Wednesday, May 12, 2021
-->
where is kejriwals politics going after delhi elections

दिल्ली चुनाव के बाद किधर जा रही है केजरीवाल की राजनीति?

  • Updated on 2/20/2020

नई दिल्ली/कुमार आलोक भास्कर। अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) तीसरी बार दिल्ली के सीएम बन चुके हैं। आप सरकार रफ्ता-रफ्ता रफ्तार पकड़ रही है। लेकिन अरविंद केजरीवाल की यह तीसरी जीत बहुत कुछ कहती है। उन्होंने शपथ ग्रहण के बाद जिस तरह से भारत माता की जय और चुनाव प्रचार के दौरान हनुमान चालीसा पढ़ा तो कई सवाल खड़े होने लगे थे। हद तो तब हो गई जब आप विधायक सौरभ भारद्वाज (Saurabh Bhardwaj) ने घोषणा की कि हर मंगलवार को हनुमान चालीसा का पाठ किया जाएगा।

Nanha kejriwal in ramlila maidan

क से कलह, म से मुद्दे का अभाव और ल से लीडर की कमी से हारी बीजेपी ने जीती बाजी


कदम-कदम पर है देश में वीरों के निशान
अपने देश की राजनीति भी हमेशा संभावना वाले नेताओं की तलाश करती रहती है। तो उसके पीछे की वजह साफ है कि यहां कण-कण और कदम-कदम पर आदर्श तथा वीरों की कथाएं सुनी और बड़े गर्व से सुनाई जाती है। इसमें आप भगवान राम से शुरु करते हुए कृष्ण को स्वीकार करते हुए जैसे ही गत 5000 सालों के इतिहास को खंगालेंगे तो अनंत वीरों की पराक्रम की गूंज आपको सुनाई देगी। इसके ताजा उदाहरण तो आजादी के दीवानों की है, जिसने अपना बलिदान हंसते-हंसते दे दिया।

अरविंद केजरीवालः एक जिद्दी आदमी जो बना तीसरी बार दिल्ली का नायक

केजरीवाल आतुर है मोदी के विकल्प बनने के लिये
अरविंद केजरीवाल की न सिर्फ महात्वाकांक्षा को पंख लग गया है बल्कि आप नेताओं को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि नरेंद्र मोदी के मुकाबले विकल्प के तौर पर केजरीवाल बेहतरीन साबित हो सकते है। खैर इसमें कितनी सच्चाई है या नहीं- यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन यह साफ है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव को जिस तरीके से अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में शानदार जीत हासिल हुई है। उसमें केजरीवाल के लिये राजनीतिक महात्वाकांक्षा पालना कहीं से गलत नहीं है और न ही उनके समर्थकों के लिये मात्र कोरी कल्पना की ऊड़ान कहा जा सकता है।

Arvind kejriwal in a rally

सतेंद्र जैन फिर बने केजरीवाल के प्रमुख सिपहसालार, मिली यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी 

अब पीएम ऊपर से थोपे नहीं जाते
इतना तो तय है कि देश की राजनीति अब ऊपर से थोपने की बजाए राज्यों से परिपक्व होकर ऊभरती जा रही है। जैसा कि हमने देखा कि नरेंद्र मोदी लगभग 13 साल गुजरात के सीएम के तौर पर कमान संभाली तो देश ने उन्हें 2014 में स्वीकारने में समय नहीं गंवाया। जबकि पहले पीएम किसी वरिष्ठ के साथ- साथ राजनीतिक धुरंधर तथा दशकों तक देश की राजनीति करने वाले ही बना करते थे। इसकी लंबी फेहरिस्त में - अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर, वी पी सिंह, इंद्र कुमार गुजराल जैसे अनुभवी नेता थे। 

दिल्ली में करिश्माई जीत के बाद क्या राष्ट्रीय राजनीति में उतरेंगे केजरीवाल?

