Tuesday, Jun 28, 2022
-->
will-the-original-thinking-of-the-islamic-world-change

क्या इस्लामी दुनिया का मूल चिंतन बदलेगा, परिवर्तन का है कोई भविष्य है?

  • Updated on 1/5/2018

नई दिल्ली/बलबीर पुंज। इस्लामी दुनिया में हो रहे बदलाव का कोई भविष्य है? यह प्रश्न इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि वर्तमान परिदृश्य में कट्टर सुन्नी इस्लामी राष्ट्र सऊदी अरब से लेकर शिया मुस्लिमों के सबसे बड़े देश ईरान में तथाकथित परिवर्तन की बयार चल रही है। सऊदी अरब में जहां इस बदलाव के पीछे सऊदी सल्तनत के घोषित उत्तराधिकारी मोहम्मद बिन सलमान हैं, वहीं ईरान में जनता मौलवियों के अधीन सत्ता-अधिष्ठानों के विरुद्ध परिवर्तन की लौ को प्रज्वलित किए हुए है। 

ईरान में जारी विरोध-प्रदर्शन को लेकर जिस प्रकार का सार्वजनिक विमर्श बना है, उसके अनुसार यह जनआंदोलन -रूहानी सरकार की आॢथक नीतियों, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई के विरुद्ध है। एक रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के कम से कम 12 शहरों में सरकार विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं, जिनमें राजधानी तेहरान, जनजान, केरमानशाह, खोरामाबाद, अबार, अराक, दोरुद, इजेह, तोनेकाबोन, करज, शहरेकोर्द और बांदेर अब्बास शामिल हैं। इन प्रदर्शनों की शुरूआत 28 दिसम्बर को ईरान के दूसरे सबसे अधिक आबादी वाले पूर्वोत्तर शहर मशाद में हुई थी। हिंसा में दर्जनभर लोग मारे जा चुके हैं और 500 से अधिक गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, जिनमें अधिकतर 30 वर्ष से कम आयु के युवा हैं। 

ममता बनर्जी के खिलाफ दर्ज हुई FIR, केंद्र पर लगाया था ये आरोप

ईरानी सरकार इस गतिरोध के पीछे बाहरी शक्तियों का हाथ बता रही है। वहीं अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने प्रदर्शनकारियों का समर्थन करते हुए कहा है कि ईरान के लोग बदलाव चाहते हैं और वे अब ‘दमनकारी’ शासन को बर्दाश्त नहीं करेंगे। पूरे प्रदर्शन में सोशल मीडिया प्रदर्शनकारियों को एकजुट करने का काम कर रहा है, इसी भय से मैसेजिंग एप टैलीग्राम और इंस्टाग्राम पर रूहानी सरकार ने अस्थायी प्रतिबंध लगा दिए हैं। ईरान में 2009 के राष्ट्रपति चुनाव के समय भी इसी तरह का आंदोलन हुआ था। 

वर्तमान ईरान की स्थिति गढ़े हुए सार्वजनिक विमर्श से काफी विस्तृत है। इस शिया राष्ट्र में जनता के प्रदर्शन का बड़ा कारण-कट्टर इस्लामिक शासन के तौर-तरीके, नागरिक अधिकारों पर बढ़ती पाबंदियां और सीरिया व लेबनान आदि इस्लामी देशों के कट्टरपंथियों को समर्थन देने की मजहबी नीतियां हैं। प्रदर्शनकारी ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता सैयद अली खुमैनी, राष्ट्रपति मौलवी हसन रूहानी सहित अन्य मुल्ला-मौलवियों के खिलाफ   नारेबाजी करते हुए सीरिया को छोड़कर ईरान के मुद्दों पर ध्यान देने की मांग कर रहे हैं। 

