Tuesday, Jan 25, 2022
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why akhilesh yadav-jayant choudhary have faith in west''''''''''''''''s victory

अखिलेश यादव- जयंत चौधरी को क्यों हैं पश्चिम फतह का विश्वास ?

  • Updated on 12/8/2021

नई दिल्ली। टीम डिजिटल। मेरठ में 7 दिसंबर को संपन्न हुई सपा-रालोद गठबंधन की रैली में उमड़े जनसैलाब को देखकर गठबंधन के नेता गदगद हैं। जयंत चौधरी और अखिलेश यादव को भी विश्वास होने लगा है कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में भाजपा को हराकर आगामी विधानसभा चुनावों में अपना पुराना परचम फहराने में पूण: कामयाबी मिलेगी। यह सब इतना आसान होगा, इसमें आशंकाएं भीं हैं।

मुजफ्फरनगर दंगों के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोकसा और विधानसभा चुनावों में सपा और रालोद का लगभग सफाया हो गया था। सबसे बड़ा नुकसान रालोद को हुआ था। वह अपनी परंपरागत सीटें भी हार गई थी। 

किसान आन्दोलन का मिलेगा लाभ
कृषि कानूनों के विरोध में शुरू हुए किसान आन्दोलन का सबसे अधिक प्रभाव पश्चिमी उत्तर प्रदेश में है। किसान आन्दोलन पूरी तरह भाजपा विरोध में बदल जाने से विरोधी दलों इसका लाभ उठाना चाहते हैं। रालोद को इसका लाभ मिलने की अधिक संभावना है।

दरअसल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिले जाट बाहुल्य हैं। जाट समाज के बीच रालोद की गहरी पैठ है। रैली में जयंत और अखिलेश ने किसान आन्दोलन का जोरशोर से जिक्र किया। किसानों की दशा के लिए केन्द्र और प्रदेश की भाजपा सरकार को जिम्मेदार ठहराया।

मुस्लिम-जाट समीकरण बनाने की कोशिश
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं पर सपा का अच्छा प्रभाव है। वहीं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम-जाट समीकरण रालोद की जीत का आधार बनता रहा है। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जाट समाज का रालोद से मोहभंग हुआ। सपा को भी लोगों के गुस्से का सामना कराना पड़ा।

फलस्वरूप, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के हाथ बड़ी कामयाबी लगी। किसान आन्दोलन के बाद तेजी से बदले माहौल में दोनों दल गठबंधन कर मुस्लिम वोटों के बिखराव को रोकने और जाट-मुस्लिम समीकरण को साधने की कोशिश में जुटे हैं।

जयंत के प्रति लोगों के मन में सहानभुति
चौधरी अजीत सिंह की मौत के बाद जाट समाज में जयंत चौधरी के लिए भावनात्मक जुड़ाव दिख रहा है। दरअसल, भूतपूर्व प्रधानमंत्री एवं किसान नेता के रूप में पहचान रखने वाले चौधरी चरण सिंह की मौत के बाद किसानों, विषेषकर जाट समाज, ने चौधरी अजीत सिंह को नेता के रूप में स्वीकार किया था।

चौधरी अजीत सिंह की मौत के बाद जयंत चौधरी के हाथों में रालोद की बागड़ोर है। वैसे तो पिछले लोकसभा चुनाव में चौधरी अजित सिंह और जयंत चौधरी को हार का सामना करना पड़ा। चौधर अजित सिंह की मौत के बाद क्षेत्र की जनता के मन में जयंत चौधरी के प्रति सहानभूति का भाव दिख रहा है जिसका लाभ आगामी विधानसभा चुनाव में रालोद को मिल सकता है।

पलायन और मुजफ्फरनगर दंगा गठबंधन की राह में अडंगा
सपा-रालोद गठबंधन भले ही पश्चिममी उत्तर प्रदेश में बन रहे माहौल को लेकर आशावान हैं, लेकिन हिन्दूओं का क्षेत्र से पलायन और मुजफ्फरनगर दंगा उनकी राह में बड़ा अडंगा अड़ा रहा है। भाजपा भी विकास के साथ पलायन और मुजफ्फरनगर दंगों को अपने प्रचार का हिस्सा बना रही है।

वहीं, लोगों को भाजपा सरकार की अपराधियों के प्रति अपनाई गई कठोर नीति भी खूब पसंद आ रही है। भाजपा भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के महत्त्व को समझती है। पिछले कुछ दिनों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मुख्यमंत्री योगीआदित्यनाथ एवं गृहमंत्री अमित शाह का दौरा इसी ओर संकेत करता है।


गठबंधन को अंतिम रूप देना चुनौती, आसान नहीं सीट बंटवारा
मेरठ में रैली में भारी भीड़ जुटाकर सपा और आरएलडी ने विरोधियों को अपनी ताकत का एहसास करा दिया है, लेकिन अभी दोनों दलों को अपने गठबंधन को अंतिम रूप देना बाकी है। सीट बंटवारे को लेकर बड़ी माथापच्ची करनी पड़ेगी। दोनों ही दलों के नेता अधिक से अधिक सीटें कब्जाने के लिए एक दूसरे पर दबाव बना रहे है। कुछ ऐसी सीटें हैं जिनको लेकर दोनों दलों के बीच मतभेद उभर सकते हैं। वहीं, यह भी देखना होगा कि गठबंधन को दोनों दलों के नेता ही स्वीकार न करें। पार्टी के आम कार्यकर्ता भी दिल से स्वीकार करें। अन्यथा लोगों ने सपा और बसपा तथा सपा और कांग्रेस सहित कई गठबन्धनों का भी हस्र देखा है।

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