Tuesday, Oct 26, 2021
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will the coin of young bihari leaders play in the bihar by elections or not albsnt

बिहार उपचुनाव में 'युवा बिहारी नेताओं' का चलेगा सिक्का या फिर बजेगा सुशासन बाबू का डंका?

  • Updated on 10/13/2021

नई दिल्ली/कुमार आलोक भास्कर। बीते बिहार विधानसभा चुनाव में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव का एक बयान काफी चर्चा का विषय बना था। उन्होंने सीएम नीतीश कुमार पर तंज कसते हुए कहा कि- चचा अब थक गए है,जनता समझ चुकी है। नीतीश कुमार ने भी युवा वोटरों के मूड को भांपते हुए नहला पर दहला मारते हुए पूर्णिया में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा कि यह उनका आखिरी चुनाव है। नीतीश के इस बयान का असर भी हुआ। राज्य में सियासी पारा जो अब तक तेजस्वी यादव के पक्ष में दिख रहा था, अचानक से नीतीश की हवा बनने लगी। फिर से नीतीश कुमार सीएम बन गए।

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बिहार में इस महीने के आखिरी में उपचुनाव

लेकिन बिहार में इस महीने के आखिरी में दो सीटों के लिये उपचुनाव होने है। फिर से नीतीश कुमार की ही प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। नीतीश को इस बार विरोधी दलों के युवा सूरमाओं से सीधी टक्कर है। वो नीतीश जो कल तक लालू यादव और रामविलास पासवान से सीधी लड़ाई लड़ी तो कभी साथी बनकर राजनीति की। अब उनका मुकाबला इन नेताओं के बच्चों से है। हालांकि इस उपचुनाव में जीत और हार से न तो बिहार एनडीए की सरकार की सेहत पर फर्क पड़ेगा और न ही राजद और कांग्रेस के लिये 'करो या मरो वाली' स्थिति है। लेकिन इसके वाबजूद एनडीए से ज्यादा महागठबंधन में ही फूट पड़ गई है। तो ऐसे में सवाल उठता है कि इस उपचुनाव के परिणाम से न तो सरकार बनेगी और न सरकार गिरेगी। फिर सभी दल इसे प्रतिष्ठा की लड़ाई क्यों बना रहे है?

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राजद और कांग्रेस भी आमने-सामने हैं खड़ी

जब कभी बिहार चुनाव की बात होती है तो बरबस देश का ध्यान खींच लेता है। राजनीति के दंगल में बिहार नेताओं की कोई सानी नहीं है। कल तक बिहार की राजनीति में फिसड्डी और राजद की पिछलग्गू बनकर रहे कांग्रेस अचानक से तेवर दिखाने लगी है। हालांकि यह तेवर एनडीए सरकार में भी बीजेपी ने जदयू को भी दिखाये थे। लेकिन बीजेपी ने नीतीश कुमार के संग रहकर ही 'आंख मिचौली वाला तेवर' दिखाये। इस तेवर का असर भी दिखा। बीजेपी ने नीतीश की इतनी जोरदार घेराबंदी की जब चुनाव परिणाम आए तो जदयू, बीजेपी से भी कम सीट पर खिसक गई। इसके साथ ही बिहार में एनडीए का बड़ा भाई अब जदयू नहीं बल्कि बीजेपी बन गया। 

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बिहार एनडीए ने दिखाई एकजुटता

उधर जो छटपटाहट बिहार बीजेपी की जदयू के सामने कद लगातार बौने होने का डर सता रहा था अब कांग्रेस को भी लगने लगा है। अब ऐसा लग रहा है कि जिस तरह से बीजेपी ने युवा नेता चिराग पासवान का 'साथ लेकर और साथ नहीं दिखकर' नीतीश का गुरुर तोड़ा, अब कांग्रेस कन्हैया कुमार को आगे करके तेजस्वी यादव को पटखनी देना चाहते है।

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कन्हैया कुमार की भी होनी है परीक्षा