गांधी परिवार का रहा एक समय दबदबा
इसके अलावा यह भी देखने को मिला जब कांग्रेस की केंद्र में Majority आई तो राजीव गांधी जैसे कम राजनीतिक अनुभवी नेता भी पीएम बनें। लेकिन गांधी परिवार से ही पंडित जवाहर लाल नेहरु को देश का पीएम बनने के लिये लंबा समय का इंतजार करना पड़ा लेकिन उनकी पुत्री इंदिरा गांधी ने जल्द ही सभी वरिष्ठ कांग्रेसियों को दरकिनार करते हुए देश का पीएम बन बैठी। वो इसलिये कि उस समय गांधी परिवार का ही देश की राजनीति में सीधा-सीधा दखल रहता था। लेकिन समय बदलता रहता है। राहुल गांधी के आते-आते देश की राजनीति पूरी तरह 360 डिग्री घूम चुकी है। कांग्रेस का राजनीतिक दबदबा खत्म हो चुका है।

AAP Supporters in ramlila maidan

दिल्ली विधानसभा चुनावः बीजेपी की हार की वो 5 वजह, जिससे सपना टूट गया

केजरीवाल का मंसूबा कहीं से गलत नहीं
ऐसे में केजरीवाल के मंसूबा को कहीं से गलत नहीं ठहराया जा सकता है। लेकिन अरविंद केजरीवाल के सामने एक चुनौती है जो शायद नरेंद्र मोदी को नहीं सामना करना पड़ा। मोदी को बीजेपी जैसी मजबूत संगठन वाली पार्टी मिली है जो उनके लिये देश के कोने-कोने में भगवा झंडा को लहराने में मददगार साबित हुई है। यानी बीजेपी के पास एक मजबूत नेतृत्व के अलावा समर्पित संगठन के तौर पर कैडर भी उपल्बध है। साथ ही RSS का भी भरपूर सहयोग मिलता है।

दिल्ली विधानसभा चुनावः कांग्रेस की 5 गलतियां जिससे पार्टी को मिली करारी हार

अनेक क्षेत्रिय क्षत्रप जो हैं पीएम इन वेटिंग 
यहीं एक अंतर है जिसके कारण नीतीश कुमार, नवीन पटनायक, शरद पवार, ममता बनर्जी, मुलायम सिंह यादव, मायावती, लालू प्रसाद यादव... जैसे तमाम ऐसे क्षेत्रिय क्षत्रप है जो हसरतें तो पीएम बनने की कब से पाले हुए हैं जब से अरविंद केजरीवाल कहीं नहीं थे। लेकिन बिना देशव्यापी आधार के तुक्के से पीएम बनते भी इस देश ने देखा है। लेकिन यह मात्र अपवाद है। यह बात सही है कि अरविंद केजरीवाल को यदि लंबी लड़ाई लड़नी है तो आप पार्टी का तेजी से विस्तार करना पड़ेगा। जो आसान राह तो नहीं है। हो सकता है कि इस काम में उन्हें दशकों तक देश की माटी को समझना पड़ेगा। पूरे देश का भ्रमण करना पड़ेगा। अपनी पार्टी के भीतर ही सक्षम नेताओं को आगे बढ़ाना होगा।

Kejriwal Supporters in ramlila maidan

लगातार राज्यों में पराजय से बीजेपी में दौड़ा करंट, पार्टी करें आत्ममंथन

केजरीवाल के सामने पार्टी में लोकतंत्र स्थापित करना चुनौती 
अरविंद केजरीवाल को भी अपनी पार्टी के भीतर लोकतंत्र को जिंदा करना पड़ेगा। यह नहीं हो सकता कि आप ही पार्टी के संयोजक रहे, आप ही सीएम बने। किसी क्षेत्रिय नेता के लिये तो ठीक है लेकिन जब देश उनकी ओर देखेगी तो सर से पांव तक निहारेगी। कहीं दामन में दाग तो नहीं लगा है। आपके सामने बीजेपी और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं को पार करना इतना भी आसान नहीं है। अरविंद केजरीवाल के सामने कई ब्रेकर मौजूद है। 

