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क्या ‘प्रियंका’ कांग्रेस में हो रहे क्षरण को रोक पाएंगी

  • Updated on 7/24/2019

कांग्रेस (Congress) महासचिव प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi) वाड्रा ने गत सप्ताह सोनभद्र जाकर पार्टी को एक नई राह दिखाई, जहां एक जमीनी झगड़े को लेकर कथित रूप से गांव के सरपंच द्वारा 10 जनजातीय लोगों की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। जहां सपा तथा बसपा जैसी अन्य विपक्षी पार्टियां सोई रहीं, प्रियंका ने जुआ खेल दिया, यहां तक कि जब पुलिस ने उन्हें रोक दिया था। प्रियंका ने कहा कि वह केवल पीड़ित परिवारों के साथ संवेदना व्यक्त करने के लिए गांव जाना चाहती थीं। उन्होंने जमानती बांड भरने से इंकार करते हुए एक रात मिर्जापुर के सरकारी गैस्ट हाऊस में गुजारी।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह (Digvijaya Singh) ने उनके दौरे की तुलना इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) के बेलची दौरे के साथ करते हुए ट्वीट (Tweet) किया कि ‘आपका यह कदम इंदिरा जी की बेलची यात्रा की याद दिलाता है। प्रियंका जी आप संघर्ष करें, हम सब आपके साथ हैं।’ वह 1977 में पराजय के बाद इंदिरा गांधी के बड़े राजनीतिक पल का हवाला दे रहे थे, जब वह बिहार के बेलची गांव में गई थीं, जहां दलितों का नरसंहार हुआ था। यहां तक कि गांव पहुंचने के लिए उन्होंने एक हाथी की सवारी की। प्रियंका ने प्रभावित परिवारों से मिले बिना वापस लौटने से इंकार करके ऐसा ही प्रयास किया और कम से कम दो दिनों तक मुख्य समाचारों में बनी रहीं। 

प्रियंका के दौरे ने स्थानीय कांग्रेस में खुशी की एक लहर दौड़ा दी है क्योंकि उनका पहले का प्रचार चमक खो चुका था, जब वह अपने भाई राहुल गांधी की अपने पारिवारिक गढ़ अमेठी से भी सीट नहीं बचा पाई थीं। ‘ब्रह्मास्त्र,’ जैसा कि पार्टी उन्हें कहती थी, काम नहीं आया। प्रियंका अभी तक शांत थीं लेकिन उन्होंने अपने खुद के बेलची पल के साथ पहला राजनीतिक अवसर लपक लिया है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि गोलीबारी राज्य में कानून व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति का नवीनतम संकेत है।

उत्तर प्रदेश के लिए रणनीति
प्रियंका का दौरा उनकी उत्तर प्रदेश को लेकर रणनीति का एक हिस्सा था। उनका लक्ष्य 2022 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव हैं। अब चूंकि उन्हें पूरे राज्य की महासचिव प्रभारी बना दिया गया है, वह इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर ध्यान दे रही हैं कि पार्टी को कैसे बनाया जाए। 2009 के अतिरिक्त अतीत के चुनावों में दशकों तक कांग्रेस का प्रभाव मुख्य रूप से मामूली रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को निशाना बनाकर किए गए उनके ट्वीट तथा टिप्पणियां इसी लक्ष्य की ओर हैं।

एक अन्य स्तर पर, राहुल गांधी को अपना इस्तीफा वापस लेने के लिए मनाने के असफल प्रयासों के बाद, कांग्रेस खुद को गांधियों के दौर के बाद के लिए तैयार कर रही है। परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति द्वारा इच्छा न जताने पर क्या पार्टी प्रियंका गांधी को उनके भाई के स्थान पर चुनेगी? इसके लिए उन्हें पुराने पार्टी नेताओं के समर्थन की जरूरत है लेकिन 2019 के चुनावों में पराजय के बाद प्रियंका ने 25 मई को कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में प्रतिक्रिया व्यक्त की थी कि पराजय के लिए जिम्मेदार लोग कमरे में मौजूद हैं, से वरिष्ठ पार्टी नेता व्यथित हैं। भीतरी लोगों के अनुसार प्रियंका ने कहा था कि कांग्रेस के ‘हत्यारे’ इस कमरे में बैठे हैं।