कई युवा प्रदर्शनकारी, ‘‘हम आर्यन हैं, हम पर अरबी अल्लाह थोप दिया गया है,‘‘, ‘‘हम इस्लामी गणतंत्र नहीं चाहते’’, ‘‘हिजबुल्लाह को मौत’’, ‘‘सैयद अली खुमैनी शर्म करो, हमारा देश छोड़कर जाओ’’, ‘‘युवा बेरोजगार हैं’’ और ‘‘मुल्लाओं के पास सभी पद हैं’’ जैसे नारे लगा रहे हैं। इस संदर्भ में कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हैं। ईरान के विभिन्न क्षेत्रों में हो रहे इन विरोध-प्रदर्शनों में महिलाएं भी खुलकर भाग ले रही हैं। वे अपना विरोध दर्ज कराने के लिए हिजाब तक उतारकर फैंक रही हैं। ज्ञात रहे कि ईरान में हिजाब न पहनने वाली महिलाओं को दंडित करने का प्रावधान है।

INDvSA: विराट की इस गलती से नाराज हुई अफ्रीकी मीडिया

वर्ष 1977-79 की इस्लामी क्रांति-ईरानी इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है। ईरान के अंतिम शाह मोहम्मद रजा पहलवी को अपदस्थ कर आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ने इस्लामी गणतंत्र की स्थापना की थी। पाश्चात्य संस्कृति और जीवनशैली से निकटता के कारण पहलवी निरंतर कट्टर मौलवियों के निशाने पर थे। इस स्थिति से निपटने के लिए पहलवी ने इस्लाम की भूमिका को कम करने हेतु मूल ईरानी सभ्यता को प्राथमिकता दी और अपने देश को आधुनिक बनाने की दिशा में निर्णय लेना शुरू कर दिया किन्तु खुमैनी सहित इस्लामी कट्टरपंथियों ने पहलवी के सुधारों के विरुद्ध हिंसक अभियान और तेज कर दिया। अन्ततोगत्वा-मजहबी असंतोष, दमन और ङ्क्षहसा की पृष्ठभूमि में खुमैनी ने अंतरिम सरकार का गठन किया और वर्ष 1979-80 में ईरान को इस्लामी गणतंत्र घोषित करते हुए देश की व्यवस्था में शरीयत को लागू कर दिया। 

ईरान की इसी इस्लामी क्रांति को सऊदी सल्तनत के युवराज मोहम्मद बिन सलमान (एम.बी.एस.) इस्लामी दुनिया की कट्टर छवि और मजहबी असहिष्णुता के लिए जिम्मेदार मानते हैं। एम.बी.एस. के अनुसार, ‘‘पिछले तीन दशकों में जो कुछ हुआ, वह सऊदी अरब नहीं है और न ही मध्यपूर्व। 1979 में ईरान की इस्लामी क्रांति के बाद लोगों ने इसे अपने देशों में दोहराना चाहा जिसमें सऊदी अरब भी शामिल है।’’

एम.बी.एस. ने सऊदी अरब में वर्ष 2017 में ‘उदार इस्लाम’ के नाम पर कई सामाजिक सुधार किए हैं, जिनमें महिलाओं को वाहन चलाने व स्टेडियम जाकर खेल देखने की अनुमति देना, बतौर सऊदी सूचकांक में अध्यक्षा सराह अल सुहैमी का चुना जाना, स्कूलों में छात्राओं को खेल में भाग लेने की स्वीकृति, सिनेमाघरों और कन्सर्ट हाल को वापस शुरू करना, व्हॉट्सएप व स्काइप जैसे वॉयस-वीडियो कॉल एप से पाबंदी हटाना और मान्य देशों के नागरिकों को पर्यटन वीजा जारी करना शामिल हैं। 

साल का पहला संकट चौथ पर्व आज, इस विधि से करें भगवान गणेश को खुश

इस्लामी दुनिया से जुड़ा एक और हालिया घटनाक्रम अमरीका द्वारा पाकिस्तान की आर्थिक सहायता रोकने से संबंधित है। अमरीका ने पाकिस्तान को मिलने वाली 1,617 करोड़ रुपए की सैन्य मदद रोक दी है। इससे पूर्व नववर्ष के पहले दिन अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ट्वीट करते हुए लिखा था, ‘‘अमरीका पिछले 15 वर्षों से मूर्खतापूर्ण तरीके से पाकिस्तान को 33 अरब डॉलर (लगभग 2,145 अरब रुपए)से अधिक की आॢथक मदद दे चुका है। वह हमारे शासकों को बेवकूफ समझता रहा है। आतंकियों को ढूंढ निकालने के लिए हम अफगानिस्तान की खाक छानते रहे और पाकिस्तान हमारी मदद करने के बजाय उन्हें सुरक्षित पनाह देता रहा लेकिन अब और नहीं होगा।’’ 

