मूर्ति की सियासत से क्या सरकारें लगा रही हैं जनता को चूना?

  • Updated on 2/11/2019

नई दिल्ली/श्वेता यादव। देश में मूर्तियों को लेकर होने वाली सियासत बहुत पुरानी है और आज भी इसमें कोई कमी नहीं आई है। बदलते वक्त के साथ देश की सियासत ने बड़ी करवट ली, लेकिन मूर्तियों के साथ सियासत का खेल आज भी जारी है। इसी पर हालिया खबरों पर नजर डालें तो दो बड़ी खबरे मूर्ति निर्माण को लेकर चर्चा में रही। पहली खबर, पीएम मोदी ने सरदार वल्लभ भाई पटेल की दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति का अनावरण किया। दूसरी यूपी से आई जोकि ठीक मोदी जी के पटेल जी की मूर्ति स्टेचू ऑफ यूनिटी के बाद सीएम योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में भी भगवान श्रीराम की सबसे बड़ी मूर्ति को खड़ा करने का घोषणा की। 

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अब खबर ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने अपने कार्यकाल में जो मूर्तियां लगवाई उस पर आपत्ति जताई। मायावती साल 2007 से 2011 तक उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं। इस दौरान उन्होंने नोएडा और लखनऊ में अपने कार्यकाल में दो पार्क बनवाए। इन पार्को में कई पत्थर के हाथी लगवाए। पार्कों पर 1400 करोड़ का खर्च आया। तो कांसे और पत्थर के लगे हाथियों पर 685 करोड़ रुपए खर्च हुए।

सुप्रीम कोर्ट ने उठाया सवाल?

मायावती की मूर्तियों पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'ऐसा लगता है कि बीएसपी प्रमुख मायावती को लखनऊ और नोएडा में अपनी और अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की मूर्तियों बनवाने पर खर्च किया गया सरकारी धन लौटा देना होगा।' इसके बाद मूर्तियां लगवाने वाली राजनीतिक पार्टियों पर एक साथ सवाल उठ खड़ें हुए। सोशल मीडिया पर लेकर इसके लेकर काफी चर्चा हुई। 

कई लोगों का मनाना था कि मायावती की लगवाई मूर्तियां सरासर गलत हैं और ये आम जनता के पैसे की बर्बादी है। तो वहीं एक पक्ष ये भी था कि अगर मायावती की लगवाई मूर्तियां गलत हैं तो पीएम मोदी ने जो हाल ही में सरदार पटेल का स्टेचू बनवाया, वो भी जनता के पैसे से बना था और पैसे की बर्बादी थी। 

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मूर्ति निर्माण महज एक पॉलिटिकल स्टंट है?

वहीं दूसरी तरफ इसका एंगल एक और निकलकर आया जहां ये पूरी तरफ से साफ करता है कि ये पॉलिटिकल स्टंट हैं। मायावती की लगाई मूर्तियों का जहां विपक्ष में रही एसपी भरसक विरोध करती थी। एक तरफ जहां अखिलेश यादव कहते थे कि ये पैसे की बर्बादी है। हम सरकार में आएंगे जो इस जमीन पर अस्पताल और स्कूल खुलवाएंगे। वहीं पलटवार के तौर पर मायावती कहती थी कि यदि उन पार्कों को छुआ गया तो न सिर्फ उत्तर प्रदेश में बल्कि पूरे देश में कानून-व्यवस्था को संभालना मुश्किल हो जाएगा, जैसी धमकियां देती नजर आती।

लेकिन अब जब 2019 के लोकसभा चुनावों के मद्देनजर राज्य में समीकरण बदल गए हैं तो सुप्रीम कोर्ट के लगाए आरोपो पर अखिलेश यादव साथ खड़े नजर आते हैं। वहीं मायावती दावा करती हैं कि इन पार्कों से काफी पैसा आ रहा है जोकि सरकार की आय में शामिल होता है। वहां पर्यटक टिकट खरीद कर जाते हैं। 

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जनता के पैसे की बर्बादी?

मूर्तियों के नाम पर अखिलेश और सपा का ये पॉलिटिकल शिफ्ट अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक कारनामा है। बहरहाल जो भी हो सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति के बाद से ही देश में राजनीतिक पार्टियों की तरफ से लगी मूर्तियां बहस का हिस्सा हो गई हैं और स्टेचू और यूनिटी के साथ-साथ कई बड़ी मूर्तियों पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। सवाल सीधा सा है कि जनता का पैसा जहां अस्पतालों, स्कूलों और जरुरतमंदों पर खर्च होना चाहिए या फिरलइस तरह मूर्तियों में लगाकर देश के साथ सही न्याय होता है?

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