतीय जनता पार्टी में शायद ही कभी कोई बड़ी दरार देखने को मिली हो। कभी-कभार सम्भवत: कोई व्यक्ति पार्टी के भीतर राजनीतिक झगड़ों में शामिल हो सकता है जैसे कि बलराज मधोक थे, जो भाजपा के पूर्ववर्ती अवतार जनसंघ के अध्यक्ष थे। लेकिन ऐसे झगड़े बहुत कम तथा भगवा खेमे से बहुत दूर थे, जबकि कांग्रेस, साम्यवादियों, समाजवादियों के बीच एक से अधिक बार विभाजन हुआ। 

जनसंघ तथा भाजपा के ऐसी टूटनों से बचे रहने का कारण यह था कि जनसंघ कभी भी एक प्रमुख दल नहीं था, राष्ट्रीय राजनीति से हमेशा अलग रहा और इसलिए कभी भी इसने प्रतिद्वंद्वी संगठनों के साथ वैचारिक दबाव तथा संगठनात्मक प्रतिस्पर्धा महसूस नहीं की। 

जहां तक भाजपा की बात है, अब यह एक दुर्जेय ताकत के रूप में उभरी है, मुख्य रूप से उत्तरी तथा पश्चिम भारत में और अभी भी एहतियातपूर्वक अपना रास्ता बना रही है। 

भाजपा को पहला बड़ा झटका 
भाजपा को पहले बड़े झटके का तब अनुभव हुआ जब ङ्क्षहदुत्व कार्यकत्र्ताओं ने 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहा दिया, जिस कारण पार्टी के सबसे कद्दावर नेताओं में से एक अटल बिहारी वाजपेयी ने त्यागपत्र देने का इरादा कर लिया था। 

लेकिन तूफान गुजर गया जिस बारे पार्टी नेता विजयराजे सिंधिया ने राहत तथा संतुष्टि व्यक्त की कि भाजपा बंटी नहीं। तब से, जबकि पार्टी का दायरा फैल गया है, इसके विरोधी सिकुड़ गए हैं जैसे कि कांग्रेस तथा साम्यवादी,  जबकि समाजवादी वास्तव में पटल से ही गायब हो चुके हैं। 

2014 ने भाजपा का चोटी तक उत्थान देखा। लेकिन अब अचानक कई चुनावी आघातों के बाद इस तरह के संकेत हैं कि यह सम्भवत: लम्बे  समय तक इस स्थान पर नहीं रह पाएगी। 

सहयोगियों में असंतोष
कोई हैरानी की बात नहीं कि भाजपा के सहयोगियों में असंतोष के संकेत मिल रहे हैं जिस कारण इसे बिहार में पैचवर्क करना पड़ा, जहां पार्टी को लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के साथ अपने संबंधों को बनाए रखने में सफलता मिली। लेकिन यह एक अन्य सहयोगी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) को राजग छोड़ प्रतिद्वंद्वी यू.पी.ए. में शामिल होने से नहीं रोक सकी। 

इस बीच हमेशा से ही असंतुष्ट शिवसेना, जो औपचारिक रूप से सहयोगी बनी रही है, ने भाजपा को तंग करना शुरू कर दिया है, इस बार  कांग्रेस के सुर में सुर मिलाते हुए राफेल सौदे को लेकर। मगर इन झटकों को सामान्य प्रतिक्रियाएं कहकर नजरअंदाज किया जा सकता था जब बड़ा भाई असुरक्षित दिखाई देता हो मगर केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं उच्च मार्ग मंत्री नितिन गडकरी द्वारा की गई टिप्पणियां महत्वपूर्ण थीं जिन्हें पार्टी के बड़े नेताओं पर सीधे हमले के रूप में देखा गया। 

