Friday, Apr 19, 2019

हिन्दू धर्म छोड़कर क्यों बौद्ध धर्म के हुए अम्बेडकर?

  • Updated on 10/14/2017

Navodayatimesनई दिल्ली/टीम डिजिटल। हिन्दू धर्म की कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाते हुए भारतीय संविधान के जनक डॉ बीमराव अम्बेडकर ने एक बड़े सम्मेलन में 4 लाख से भी ज्यादा लोगों की साथ हिन्दू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म अपनाया। 

तारीख: 14 अक्टूबर 1956
स्थान:  नागपुर (दीक्षा भूमि)

नागपुर का ये सम्मेलन कई मायनों में खास था और भारतीय इतिहास और राजनीति की धुरी बदलने वाला था। आज के दिन डॉ बीमराव अम्बेडकर ने नागपुर के एक सम्मेलन में अपने समर्थकों के साथ हिन्दू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया था। ये पूरी दुनिया में धर्म परिवर्तन की अबतक की सबसे बड़ी घटना थी। 

अम्बेडकर का जन्म एक अछूत और निचली महार जाति में हुआ था। हिन्दू धर्म ग्रंथों का अध्ययन करने वाले अम्बेडकर हिन्दू धर्म की छूत-अछूत प्रथा के सख्त खिलाफ थे। ऊंची जातियों का निचली जातियों पर किया जाने वाला जातिगत अमानवीय व्यवहार ही अम्बेडकर के धर्म परिवर्तन का कारण बना। वो मानते थे कि सिर्फ सामाजिक स्तर पर ही नहीं बल्कि कानूनी तौर पर इस भेदभाव से निपटा जा सकता है। डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर जिदंगी भर जाति व्यवस्था को खत्म करने का प्रयास करते रहे, हिंदुओं को एकजुट करने का प्रयास करते रहे। लेकिन जीवन के अंतिम समय में थककर उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया। 

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अछूत जाति की वजह से तांगेवाले ने ले जाने से किया था मना

अम्बेडकर ने कहा था कि 'मैं हिन्दू जन्मा जरूर हूं इसमें मेरा कोई बस नही था लेकिन मैं हिन्दू रहकर मरूंगा नहीं।' आज भी उनके कहे शब्द दलितों को प्रेरित करते हैं। अम्बेडकर को ऐसे ही जातिगत दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा जिसका उन्हें शारीरिक और मानसिक तौर पर बड़ा कष्ट हुआ। एक बार खानदेश के दौरे पर स्टेशन पर दालितों ने उनका खूब स्वागत किया। वहीं उन्हें तांगे पर सवारी करके जाना था लेकिन तांगेवाले ने उनके साथ बैठकर जाने से मना कर दिया ये कहकर कि वो अछूत जाति के हैं। जिसके बाद अछूत जाति के तांगे वाला उन्हें लेकर चला जोकि नौसीखिया था जिस वजह से तांगा पलट गया और अम्बेडकर को गंभीर चोटों आई। उन्हें लबें वक्त तक पैर की चोट परेशान करती रही।

प्यास लगने पर भी नहीं मिलता था पानी

अम्बेडकर पढ़ने-लिखने में तेज थे लेकिन केवल छोटी जाति का होने की वजह से उन्हें नीच जाति के दूसरें बच्चों के साथ स्कूल के बाहर बिठाया जाता था। उनको क्लास में ना बैठाने की वजह थी नीच जाति के साथ बैठने से ऊंची जाति के बच्चे दूषित हो जाते थे। ज्यादातर अध्यापक भी इन बच्चों की पढाई-लिखाई पर ध्यान नहीं देते थे और न ही मदद करते थे। 

छुआछूत और भेदभाव का अमानवीय व्यवहार इतना ज्यादा था कि इन बच्चों को प्यास लगने प‍र स्कूल का चपरासी या कोई अन्य ऊंची जाति का आदमी ऊंचाई से उनके हाथों पर पानी गिराकर उन्हें पिलाता था, क्योंकि उनको न तो पानी, न ही पानी के बर्तन को छूने की अनुमति नहीं थी। ऊंची जाति के लोंगो की मान्यता थी कि ऐसा करने से पानी की बर्तन और पानी दोनों अपवित्र हो जाएगा। कई बार पानी पिलाने के लिए कोई ना होने पर उन्हें प्यासा ही रहना पड़ता था।

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हिन्दू कोड बिल का विरोध, छोड़ा मंत्रिपद

आजादी के बाद नेहरू के मंत्रिमंडल में अम्बेडकर कानून मंत्री बने जहां उन्होंने हिन्दू कोड बिल लागू करने की मांग की जिसका जबरदस्त विरोध हुआ। विरोध इतना था कि अम्बेडकर ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। लेकिन बाद में हिंदू कोड बिल लागू हुआ। 

उपनाम को लेकर मतभेद

सकपाल अम्बेडकर का उपनाम था लेकिन समाज में छोटी जातियों के साथ होने वाले व्यवहार से बचने के लिए उन्होंने अम्बेडकर उपनाम रख लिया जोकि उनके ऊंची जाति के शिक्षक का उपनाम था जिससे भीमराव प्रेरित थे। लेकिन कई लोगों का कहना है कि अम्बेडकर के पैतृक गांव का नाम अम्बेडकर होने की वजह से उन्होंने ये नाम चुना। उनका मराठी परिवार अंबावडे नगर (जोकि अब महाराष्ट्र के रत्नागिरी में है) से जुड़ा था और कबीर पंथ से जुड़ा हुआ था। 
 

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