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World Food Day 2020: जानें भारतीयों के खाने में कैसे शमिल हुई "रोटी"

  • Updated on 10/16/2020

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। हर साल विश्व खाद्य दिवस (World Food Day 2020) संपूर्ण विश्व में 16 अक्तूबर को मनाया जाता है| इस दिन संयुक्त राष्ट्र संघ में खाद्य और कृषि संगठन की स्थापना 1945 में हुई थी| इस दिवस का आयोजन खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के सदस्य राष्ट्रों के द्वारा शुरू किया गया था | बता दें कि विश्व खाद्य दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य पूरी दुनिया में, विशेष रूप से संकट के समय में, खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देना है| यह आयोजन दुनिया भर में हर किसी के लिए पर्याप्त भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु सरकारों को सफल कृषि नीतियों को लागू करने के प्रति जागरूकता बढ़ाने में मदद करता है।

इस बार विश्व खाद्य दिवस के अवसर पर हम बताएंगे की भारतीय थाली में रोटी कैसे आई।

भारत में किसी की खाने की थाली बिना रोटी के पूरी नहीं होती, जिसे फुल्का, चपाती जैसे नामों से भी जाना जाता है। ज्यातर उत्तर-मध्य भारत के खाने में  रोटी जरूर शामिल किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस रोटी का जन्म कैसे हुआ या सबसे पहले किसने रोटी बनाई होगी। आज हम आपको रोटी से जुड़े कुछ सवालों का जवाब देंगे।

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पुराने ग्रंथों से मिलता है रोटी का प्रमाण
माना जाता है कि रोटी सबसे पहले पर्सिया से आई, जहां पर ये थोड़ी मोटी और मैदे की बनी होती थी। लेकिन आटे की बनी रोटी का जन्म सबसे पहले अवध में हुआ जहां पर गेंहू की पैदावार ज्यादा होती थी। गेंहू से बनने वाली इस रोटी का आटा थोड़ा मोटा होता था।

रोटी का प्रमाण पुराने ग्रंथों से भी मिलता है जिसमें कहा गया है कि रोटी हड़प्पा काल में भी लोग बनाना जानते थे क्योंकि ये काल बहुत तरह के अनाज ज्वार, बाजरा, गेहूं और सब्जी को उगाना जानता था। संस्कृत में भी रोटी को रोटिका नाम से चिकित्सा ग्रंथ में कहा गया है। साथ ही रामचरितमानस में तुलसीदास ने 1600 ईसापूर्व में कटोरी से मिलती-जुलती रोटी का वर्णन किया है। 

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साहित्य में रोटी को पकाने के अलग-अलग तरीके
इसके अलावा वैष्णव धर्म के ग्रंथ में बताया गया है कि 15वीं शताब्दी में माधवेंद्र पुरी द्वारा भगवान कृष्ण को मीठी खीर से ज्यादा रोटी का भोग लगाने का नियम था।

वहीं साहित्य में रोटी को पकाने के अलग-अलग तरीकों के बारे में बताया गया है। जिसमें दो प्लेट के बीच में अंगारों में रोटी को पकाना बताया गया है फिर उस पर घी डालकर मिठे के साथ खाया जाता है, ये चलन आज भी जारी है।

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अकबर बादशाह की सबसे पसंदीदा थी रोटी 
वैदिक काल के अलावा मुगल काल के बादशाह अकबर के समय में अबुल फजल ने रोटी के बारे में बताया है कि ये बादशाह की सबसे पसंदीदा थी। 

वहीं ऐसे ही रोटी के बारे में एक और प्रचलित कहानी है कि इसे सबसे पहले यात्रियों के खाने के लिए बनाया गया था जोकि कटोरी के आकार का होता था ताकि इसमें सब्जी को रखकर आसानी से खाया जा सके। ऐसा इसलिए किया जाता था ताकि बर्तन की जरूरत न पड़े।

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