Saturday, Apr 21, 2018

भारत-चीन संबंध ‘खराब’ कब नहीं थे?

  • Updated on 4/16/2018

मेरी बात से हंसे नहीं बल्कि चीन के प्रति भारत की दयनीय स्थिति पर गंभीरता से विचार अवश्य करें। कहो तो निवेदन करूं? 31, मार्च, 2018 को हिमाचल के धर्मशाला कस्बे में तिब्बत के निर्वासित धर्मगुरु दलाईलामा और उनके अनुयायियों ने एक ‘धन्यवाद समारोह’ रखा। उद्देश्य था कि पिछले 60 सालों में भारत ने तिब्बत के शरणार्थियों की आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जो सेवाएं की हैं उनके लिए तिब्बत की यह निर्वासित सरकार भारत की कृतज्ञ है। इस समारोह में तिब्बत सरकार के निर्वासित प्रधानमंत्री कराह उठे कि चीन ने उनकी विरासत को बर्बाद कर दिया है। 

तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री लोबसांग सांगे, धर्मगुरु दलाईलामा, मंत्री, तिब्बती संसद के सदस्य और अन्य गण्यमान्य तिब्बती शरणार्थी समारोह में उपस्थित हुए ताकि वे भारत सरकार के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट कर सकें। विडम्बना यह कि 22 फरवरी, 2018 को भारत के नए विदेश सचिव विजय केशव गोखले ने कैबिनेट सचिव पी.के. सिन्हा को पत्र लिख भेजा कि भारत सरकार का कोई मंत्री , कोई नेता या अधिकारी दलाईलामा  द्वारा आयोजित ‘धन्यवाद समारोह’ में भाग न ले क्योंकि उनके इस समारोह में शामिल होने से भारत-चीन संबंध और खराब हो जाएंगे। 

15वें वित्त आयोग के ‘Terms of reference’ पर भड़की आग बुझाने का प्रयास नहीं किया गया

विदेश सचिव से विनम्र भाव से पूछना चाहता हूं कि भारत और चीन के संबंध खराब कब नहीं थे? इस पत्र से विदेश सचिव ने तिब्बती शरणार्थियों को भारत द्वारा दी गई अकूत आर्थिक सहायता पर पानी फेर दिया।1959 से 2018 तक साठ सालों में तिब्बतियों के शैक्षणिक संस्थानों और धार्मिक संस्थानों को भारत द्वारा दी गई आर्थिक सहायता निष्फल हो गई। इस समारोह में यदि प्रधानमंत्री जाते तो चीन की छाती पर सांप लोटता। अंतर्राष्ट्रीय न्यूज तो बनती। तिब्बती शरणार्थियों का मनोबल तो बढ़ता। 

विदेश सचिव के पत्र ने भारत सरकार को चीन के सामने घुटने टेकने की नीति का नाम दे दिया। विदेश नीति के पंडित बताएं कि चीन ने हमारी हजारों सालों पुरानी मित्रता का दम 1950 के बाद कब भरा है? हमारा तो चीन ने पिछले कई सालों में साथ ही नहीं दिया। हमारे स्वर्गीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ के नारे लगाते रहे और पीकिंग-रेडियो पंडित नेहरू को ‘ब्रिटिश साम्राज्यवाद  के इशारे पर भौंकने वाला कुत्ता’ घोषित करता रहा। भारत चीन को ‘संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनाने के लिए विश्व राजनीतिक मंच पर वकालत करता रहा। लेकिन चीन  दुनिया भर में हमें लताड़ता रहा। 

चीन ने स्वयं ‘पंचशील सिद्धांत’ को ईजाद किया। भारत ने कहा ‘पंचशील संधि’ 1954 के बाद के बीस वर्षों तक मान्य रहे। चीन ने 8 वर्षों में ही ‘पंचशील संधि’ की धज्जियां उड़ाकर रख दीं। चीन ने तिब्बत की सभ्यता, संस्कृति, सार्वभौमिकता, विरासत और आजादी को हड़प लिया, भारत तिब्बत के दो हजार साल के संबंधों को मूक भाव से तिलांजलि देता गया। चीन ने एक समझौते के अधीन 1943 में भारतीय ट्रेड एजैंसी की बिल्डिंग पहली अप्रैल, 1971 तक लीज पर दी परन्तु 1958 में तिब्बती लामाओं के विरोध से पहले ही इस लीज को रद्द कर दिया। भारतीय व्यापारियों पर 100 प्रतिशत टैक्स लगाकर उन्हें कंगाल कर दिया। 1962 में स्वयं बिना कारण भारत पर आक्रमण किया और स्वयं ही युद्धबंदी की घोषणा भी कर दी। बेचारे प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू चीन की इस मित्रघात नीति से 1964 में ही संसार को अलविदा कह गए।  

