Monday, Jun 14, 2021
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will kejriwal enter national politics after charismatic victory in delhi

दिल्ली में करिश्माई जीत के बाद क्या राष्ट्रीय राजनीति में उतरेंगे केजरीवाल?

  • Updated on 2/11/2020

नई दिल्ली/कुमार आलोक भास्कर।  दिल्ली विधानसभा चुनाव (Delhi Assembly Election) में आप पार्टी की ऐतिहासिक जीत पर देश भर से भी अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) को बधाई मिल रही है। इससे इस कयास को बल मिला है कि अरविंद केजरीवाल दिल्ली की राजनीति से ऊपर उठकर देश की राजनीति में सक्रिय होंगे। हालांकि अरविंद केजरीवाल ने 2014 में एक बार जरुर प्रयास किया था कि राष्ट्रीय राजनीति में हाथ आजमाने का जब वे सीधे उस समय बीजेपी के तरफ से पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) को चुनौती देने बनारस की गलियों में घूमने लगे थे। लेकिन उस समय चुनाव परिणाम के साथ ही अरविंद केजरीवाल का राष्ट्रीय राजनीति से मोहभंग हो गया। 

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केजरीवाल की देश भर में बढ़ी मांग
उसके बाद अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की राजनीति पर ध्यान देना केंद्रित कर दिया। जिसका परिणाम यह रहा कि दिल्ली विधानसभा चुनाव 2015 में 70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा में आप पार्टी को 67 सीटें आ गई। लेकिन इतनी बड़ी जीत के बाद भी केजरीवाल ने राष्ट्रीय राजनीति में सीधे दखल देने से परहेज किया। हालांकि कई मौके पर विपक्षी पार्टियों के साथ ताल से ताल मिलाकर पीएम मोदी को घेरने की कोई मुहिम नहीं छोड़ी। लेकिन लोकसभा 2019 के चुनाव परिणाम के बाद से अचानक अरविंद केजरीवाल ने पीएम मोदी के खिलाफ अपनी रणनीति बदल ली। उन्होंने सभी पार्टियों के मोदी विरोध का राग अलापने से दूरी बना ली।


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केजरीवाल की पहली जीत नहीं थी इत्तेफाक
लेकिन आज के दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम से साबित हो गया कि केजरीवाल की पहली वाली जीत कोई इत्तेफाक नहीं थी। फिर से दिल्ली की जनता ने उन्हें अपना सीएम बरकरार रखा है। तो अब सवाल उठता है कि दिल्ली से बाहर पंजाब में भी अपना संगठन खड़ा करने में कामयाब रहे केजरीवाल को राष्ट्रीय राजनीति में सीधे पीएम नरेंद्र मोदी को चुनौती पेश करनी चाहिये। यह अब लोगों के जेहन में घर कर चुका है कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी किसी भी तरीके से नरेंद्र मोदी को चुनौती देने में सफल नहीं हो रहे है। 

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पीएम मोदी को चुनौती देने पर विचार कर सकते है केजरीवाल

कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केजरीवाल को 2024 के लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी को सीधे टक्कर देनी चाहिये। ताकि बीजेपी केंद्र की सत्ता में फिर से न आ सकें। इसके लिये सबसे उपयुक्त नेता के तौर पर केजरीवाल की स्वीकार्यता बढ़ सकती है। विपक्षी पार्टियों की यहीं कमजोर कड़ियों का फायदा बीजेपी उठाती रही है। लेकिन चतुर अरविंद केजरीवाल इस हकीकत को जानता है कि बीजेपी का रास्ता रोकने के लिये उनके पास देशव्यापी संगठन नहीं है और दूसरा विपक्षी पार्टियों में उनके नाम पर सहमति नहीं है।

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आप पार्टी को करना होगा खड़ा देशव्यापी नेटवर्क

इसलिये वे राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखने से पीछे हट जाते है। क्योंकि उन्हें यह अच्छी तरह पता है कि उनकी पार्टी सिर्फ पंजाब तक पैर जमाने में आंशिक सफलता हासिल की है। इसके वाबजूद देश भर में उनके प्रशंसको की कमी नहीं है जो यह मानते है कि केजरीवाल ही सीधे नरेंद्र मोदी को टक्कर देने में सक्षम हो सकते है। इसके लिये उन्हें सबसे पहले अपनी पार्टी का तेजी से नेटवर्क तैयार करना पड़ेगा। वहीं उनके नाम पर सभी दलों में सहमति शायद ही बन पाएगी। कारण स्पष्ट है कि जितने भी क्षेत्रिय दलों के नेता है वे भी अपने राज्य में कद्दावर है तथा कई बार सीएम बन चुके है। जैसे नीतीश कुमार,नवीन पटनायक,अखिलेश यादव,मायावती,शरद पवार जैसे नेता कभी-भी अरविंद केजरीवाल को अपना नेता नहीं मानेंगे।

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कमजोर बीजेपी के इंतजार में है केजरीवाल
लेकिन बहुत बड़ा सवाल है कि अरविंद केजरीवाल क्या मनीष सिसोदिया को सत्ता सौंप कर देश की राजनीति करने का हौसला रखते है? या अब भी वे सही समय का इंतजार कर रहे है जब बीजेपी कमजोर हो जाएं जैसे कि दिल्ली की राजनीति में 2013 में शीला दीक्षित के नेतृत्व से तंग आकर जनता ने उनमें अपना नायक वाली छवि देखी थी। उस समय तो जनता यह नहीं परखी कि आप पार्टी के पास बीजेपी की तरह संगठन है या भी नहीं- सीधे सत्ता की चाबी केजरीवाल को सौंप दी थी। अगर ऐसे समय का वे इंतजार कर रहे है कि ठीक इसी तरह बीजेपी के कमजोर होने और मोदी के विकल्प के तौर पर जनता के छटपटाहट को दूर करने के समय ऐन वक्त पर राष्ट्रीय राजनीति में छलांग लगाएंगे कि सभी विपक्षी पार्टियां हक्के-बक्के रह जाएगी। फिलहाल केजरीवाल के अगले कदम पर सबकी निगाहें रहेगी। 

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