Sunday, Nov 28, 2021
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why did you become special, from mount 4 to 7 of rakhigarhi

आखिर क्यों बन गए खास, राखीगढी के माउंट 4 से 7

  • Updated on 10/5/2021

नई दिल्ली/अनामिका सिंह। हड़प्पा सभ्यता की भारत में सबसे बडी साइट राखीगढी को जब-जब पुरातत्वविदों द्वारा उत्खनित किया गया। तब- तब पुरातत्वविदों को कुछ ना कुछ चैंकाने वाले अवशेष वहां से प्राप्त हुए हैं। वहीं यहां इतिहास की परतों को खोलने वाले पुरातत्वविद् हमेशा से ही माउंट 4 से 7 तक को काफी खास बताते रहे हैं।

जिन्होंने लिखित इतिहास की पुरानी अवधारणाओं को बदल दिया और दोबारा से सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया है। इसे लेकर हमने पुरातत्वविद् व राखीगढी में उत्खन्न करने वाले डक्कन काॅलेज के प्रोफेसर वंसत शिंदे से बातचीत की। जिसमें उन्होंने 4 से 7 नंबर माउंट की खासियत को बताया। तो आइए जानते हैं क्यों खास हैं पुरातत्वविदों के लिए ये चारों माउंट।
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हडप्पा सभ्यता के निरंतर विकास की मिली जानकारी
डाॅ. वसंत शिंदे बताते हैं कि राखीगढी में माउंट 4 से 7 का जब उत्खन्न किया गया तो वहां हमें मकानों के ढांचे त्रिकोने व चैरस आकार के प्राप्त हुए। जबकि इससे पहले गोलाई में मकान बनाए जाते थे।

पहली बार यहीं चरणबद्ध तरीके से प्लानिंग वे बनाए गए मकान हमें देखने को मिले जो शहरीकरण का हिस्सा थे। उसमें भी उच्चवर्ग व निम्नवर्ग के मकानों को अलग-अलग तरह से विभाजित किया गया था। अधिकतर मकानों में अनाज के भंडारण के लिए जगह बनाई गई थी।

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बर्तनों में भी दिखी विविधता
डाॅ. शिंदे का कहना है कि यहां बर्तनों में विविधता देखने को मिली है। हडप्पा सभ्यता के शुरूआती दौर में हाथों से बने बर्तनों का प्रयोग लोग किया करते थे लेकिन धीरे-धीरे चाक या पहिए का इस्तेमाल शुरू हो गया, जिसके अवशेष यहां देखने को मिले।

इसके अलावा चुल्हें का प्रयोग, मनके के आभूषण व टेराकोटा के आभूषण के अलावा खिलौने भी यहां से प्राप्त हुए। यहां पालतू जानवरों जैसे बैल, कुत्ते, सुअर इत्यादि के खिलौने मिलना यह बताता है कि लोग पशुपालन किया करते थे और पशुधन उनके लिए काफी महत्व रखता था।
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माउंट 7 ने बदला इतिहास
डाॅ. शिंदे कहते हैं कि जब माउंट 7 का उत्खन्न किया गया जोकि एक कब्रगाह था तो वहां से हमें चैंकाने वाले सबूत मिले। हालांकि 50 फीसदी कब्रों को ही पूरी तरह निकाल पाए थे। कंकालों के साथ बर्तन, गहने व अन्य वस्तुएं भी प्राप्त हुईं। 50 फीसदी कब्रें वहां गांव के लोगों द्वारा खेती करने की वजह से खराब हो गईं थीं। यहां कुल 60 कब्रें हमें प्राप्त हुई थीं। जिससे हमें हडप्पा के लोगों की अंतिम क्रिया के बारे में जानकारी प्राप्त हुई थी।
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3डी रिकंस्ट्रक्शन में हडप्पन की कदकाठी हरियाणा के लोगों से मैच कर गई
डाॅ. शिंदे ने कहा कि हमने कंकालों का डीएनए निकालकर स्टडी के लिए भेजा व 3डी रिकंस्ट्रक्शन करवाया। जिसमें हडप्पन लोग वैसे ही दिखे जैसे आज भी हरियाणा के लोग दिखते हैं। 6 फीट लंबे और शाॅर्प फीचर वाले। यह नरकंकाल 4500 साल पुराने हैं। साथ ही डीएनए में उनकी जिंस साउथ-एशिया से मिलती पाई गई।

हालांकि इसे नकारा नहीं जा सकता कि व्यापारिक संबंधों के चलते ईरान, मैसोपोटामिया व मध्य एशिया के साथ उनके संबंध नहीं थे। इसी मूवमेंट के चलते जिंस में मिक्सिंग भी हुआ है। लेकिन डीएनए स्टडी से साफ है कि हडप्पन लोग भारतीय उपमहाद्वीप के मूल निवासी थे, जिसकी पहली बार वैज्ञानिक आधार पर पुष्टि हुई है।
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