Friday, Apr 19, 2019

आखिर जनता को किसी भी राजनीतिक दल पर भरोसा क्यों नहीं

  • Updated on 3/29/2019

इस समय जबकि देश में चुनाव बुखार पूरे यौवन पर है, बेंगलूरू के अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय तथा दिल्ली स्थित ‘लोकनीति सैंटर फार द स्टडी आफ डिवैङ्क्षल्पग सोसायटीज’ नामक शोध संस्थान ने संयुक्त रूप से 12 राज्यों में करवाए गए एक राष्टï्रव्यापी सर्वेक्षण की रिपोर्ट जारी की है। 

‘चुनाव (2019), राजनीति और समाज’ शीर्षक के अंतर्गत यह रिपोर्ट पंजाब, उत्तर-प्रदेश, उत्तराखंड, बंगाल, असम, जम्मू-कश्मीर, केरल, मिजोरम, नागालैंड तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में करवाए गए  सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की गई है। 

इसमें बताया गया है कि देश में लोग किस पर सबसे अधिक और किस पर सबसे कम भरोसा करते हैं। इसके अनुसार भारतीय सेना सर्वाधिक विश्वसनीय संस्था है जिस पर 88 प्रतिशत लोग भरोसा करते हैं।

विश्वसनीयता के मामले में सेना के बाद न्यायपालिका दूसरे स्थान पर आती है। सुप्रीमकोर्ट, हाईकोर्ट तथा जिला अदालतों सहित न्यायपालिका पर देश की 60 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या को विश्वास है। 

राजनीतिक दल विश्वसनीयता के मामले में सबसे नीचे की पायदान पर हैं।  राजनीतिक दलों का विश्वसनीयता प्रतिशत ‘माइनस 55 प्रतिशत (नैगेटिव)’ है। इसका मतलब यह है कि राजनीतिक दलों पर विश्वास करने वालों की तुलना में इन पर विश्वास न करने वालों की संख्या कहीं अधिक है।

सरकारी अधिकारियों और पुलिस पर भी लोगों को विश्वास नहीं रहा। इस सर्वे में विभिन्न संस्थाओं की विश्वसनीयता का आकलन करने के अलावा गवर्नैंस, यौनाचार (सैक्सुएलिटी), लैंगिक विचारधारा, राष्टï्रवाद, जाति, धर्म तथा पापुलिज्म (लोक लुभावनवाद) आदि का भी जायजा लिया गया।

सर्वेक्षण में 30 प्रतिशत लोगों ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर राष्ट्र गीत गाने के दौरान खड़े न होने वालों को सजा देनी चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया कि राष्ट्र और राष्ट्रवाद की अवधारणा पर देश में हमेशा ही विचार-विनिमय और वाद-विवाद होता रहा है जो पिछले कुछ वर्षों के दौरान बहस का बहुत बड़ा मुद्दा बन गया है।

इस मामले में लोग अब अपनी मान्यताओं और आचरण के आधार पर 2 समूहों में बंट गए हैं जिनमें से एक राष्टï्रवादी और दूसरा राष्ट्रविरोधी है। हिन्दी भाषी राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, दिल्ली और उत्तराखंड आदि में लोगों ने राष्टï्रवादी सोच को दर्शाया है। 

इन राज्यों में उत्तराखंड को छोड़ कर लगभग 40 प्रतिशत लोग इस बात से सहमत हैं कि राष्टï्र गान के लिए खड़े न होने वाले लोगों को सजा दी जानी चाहिए। 

सर्वे में पंजाब, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और उत्तराखंड जैसे राज्यों में, जहां गौ हत्या पर पूर्णत: प्रतिबंध है, बीफ खाने पर सजा की मांग की गई है जबकि केरल, मिजोरम और नागालैंड जैसे राज्यों में गौमांस के सेवन पर सजा की मांग को खारिज कर दिया गया है। 

इसी रिपोर्ट के अनुसार सर्वे में शामिल 20 प्रतिशत लोगों ने बेरोजगारी को अकेली सबसे बड़ी समस्या बताया। इनके अनुसार देश इस समय जो सबसे बड़ी समस्या का सामना कर रहा है वह बेरोजगारी ही है। 

इस समय जबकि विभिन्न राजनीतिक दल मतदाताओं से लम्बे-चौड़े लोक-लुभावन वादे कर रहे हैं, उक्त रिपोर्ट ने राजनीतिक दलों और नेताओं की कथनी और करनी में अंतर का पर्दाफाश किया है।

वैसे भी अतीत का अनुभव यही बताता है कि चुनावों के अवसर पर राजनीतिक दल और नेता मतदाताओं से जितने वादे करते हैं उनमें से अधिकांश वादे पूरे नहीं किए जाते लिहाजा इन चुनावों में मतदान करते समय मतदाताओं को अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं को एक ओर रखकर अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए सबसे सही उम्मीदवार को ही वोट देना चाहिए। राजनीतिक दलों के लिए भी यह रिपोर्ट एक चेतावनी है कि वे यह देखें कि लोगों की नजरों में उनकी प्रतिष्ठा क्यों गिर रही है।                                                                                                                   —विजय कुमार  

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