मोदी पर कटाक्ष
उदाहरण के लिए उनका यह विचार कि कोई महज इसलिए चुनाव नहीं जीत सकता कि वह अच्छा वक्ता है, जिसे किसी और पर नहीं खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना के तौर पर देखा गया, जिनकी वाकपटुता भाजपा को संकट के पानियों से निकालने के लिए जीवन नौका साबित हुई है। 

यद्यपि यह तथ्य कि मोदी की वाकपटुता पार्टी की कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में हुए हालिया चुनावों में मदद नहीं कर सकी, राजनीतिक विशेषकों की नजर से बच नहीं सका। 

यदि गडकरी यह कह रहे हैं कि चुनावी वैतरणी को पार करने के लिए वाकपटुता ही काफी नहीं है तो ऐसा इसलिए हो सकता है कि सम्भवत: वह यह मानते हों कि पार्टी में अन्य लोग अपनी भूमिका नहीं निभा रहे। उदाहरण के लिए, उन्होंने कहा कि ‘यदि मैं पार्टी अध्यक्ष हूं और मेरे सांसद तथा विधायक अच्छा काम नहीं कर रहे तो जिम्मेदार कौन है? मैं हूं।’ इस तंज की भी व्याख्या करने की जरूरत   है। 

इसके अतिरिक्त उनकी यह राय कि कनिष्ठ लोगों के विचारों को भी अहमियत दी जानी चाहिए तथा ‘लोगों की अवश्य सांझी भावना होनी चाहिए’ भी संगठनात्मक पदों पर बैठे व्यक्तियों पर कटाक्ष है। 

यह कहकर कि भारत की एक सहिष्णु देश की छवि ने प्रवासियों को यहां आने तथा बसने के लिए आकॢषत किया है, गडकरी ने एक ऐसा विचार व्यक्त किया है जो वीर सावरकर के बाहरी लोगों को ‘एलियन’ कहने तथा एम.एस. गोलवलकर द्वारा उनको दूसरे दर्जे का नागरिक कहने के दृष्टांतों से बहुत कम मेल खाता है। 

मगर गडकरी की सोच का सबसे महत्वपूर्ण पहलू था जवाहर लाल नेहरू की उनके द्वारा तारीफ करना, जो ऐसे व्यक्ति हैं। जिनसे अब भाजपा नफरत करने को अहमियत देती है। गडकरी की टिप्पणियों ने स्वाभाविक रूप से उनके इरादों के बारे में संदेह पैदा कर दिए हैं।

उदाहरण के लिए पूर्व भाजपा नेता यशवंत सिन्हा ने कहा है कि केन्द्रीय मंत्री अपनी स्थिति एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर बना रहे हैं जो भाजपा द्वारा अपने बूते पर बहुमत हासिल न कर पाने की स्थिति में एक सहमतिपूर्ण व्यवस्था के तहत मोदी का स्थान ले सकें, जैसा कि आम तौर पर माना जाता है। 

गडकरी की स्वीकार्यता
खुद को एक दयालु, विनम्र व्यक्ति के तौर पर पेश कर सम्भवत: गडकरी आम चुनाव के बाद की परिस्थिति में पुराने तथा नए सहयोगियों के लिए अधिक स्वीकार्य हो सकते हैं। उनको दो लाभ हैं।

एक है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ उनकी नजदीकी, जो भाजपा में उनके आलोचकों को एक किनारे लगाए रखेगी तथा दूसरा है दक्षता को लेकर उनकी ख्याति जो उन्होंने अपने तत्वावधान में उच्च मार्गों के निर्माण तथा अन्य ढांचागत विकास कार्यों में व्यापक तौर पर प्रदॢशत की है। 

समीक्षकों के लिए आने वाले सप्ताहों तथा महीनों के दौरान निजी स्तर पर अपेक्षित उतार-चढ़ाव भाजपा को एक  कट्टर साम्प्रदायिक संगठन की मुख्य धारा के तौर पर प्रस्तुत कर सकते हैं।                                                 ---ए. गांगुली

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी समूह) उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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