Monday, Mar 25, 2019

पाकिस्तान को क्यों झेलता रहे भारत?

  • Updated on 2/16/2019

नई दिल्ली/अश्विनी भटनागर। कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी हमले ने भारत को उसी पुराने चौराहे पर ला खड़ा किया है, जहां से हर कदम घूम-फिरकर पुरानी यथा स्थिति पर हमको ला देता है। यह जगजाहिर है कि पाकिस्तान में पल रहे आतंकी संगठन की यह करतूत है और जैश-ए-मोहम्मद ने हमले की जिम्मेदारी भी ले ली है।

इस वीभत्स घटना ने एक तरफ  राष्ट्र को स्तब्ध कर दिया है तो दूसरी ओर यह सोचने पर भी मजबूर कर दिया है कि हम पाकिस्तान को क्यों झेलें, हम उससे दोस्ती के लिए क्यों प्रयासरत रहें?

अगस्त में पाकिस्तान में हुए चुनावों के बाद इमरान खान के सत्ता में आने से कुछ हलकों में यह चर्चा शुरू हो गई थी कि नए प्रधानमंत्री भारत से शांति कायम करने के लिए कदम बढ़ाएंगे।  इमरान खान के कुछ बयान भी शुरुआती दिनों में इस संदर्भ में आए थे। कॉरिडोर की नींव जब रखी गई थी तो अमन की आशा थोड़ी जगी थी।

दरअसल, चुनावों में पाकिस्तान की तमाम आतंकी संगठनों को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा था। भारत के कुछ विशेषज्ञों का कहना था कि उनकी हार का कारण आम अवाम का कट्टरपंथियों से मोह भंग होना था पर यह विश्लेषण ठीक नहीं था। यह पाकिस्तान फौज की रणनीति थी। चरमपंथियों को ‘रन आउट’ करना फौज के लिए जरूरी था।

फौज नहीं चाहती थी कि उसके द्वारा पोषित नॉन-स्टेट प्लेयर्स, स्टेट प्लेयर्स हो जाएं और उसके कामकाज में दखलंदाजी करने की स्थिति में आ जाएं। पाकिस्तानी फौज के लिए जरूरी था कि आतंकी संगठन फौज के साए में ही रहें, मोहताज बने रहें और उसके इशारे पर ही हरकतों को अंजाम दे। चुनावी जीत उन्हें बेलगाम कर देती और फौज के हाथ से नकेल छूट जाती।

वास्तव में जो कुछ भी हुआ है, वह फौज द्वारा पाकिस्तानी लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपने तरीके से चलाने की रणनीति के तहत हुआ है। चुनाव की प्रक्रिया लोकतांत्रिक सरीखी जरूर थी पर उसका नतीजा पूरी तरह से फिक्स्ड मैच की तरह था। ऐसी स्थिति के चलते हमें पाकिस्तान से और भी ज्यादा चौकन्ना हो जाना चाहिए था। पाकिस्तानी फौज आतंकी संगठनों का भरपूर उपयोग करने जा रही थी।

पाकिस्तान की 70 साल से अपनाई हुई चाल, उसका चरित्र और फौज की भूमिका को मद्देनजर रखते हुए कोई भी नरम नीति या दोस्ताना पहल खामख्याली का एक नया उदहारण ही सिर्फ साबित हो सकता था। पाकिस्तान पूरी तरह से जनरलों के कब्जे में है और हिंदुस्तान के प्रति उनका क्या रवैया है यह जगजाहिर है।

चाहे वह कश्मीर का मुद्दा हो या फिर खालिस्तान का या फिर भारत के खिलाफ अघोषित युद्ध चलाने की उनकी वर्षों पुरानी मुहिम हो, सभी अपनी जगह कायम है। इमरान खान के आने से उसमे कोई परिवर्तन नहीं होना था। संभावना इसकी ज्यादा थी कि फौज इमरान खान के तेज-तर्रार मिजाज और आक्रामक खेलने की शैली का फायदा अपने एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए करे। ‘पोस्टर बॉय’ इमरान की मजहबी जुबान को हथियारों से लैस करके फौज ने हमारे देश में और बड़ा संकट पैदा कर दिया है। 

पकिस्तान बर्बादी की कगार पर है। वहां आर्थिक संकट गहरा रहा है, सिविल सोसाइटी तहस-नहस हो चुकी है, मोहाजिर अपने हाल पर रो रहे हैं और सिंध-बलूचिस्तान प्रांत पाकिस्तान का हिस्सा नहीं रहना चाहते हंै। उधर चीन अपने दमखम और खरीद-फरोख्त के जरिये पाकिस्तान के एक बड़े हिस्से पर अपनी प्रभुसत्ता कायम कर चुका है। अफगानिस्तान पहले ही अपना पल्लू झाड़ चुका है।

इतना कुछ होने के बावजूद भारत जैसे देश को ऐसी कौन-सी जरूरत है कि वह पाकिस्तान से दोस्ती बढ़ाने या निभाने के लिए आतुर हो? पहले अमरीकी और यूरोपीय दवाब होने की दलील दी जाती थी। अब वह दलील भी खारिज हो चुकी है। अब वह समय आ गया है कि भारतीय नीति अपनी आखें पाकिस्तान से फेर ले।

पड़ोसी से दुआ-सलाम से भी बचे पर साथ में उस पर कड़ी नजर रखे। कई सेंधें लग चुकी हैं, उनको सिर्फ भरना ही नहीं है बल्कि नई सेंध लगने से पहले अपनी दीवारों को और मजबूत भी करना है। हमले की प्रतिक्रिया में भारत ने पाकिस्तान र्से मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा छीन लिया है पर यह नाकाफी है।

हमें पाकिस्तान से अब हर प्रकार का रिश्ता तोड़ लेना चाहिए। एक तरह से हर वह दरवाजा और खिड़की बंद कर देनी चाहिए, जिससे वह ताकझांक करता है। द्विपक्षीय संबंधों को खत्म करने के आलावा भारत को उन सभी फोरम से हट जाना चाहिए, जिन पर पाकिस्तानी उपस्थिति हो और सबसे जरूरी यह है कि भारत को पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित कर देना चाहिए। इस तरह के बेहद सख्त कदम अब बहुत जरूरी हो गए हैं।

Hindi News से जुड़े अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करें।हर पल अपडेट रहने के लिए NT APP डाउनलोड करें। ANDROID लिंक और iOS लिंक।
comments

.
.
.
.
.