कारण जब से युवा नेता कन्हैया कुमार ने 'हाथ' थामा है तबसे कांग्रेसियों का आत्मविश्वास बढ़ गया है। कन्हैया का ही असर है कि कांग्रेस ने एक झटके में राजद से पल्ला झाड़ लिया है। दरअसल यह नहीं भूलना चाहिये कि बिहार राजनीति की प्रयोगशाला भी है। जिसमें बिहार के नेता मास्टरमाइंड माने जाते है। अगर पिछले विधानसभा चुनाव को देंखे तो लालू की अनुपस्थिति में तेजस्वी यादव अपना पहचान बनाने में कामयाब रहें। इसलिये तेजस्वी यादव अपने-आप को बिहार की राजनीति में स्थापित कर चुके है।

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चिराग के सामने हैं जटिल स्थिति

लेकिन चिराग पासवान और कन्हैया कुमार के सामने जटिल स्थिति है। एक तरफ चिराग पासवान रामविलास के मृत्यु के बाद खुद को ठीक से स्थापित नहीं कर सके है। वैसे देखा जाए तो वे सांसद है। लेकिन बीते चुनाव में उनको लेकर एक धारणा बनी कि वे खेल बनाने से ज्यादा खेल बिगाड़नें में यकीन करते है। उनकी स्थिति चुनाव बाद 'न माया मिली न राम' वाली हो गई। चिराग खुद को नरेंद्र मोदी के हनुमान बनने के चक्कर में अपने पिता के विरासत को भी गंवाने का एक तरह से काम किया है। ऐसे में उनके सामने सबसे कठिन परिस्थिति है। अब देखना होगा कि इस चुनाव में वे कितना हासिल कर लेते है।

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तेजस्वी यादव टटोलेंगे मतदाताओं का मूड

दूसरी तरफ कन्हैया कुमार की पृष्ठभूमि किसी सियासी परिवार से नहीं है। जैसा कि उनके सामने तेजस्वी यादव और चिराग पासवान है। लेकिन कन्हैया कुमार अपने दम पर राजनीति में बहुत जल्दी नाम कमाने वाले नेताओं की फेहरिस्त में शामिल हो गए है। वे सीधे तेजस्वी यादव और चिराग को चुनौती देते नजर आते है। उनका मुकाबला ऐसे सियासी राजकुमार से है जिनके पिता बिहार ही नहीं बल्कि भारतीय राजनीति के स्थापित नेताओं में जाने जाते है। तेजस्वी और चिराग विरासत को संभालने की लड़ाई लड़ रहे है। जबकि कन्हेया कुमार खुद को दोनों नेताओं के समकक्ष कमतर न आंका जाए वाली छवि गढ़ रहे है। कन्हैया कुमार के पास खोने के लिये कुछ भी नहीं है। बल्कि वे जो भी हासिल करेंगे उससे उनका कद ही बढ़ेगा।

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कांग्रेस की भविष्य की राजनीति होगी तय

अब देखना होगा कि राहुल गांधी जितने शौर बजाकर कन्हैया कुमार को पार्टी में शामिल कराये है उसका लाभ सीट जीतने में होता है या नहीं। यदि कांग्रेस एक सीट भी जीत लेती है इसका निश्चित रुप से श्रेय कन्हैया कुमार को जाएगा। लेकिन पार्टी अगर दोनों सीट हार गई तो फिर से राजद के साथ महागठबंधन करके आगे भी बढ़ेगी। यह तय हो जाएगा। लेकिन जैसा हमने उपर लिखा इस चुनाव में जीत या हार से नीतीश और तेजस्वी यादव को थोड़ा बहुत असर दिखेगा। और अगर कांग्रेस जीतती है तो आगे की राजनीति में भी बदलाव दिखेंगे। लेकिन कन्हैया कुमार को इस चुनाव में हार या जीत से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वहीं चिराग पासवान के लिये मुठ्ठी अभी बंद है। शायद ही चुनाव परिणाम से बहुत कुछ हासिल कर पायेंगे। चिराग की लड़ाई अब लंबी हो गई है। उन्हें फूंक-फूंक कर कदम उठाना चाहिये। 

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