Sunday, Feb 18, 2018

क्या 28 साल बाद की 'रथयात्रा' राम को पहुंचा पाएगी अयोध्या?

  • Updated on 2/13/2018

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। आज से 28 साल पहले  25 सितंबर 1990 को एल के आडवाणी ने एक धार्मिक-राजनीति रथ यात्रा निकाली। भगवान श्री राम के नाम पर। एक बार फिर रामराज्य रथ यात्रा के लिए रथ तैयार हो चुका है। यह यात्रा महाशिवरात्रि के पर्व पर 13 फरवरी से शुरू होगी। रथ यात्रा अयोध्या से शुरु होकर रामेश्वरम में जाकर खत्म होगी। माना जा रहा है कि रथ यात्रो को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हरी झंडी दिखा सकते हैं। श्रीराम दास मिशन यूनिवर्सल सोसाइटी ये यात्रा आयोजित करा रही है। इसका उद्देश्य साफ है, श्रीराम जन्मभूमि पर राम मंदिर का निर्माण हो। 

देश की एक बड़ी उन्मादी भीड़, 'लाठी गोली खाएंगे, मंदिर वहीं बनाएगे' के नारे लगाते हुए सोमनाथ से अयोध्या की तरफ बढ़ती चली। आडवाणी की सोमनाथ से लेकर अयोध्या तक की यात्रा के कई ऐतिहासिक मायने हैं। इस यात्रा ने कई राजनीतिक चेहरों का नाम दिया, पहचान दी। 

बाबरी मस्जिद-राम मंदिर का मसला आज भी नहीं सुलझा लेकिन इस यात्रा ने 2 की संख्या से शुरु हुई भाजपा को 3 अंकों का कर दिया। रातोंरात भाजपा एक ऐसी पार्टी बन गई जिसने राजनीति में अपनी नींव मजबूत करी। हिंदुत्व के नाम से पहचानी जाने वाली भाजपा आज भले ही खुद को इससे अलग रख कर देखती हो लेकिन सच यही है रथ यात्रा से उपजी राजनीति ने कई बड़े चेहरों को राजनीतिक पटल पर पहचान दिलाई। 

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तो क्या एक बार फिर ये यात्रा उस 28 साल पुराने समय को दोहराना चाहती है। मंदिर को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बहस लगातार हो रही है। दोनों ही पक्ष किसी नतीजें पर पहुंचने के लिए रास्ता निकाल रहे हैं। ऐसे में ये रथ यात्रा क्यों?

क्या वजहें हो सकती है जो खुद प्रदेश की योगी सरकार ऐसी किसी भी यात्रा से एतराज नहीं रखती, जब प्रदेश में पहले से ही माहौल ठीक नहीं है। कासगंज हमला इसकी एक बानगी भर है। 

भाजपा ने जिस यात्रा से अपनी पहचान बनाई और आज की तारीफ में देश के लगभग 25 राज्यों में राज कर रही भाजपा क्या जरुरत पड़ गई ऐसी यात्राओं की?

ये रथ यात्रा क्या 2019 की तैयारी है? क्या एक बार फिर 5 साल राज करने के बाद 2019 में होने वाले चुनावों के लिए जमीन तैयार कर रही है। देश में एक बार हिंदू और राम के नाम पर वोट बटोरने की कवायद है?

एक जो सबसे अहम बात सामने आती है कि क्या ये एक टेस्टिंग फेज हैं जिसमें इस यात्रा को उत्तर से दक्षिण ले जाकर ये देखा जाएगा कि वाकई हिंदुत्व को मुद्दे को कितना समर्थन हासिल है। क्या इस यात्रा से पुराने जंग लगे और धूल खा रहे मुद्दों को फिर से मैदान में उताकर तय किया जाएगा कि 2019 का चुनाव किस आधार पर लड़ा जाएगा?

फिलहाल मसला कोई भी हो लेकिन 6 राज्यों से यात्रा निकाली जाएगी। इसकी सुरक्षा का जिम्मा राज्य सरकारों का है। ऐसे में ये यात्रा आम धार्मिक यात्राओं की तरह की जाएगी या इसे मंदिर के नाम पर और कोई रंग देने की कवायद है?

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