केजरीवाल के करिश्मे के सामने नहीं चला मोदी-शाह का जादू  

कभी केजरीवाल ने शीला पर किया था तीखा प्रहार
विपक्ष के तौर पर अरविंद केजरीवाल की शीला दीक्षित पर किये तीखे प्रहार आज भी लोगों को याद है। लेकिन शासन में आने के बाद चाल,चेहरा और चरित्र कितनी तेजी से बदलती है उसके ताजा उदाहरण अरविंद केजरीवाल ही है। जो कभी चिदंबरम और शरद पवार जैसे नेताओं को भ्रष्टतम नेता कहते हुए थकते नहीं थे, आज गलबहिंया करते हुए देखे जा सकते हैं। इसके अलावा उनके सामने जो चुनौती है- पार्टी का एक विचारधारा बनाना, राष्ट्रीय मुद्दों पर साफ एजेंडा देश के सामने रखना जो अब तक देने में केजरीवाल असफल रहे हैं। यानी सपने को सच में तब्दील करने में अनेक घाटों का पानी केजरीवाल को पीना पड़ेगा। देश उनका समय- समय पर परीक्षा भी लेता रहेगा। लेकिन इतना तो तय है कि सबकी निगाहें अरविंद केजरीवाल के अगले कदम पर टिक गई है।

Arvind kejriwal with amit sah in a meeting

दिल्ली चुनाव परिणामः केजरीवाल के सामने चुनौतियां जो लेगी परीक्षा

राज्यों में राजनीतिक हलचल से शुरु होता है मोदी का विकल्प
हालांकि यह सच है कि जब भी देश के किसी राज्य में हलचल होती है तो लगता है कि नरेंद्र मोदी का विकल्प मिल गया है। अभी कल ही की बात है कि महाराष्ट्र में जब शरद पवार ने बीजेपी को जबरदस्त तरीके से मात दी तो कहा जाने लगा कि मोदी का विकल्प मिल गया है शरद पवार के अगले पीएम बनने की भविष्यवाणी भी की जाने लगी। उससे पहले जब दिसंबर 2018 में तीन राज्यों में बीजेपी की हार हुई तो कहा जाने लगा कि देश को पीएम नरेंद्र मोदी का विकल्प राहुल गांधी के तौर पर मिल गया है। उससे पहले जाईएगा तो कभी नीतीश कुमार ने 2015 में बीजेपी को बिहार विधानसभा चुनाव में शिकस्त दी तो कहा जाने लगा कि कांग्रेस की कमान यदि सुशासन बाबू को सौंप दिया जाए तो वे मोदी का विकल्प होंगे। यह किसी और की नहीं बल्कि प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा का वक्तव्य है।

JP Nadda ने केजरीवाल को दी जीत की बधाई, बोले- हम निभाएंगे मजबूत विपक्ष की भूमिका

एक तय पैमाना से गुजरना होगा केजरीवाल को
मतलब साफ है कि नरेंद्र मोदी का विकल्प बनने के लिये एक तय पैमाना हो गया है कि यदि आप राज्य में दुबारा चुनकर आते है तो पीएम इन वेटिंग में तो कम से कम आ ही गए है। लेकिन क्या मोदी के विकल्प पर विचार करने के लिये देश तैयार है भी या नहीं- सबसे बड़ा सवाल तो यहीं है। ऐसे में क्या जैसे ही दिल्ली की चुनावी सरगर्मी मधम-मधम होती जाएगी वैसे ही अरविंद केजरीवाल की लौ भी बुझती जाएगी या नहीं- जवाब के लिये इंतजार किजीए। 

Hindi News से जुड़े अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करें।हर पल अपडेट रहने के लिए NT APP डाउनलोड करें। ANDROID लिंक और iOS लिंक।

comments

.
.
.
.
.