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गूगल की दुनिया से आगे है किताबों का सागर

  • Updated on 4/23/2019

नई दिल्ली/अनामिका सिंह। आज चाहे मोबाइल के जरिए दुनिया की सभी जानकारी मुट्ठी में करने की बात युवा कहते हों लेकिन सच्चाई यह है कि किताबों का सागर गूगल की दुनिया से काफी आगे है। तभी तो शोधार्थी हों या फिर किताब पढऩे के शौकीन मोबाइल से ज्ञान प्राप्त करने की बजाय आज भी किताबों को खरीदकर पढऩा पसंद करते हैं।

बता दें कि विश्व पुस्तक दिवस को 23 अप्रैल के दिन मनाने की शुरूआत यूनेस्को ने 1995 से व भारत सरकार ने 2001 से की। दरअसल 23 अप्रैल 1564 को शेक्सपीयर ने दुनिया से अलविदा कहा था साहित्य जगत में उन्हें विशेष स्थान प्राप्त है और विश्व पुस्तक दिवस उनकी याद में मनाया जाता है। इस मौके पर हमने कुछ लेखकों से बात कर जानना चाहा कि किताब उनके जीवन में क्या अहमियत रखती है।

किताब मेरी खुदा है: नासिरा शर्मा
लोग किताबों को दोस्त कहते हैं लेकिन मेरी नजर में किताबें खुदा के बराबर हैं। इनका सजदा करने वाला कभी भी जीवन में पिछड़ नहीं सकता। इन्हीं से इंसान की बुद्धि व विवेक सकारात्मकता की ओर जाते हैं।

किताब रूपी खुदा को पूजने वाले इंसान को ज्ञान के सागर में हिचकोले खाने से कोई नहीं रोक सकता। मैं किताबों के साथ खुद को हमेशा सहज महसूस करती हूं। एक सजग लेखक हमेशा सत्य को परखकर उसे शब्दों में पिरोता है। किताबें इबादत के लिए बनी हैं, इसीलिए तो सदियों से लोग इन्हें मानते आएं हैं।

‘सबसे सच्ची दोस्त हैं किताबें: कुलदीप’
कहते हैं किताबें इंसान की सबसे अच्छी दोस्त होती हैं। मुझे लगता है कि वह सबसे सच्ची दोस्त होती हैं। किताबें तौर-तरीके सिखाती हैं, रहन-सहन सिखाती हैं, ऐतिहासिक और समकालीन घटनाओं से रूबरू कराती हैं।

किताबों और इंसान का रिश्ता ठीक वैसा है जैसा गुरू और शिष्य का। कुछ किताबें हमें इसलिए पढनी होती हैं कि अच्छे नंबर लाने हैं और कुछ हम इसलिए पढते हैं कि हमें खुद को वैचारिक रूप से मजबूत करना है। दोनों ही तरह की किताबें एक प्रभावशाली व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं। 

किताबें हैं समाज का आईना: राजा नितिन परिहार
किताबें समाज का आईना हैं और इस आईने में कई बार अपनी ही भयावह तस्वीर दिखाई देती है। इसलिए जरूरी है कि हम खुद को और इस आईने को स्वच्छ रखने की कोशिश करें। अच्छी किताबें पढ़कर अच्छा सीखने को मिलता है और बुरी किताबों से मन मे बुरी प्रवृत्ति जागती है।

इसलिए लेखकों के लिए आवश्यक है कि वो सामाजिक दायित्व को ध्यान में रखते हुए लिखें। नालंदा में कभी किताबों का खजाना था। ऋग्वेद से लेकर विकिपीडिया तक, जन्मकुण्डली से लेकर तेरहवीं के पाठ तक, सब किताब ही तो है।

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