Saturday, Nov 17, 2018

पुरानी है सरकार-RBI की अदावत, PM नेहरू ने 1957 में ले लिया था गवर्नर का इस्तीफा

  • Updated on 11/5/2018

नई दिल्ली/आयुषी त्यागी। कई बार जब स्थिति हमारे पक्ष में नहीं होती तो उसका समाधान हम इतिहास में खोजते है और हमें सामधान मिल भी जाता है। मोदी सरकार भी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ चल रही अनबन का समाधान इतिहास के पन्नों में ही खोज रही है। दरअसल इस लड़ाई के बीच 1937 का एक उदाहरण मिला है जब ऑब्सबॉर्न ने ब्याज एंव विनयम दरों के मुद्दे पर तत्कालीन उपनिवेशवादी सरकार के साथ हुए मतभेदों के बीच इस्तीफा दे दिया था। 

नेहरु से बातचीत के बाद आरबीआई गवर्नर का इस्तीफा 
एक बार आरबीआई गवर्नर सर बेनेगल रामा राव और देश के पहले प्रधानमंत्री पंड़ित ज्वाहर लाल नेहरू के साथ हुई तीखी नोंकझोंक के बाद आरबीआई गवर्नर ने इस्तीफा दे दिया था। अब वो कांग्रेस पार्टी द्वारा आरबीआई की स्वायत्तता को धूमिल करने का आरोप लगाकर सरकार पर किए जा रहे हमलों का असरदार जवाब देने की इस घटना का इस्तेमाल कर सकते हैं। 

नेहरु ने पत्र में लिखी थी ये राय
सर बेनेगल रामा राव एक सिविल सर्वेंट थे जो आरबीआई के चौथे गवर्नर थे। उन्होंने 7.5 वर्षों के लंबे कार्यकाल के बाद 1957 में इस्तीफा दे दिया। दरअसल तब नेहरू ने तत्कालीन वित्त मंत्री टी. टी. कृष्णमचारी (टीटीके) का साथ देते हुए यह साफ कर दिया था कि आरबीआई सरकार की विभिन्न गतिविधियों का हिस्सा है। वह सरकार को सलाह दे सकता है लेकिन उसे सरकार के साथ भी रहना है। यह बातें नेहरू ने जनवरी 1957 में एक पत्र में लिखी थीं।

नेहरु ने लिखा था कि जब यदि राव को लगता है कि उनके लिए कार्य जारी रखना संभव नहीं है तो वह पद से इस्तीफा दे सकते हैं। इसके कुछ दिनों बाद राव ने इस्तीफा दे दिया था। 

राव और टीटीके के बीच मतभेद क्यों 
राव ने टीटीके पर अभद्र व्यवहार का आरोप लगाया था। दोनों के बीच मतभेदों की शुरूआत एक बजट प्रस्ताव को लेकर हुई थी। टीटीके ने आरबीआई को वित्त मंत्रालय का एक भाग बताया था। इसके अलावा उन्होंने संसद में इस बात को लेकर शंका जाहिर की थी कि वह किसी तरह के सोच विचार के लिए सक्षम है या नहीं। राव को लिखे पत्र में भारत के नेहरु ने आगे लिखा था कि आरबीआई सरकार को सलाह दे सकती है लेकिन उसे सरकार के साथ तालमेल बनाकर रहना होगा।

नेहरु ने कहा था कि 
नेहरु ने कहा था कि यह बिल्कुल हास्यापद बात होगी यदि केंद्रीय बैंक अलग तरह की नीति अपनाए या फिर वो सरकार की नीति या उसके उद्देश्यों या उसके तरीकों से सहमत नहीं है।नेहरू ने आगे लिखा था कि आरबीआई की स्वायत्तता पर दबाव डाला है। निश्चित रूप से यह स्वायत्त है लेकिन यह केंद्र सरकार के नेतृत्व के अधीन भी है

नेहरू ने पत्र में लिखा था, 'जब आपने मुझसे बात की तो मैंने आपको बताया था कि केंद्र सरकार नीतियां बना सकती है और आरबीआई केंद्र सरकार की नीतियों के विरुद्ध किसी तरह की नीति नहीं बना सकती है। आपने इसपर सहमति जताई थी। मगर आपके मेमोरेंडम में मुझे अलग दृष्टिकोण मिला है।' आरबीआई का मानना था कि टीटीके के बजट प्रस्ताव से ब्याज दरें बढ़ जाएगी और उसने केंद्रीय बोर्ड को एक प्रस्ताव भेजा था। 12 दिसंबर 1956 को बोर्ड ने सरकार से कहा था कि वह उन सभी मामलों में आरबीआई से सलाह लें जिससे मौद्रिक संरचना और नीति पर असर पड़ता हो। 

 

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