इन सभी घटनाक्रमों के बाद इस्लामी दुनिया अपने मूल चिंतन, जिसकी अवधारणा में काफिर-कुफ्र और केवल इस्लाम व उससे संबंधित मान्यताओं को सर्वोच्च मानने का दर्शन निहित है, क्या उससे मुक्त हो सकता है? ईरान, सीरिया,पाकिस्तान, ईराक आदि मुस्लिम देशों में जिस प्रकार हिंसक दौर चल रहा है और वहां के जेहादी चरमपंथी इस्लाम के जिस संस्करण को एकमात्र ‘‘सच्चा’’ बता रहे हैं, उसमें-उनके द्वारा परिभाषित इस्लाम को मानो या फिर मरने के लिए तैयार रहो, का दर्शनशास्त्र है। क्या यह सत्य नहीं कि इसी रुग्ण मानसिकता के साथ आई.एस., जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिद्दीन, लश्कर-ए-तोयबा जैसे इस्लामी आतंकवाद के पुरोधा विश्व में मानवता का गला घोंट रहे हैं। एक आंकड़े के अनुसार, वर्ष 2001 के बाद विश्व 32 हजार से अधिक बार इस्लामी हिंसा और आतंकवाद का शिकार हो चुका है। 

उत्तरी भारत में कोहरे का कहर, दिल्ली आने जाने वाली 18 ट्रेनें रद्द, 62 देरी से

पूरी दुनिया की मुस्लिम आबादी में सुन्नियों का अनुपात 80-90 प्रतिशत है, जबकि शिया 10-20 प्रतिशत। जहां कहीं भी शिया या सुन्नी बहुसंख्या में हैं, उसका कट्टरपंथी धड़ा दूसरे को मिटाने पर आमादा है। पाकिस्तान के शिया आतंकी दस्ते सिपह-ए-मोहम्मद को ईरान सैन्य और वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराता है  तो सऊदी अरब सुन्नी देवबंदी, लश्कर-ए-झांगवी, वहाबियों व सलाफियों को अकूत धन देकर  ‘मजहबी कर्तव्य’ के निर्वाहन के लिए प्रोत्साहित करता है। जिस समय ईरान में जनता सड़कों पर उतरी, ठीक उसी समय अर्थात् 28 दिसम्बर को तेहरान से 1,850 किलोमीटर दूर अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में एक शिया सांस्कृतिक संगठन आई.एस. के आतंकी हमले का शिकार हो गया। इस हमले में 41 निरपराधियों की मौत हो गई और लगभग 100 लोग घायल हो गए। 

इस कटु वास्तविकता की पृष्ठभूमि में इस्लामी आतंकवादियों-कट्टरपंथियों के विरुद्ध लड़ाई में पाकिस्तान, सऊदी अरब और ईरान के लिए अलग-अलग वैश्विक नीतियां बनाना शुतुरमुर्ग प्रवृत्ति का दोहन करने जैसा है। इन्हीं नीतियों से न केवल आतंकवाद विरोधी वैश्विक अभियान आजतक पंगु बना हुआ है, अपितु इस्लामी आतंकवाद भयावह रूप ले चुका है। विकृत दर्शन से पैदा हुई विषबेल को काटे और उसे आवश्यक पोषक देने वालों का उन्मूलन किए बिना इस्लामी दुनिया में निर्णायक परिवर्तन संभव नहीं। 

Hindi News से जुड़े अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करें।हर पल अपडेट रहने के लिए NT APP डाउनलोड करें। ANDROID लिंक और iOS लिंक।
comments

.
.
.
.
.