तिब्बत स्थित ‘कैलाश मान सरोवर’ तीर्थ यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया। हमारे पुरखों की आस्था पर विराम लगा दिया। यही नहीं 6 मई 1959 को तीर्थयात्रा पर गए भारतीय स्वामी ब्रह्मचारी आत्म चैतन्य को पांच दिन हिरासत में रखा। उनकी आयुर्वैदिक औषधियों को इसलिए छीन लिया कि यह चीनियों को जहर देने के लिए लाए थे। चीन की सरकार ने कभी भी किसी अंतर्राष्ट्रीय हदबंदी को मान्यता नहीं दी है? मैकमोहन लाइन की तो बात ही छोड़ें किसी भी देश की सीमा को माना ही नहीं। जहां तक चीन की सेनाएं लांघ जाएं वहीं चीन की सीमा रेखा बन जाती है। भारत में कभी डोकलाम के नाम पर, कभी अरुणाचल प्रदेश के नाम पर और कभी दलाईलामा की देश-विदेश की यात्राओं पर चीन ने युद्ध स्थिति बनाए रखी है। हजारों वर्ग किलोमीटर भारत का भूभाग हड़प कर भी चीन भारत के शेष भूभाग पर गिद्ध दृष्टि डाले हुए है।

पाकिस्तान के आतंकवादियों को यदि संयुक्त राष्ट्र संघ आतंकवादी घोषित करने लगता है तो  चीन अपनी ‘वीटो पावर’ की शक्ति से उन्हें बचा लेता है। दूसरे देशों को चीन हमेशा विस्तारवादी, साम्राज्यवादी, सामंतवादी मनोवृत्ति का कहेगा परन्तु स्वयं कभी रूस के कजाकिस्तान, किर्गीजिया और ताजिकिस्तान पर दावा ठोक देता है तो कभी कहता है कि नेपाल 1898 से उसका हिस्सा था। कभी ‘पामीर’ क्षेत्र के लिए कहेगा कि 1896 में रूस और ब्रिटेन ने बांट लिया। कभी भारत के सिक्किम और कभी भूटान को चीन अपना भूभाग कहेगा। चीन की नजर म्यांमार, अंडेमान-निकोबार द्वीप समूह और मलेशिया पर भी है। वियतनाम, लाओस और कम्बोडिया भी चीन के राडार पर हैं। मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुर और नागालैंड के बारे प्रचार करेगा कि इन प्रांतों के लोगों के नैन नक्श चीन के लोगों से मिलते हैं अत: हमारे हैं। जापान के ‘लियु-छि’ द्वीप चीन के हैं। पूरे थाईलैंड को चीन खा जाना चाहता है।

इन परिस्थितियों में विदेश सचिव गोखले का अधिकारियों, मंत्रियों या नेताओं को पत्र जारी करना कि दलाईलामा के ‘धन्यवाद समारोह’ में कोई न जाए किस बात की ओर इशारा करता है? भारत के आतिथ्य भाव का तिरस्कार। तिब्बती शरणार्थी जो 1959 से भारत की पवित्र धरती पर पनाह लिए हुए हैं उनके मनोबल को तोडऩा। क्या किसी मंत्री या अधिकारी के इस ‘कृतज्ञता प्रकट’ करने वाले कार्यक्रम में जाने से भारत और चीन के संबंध खराब हो जाएंगे? होने दो। परन्तु भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 56’’ के सीने को छोटा न करें। अच्छा होता कि विदेश सचिव सुषमा स्वराज से मशविरा कर लेते। 

चीन विस्तारवादी देश है। तिब्बत जैसे शांतिप्रिय देश को चीन ने दुनिया के नक्शे से मिटा दिया और 12000 वर्ग किलोमीटर की भारत की सीमा को सदा-सदा के लिए असुरक्षित बना दिया। चीन के साथ तो भारत की सीमा लगती ही नहीं थी। चीन और भारत के बीच तिब्बत एक ‘बफर स्टेट’ थी। चीन को यदि भारत पर आक्रमण करना होता तो पहले तिब्बत को जीतना पड़ता। तिब्बत को चीन ने बलात् अपने देश में मिला लिया। परिणाम यह हुआ कि भारत की सीमाएं असुरक्षित हो गईं। अब चीन भारत को कभी चैन से बैठने नहीं देगा। 
 

----मा. मोहन लाल
पूर्व ट्रांसपोर्ट मंत्री, पंजाब

Hindi News से जुड़े अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करें।हर पल अपडेट रहने के लिए NT APP डाउनलोड करें। ANDROID लिंक और iOS लिंक।
comments

.
.
.
.
.