पुराने कांग्रेसियों की चुप्पी
यही कारण है कि पुराने पार्टी नेताओं की ओर से मूक प्रतिक्रिया मिली है। इसके साथ ही कांग्रेस नेताओं ने खुल कर उनके नाम को आगे नहीं बढ़ाया। राहुल गांधी ने कहा था कि पार्टी को इस पद के लिए नेहरू-गांधी परिवार की बजाय किसी बाहरी व्यक्ति को ढूंढना चाहिए। मगर अब कांग्रेस नेताओं श्रीप्रकाश जायसवाल तथा भगत चरणदास के नेतृत्व में प्रियंका के लिए एक लॉबी ने मांग की है कि प्रियंका को आगामी अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए।

जहां पार्टी राहुल के उत्तराधिकारी को लेकर ढिलमुल रवैया अपनाए हुए है, वहीं भीतरी लोगों का कहना है कि समस्या यह लग रही है कि गांधी परिवार में ही कोई सर्वसम्मति नहीं है। प्रियंका पार्टी की कमान सम्भालने के विरुद्ध नहीं हैं, यद्यपि सोनिया अपने बेटे को अपना इस्तीफा वापस लेने के लिए मनाना चाहेंगी और यह स्पष्ट नहीं है कि परिवार क्या निर्णय लेगा।

अनुभव की कमी
यदि चुनी गईं, क्या प्रियंका परिणाम देने में सक्षम होंगी, जब पार्टी में बड़े पैमाने पर क्षरण हो रहा है? यह एक कठिन समय है क्योंकि 2019 की शर्मनाक हार के बाद पार्टी पूरी तरह से हतोत्साहित है। इसमें कोई संगठन अथवा दूसरे घेरे के नेता नहीं हैं। कोई रणनीति नहीं है। उन्हें बताना होगा कि कांग्रेस आज क्या चाहती है। उन्हें एक नई टीम बनानी होगी और साथ ही पुराने कांग्रेसियों को भी संतुष्ट करना होगा जो ऊब चुके हैं। कुछ महीनों में महाराष्ट्र, झारखंड तथा हरियाणा में चुनाव होने वाले हैं और पार्टी धड़ेबंदी तथा अनुशासनहीनता की शिकार बनी हुई है। बहुत से ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें सुलझाया जाना है। इससे भी बढ़ कर, हालांकि वह एक भीड़ खींचने वाली तथा करिश्माई नेता हैं, एक कठिन समय में पार्टी को आगे ले जाने के लिए उनके पास क्या अनुभव है? उनके संगठनात्मक कौशल का अभी परीक्षण नहीं हुआ है और न ही उन्होंने जमीनी स्तर पर कार्य किया है। वह केवल गत 6 महीनों में पूर्णकालिक राजनीतिज्ञ बनी हैं इसलिए वह केवल कांटों का ताज पहनेंगी।

प्रियंका के लिए हो-हल्ला हाल ही के दिनों में जायसवाल तथा चरणदास द्वारा शुरूआत करने के बाद तेज हुआ है। वह खुद को सम्भवत: भविष्य में किसी समय साबित कर पाएंगी लेकिन फिलहाल उन्होंने इंदिरा गांधी के किसी भी राजनीतिक कौशल का प्रदर्शन नहीं किया है। उत्तर प्रदेश के परिणामों ने साबित किया है कि प्रियंका का कोई जादू नहीं है लेकिन उनके समर्थक यह कहते हुए इसे खारिज करते हैं कि उन्होंने बहुत देरी से शुरूआत की। अंतत:, पार्टी परिवार के बिना नहीं रह सकती और परिवार पार्टी के ऊपर अपनी पकड़ नहीं छोड़ सकता इसलिए दोनों के बीच पेंच फंसा हुआ है।

कल्याणी शंकर
kalyani60@gmail.com

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