Thursday, Jan 23, 2020
world opinion about india in 2020

2020 में भारत के बारे में ‘दुनिया की राय’

  • Updated on 1/6/2020

न्यूयार्क टाइम्स ने 3 जनवरी को लिखा ‘भारत में हिंसा बढ़ने के साथ ही पुलिस पर लगे मुसलमानों से दुव्र्यवहार के आरोप।’ वाशिंगटन पोस्ट के 4 जनवरी के संस्करण में समाचार छपा, ‘भारत में  दमन बढ़ा, मशहूर हस्तियों ने साधी चुप्पी।’ ‘पुलिस बर्बरता पर बोले भारतीय मुसलमान: ‘हम सुरक्षित नहीं’ (गार्डियन, 3 जनवरी)। फाइनैंशियल टाइम्स ने सवाल उठाया, ‘दूसरे आपातकाल में जा सकता है भारत।’ यहां सवाल यह नहीं है कि क्या हम दुनिया के नजरिए से सहमत होंगे या नहीं : बहुत से भारतीय और खासतौर पर हिन्दू इस बात से असहमत होंगे कि भारत में स्थितियां खराब हैं अथवा यह सरकार जानबूझ कर अपने नागरिकों को परेशान कर सकती है। 

सवाल यह है कि दुनिया हमें किस नजरिए से देख रही है। प्रश्र यह भी है कि वे हमें असहमति की नजर से क्यों देख रहे हैं। सच्चाई यह है कि तथ्य हमारे खिलाफ हैं। देश में नागरिकता संबंधी कानूनों के विरोध का नेतृत्व भारत के मुसलमान कर रहे हैं जिसके पर्याप्त कारण हैं। वे कानूनों का निशाना हैं और उन्हें इस बात की जानकारी है। आइए देखते हैं कि तथ्य क्या हैं।

पहला, असम में एन.आर.सी. प्रक्रिया के दौरान स्थानीय सत्यापन अधिकारियों ने कुछ लोगों को डी-वोटर्स (संदिग्ध मतदाता) बताते हुए  मतदाता सूची से उनके नाम हटाने शुरू कर दिए। ऐसे डी-वोटर्स को इस सूची में डाले जाने से उन्हें चुनावों में मतदान का अधिकार नहीं रहेगा। उन्हें इस सूची में डालने की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी। 

दूसरे, 3 अगस्त, 2019 को एक समाचार आया, ‘सरकार अखिल भारतीय एन.आर.सी. की भूमिका तैयार करने के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार करेगी।’ इस रिपोर्ट में कहा गया था, ‘‘नागरिकता (रजिस्ट्रेशन ऑफ सिटीजंस एंड इश्यू ऑफ नैशनल आइडैंटिटी कार्ड्स) नियम 2003 के नियम 3 के तहत केन्द्र सरकार एतद् द्वारा जनसंख्या रजिस्टर तैयार और अपडेट करने का निर्णय लेती है...और असम को छोड़ कर देशभर में स्थानीय रजिस्ट्रार के क्षेत्राधिकार में रहने वाले लोगों से संबंधित जानकारी एकत्रित करने के लिए घर-घर जाकर गणना करने का कार्य पहली अप्रैल 2020 से 30 सितम्बर 2020 तक किया जाएगा,’  यह बात नागरिक पंजीकरण के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त विवेक जोशी द्वारा जारी नोटिफिकेशन में कही गई थी। रिपोर्ट में कहा गया कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 20 जून को लोकसभा को संबोधित करते हुए कहा था कि सरकार ने प्राथमिकता के आधार पर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को लागू करने का निर्णय लिया है। 

तीसरे, 26 मार्च, 2018 को भारतीय रिजर्व बैंक ने एक अधिसूचना  नम्बर खेमा 21 (आर)/2018-आरबी जारी की जिसमें कहा गया, ‘कोई व्यक्ति जो अफगानिस्तान, बंगलादेश या पाकिस्तान का नागरिक हो तथा इन देशों में अल्पसंख्यक समुदायों अर्थात हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई हो जो भारत में रह रहा हो तथा उसे केन्द्र सरकार द्वारा लम्बी अवधि का वीजा प्रदान किया गया हो वह केवल एक आवासीय अचल सम्पत्ति रहने के लिए तथा केवल एक अचल सम्पत्ति स्व: रोजगार के लिए खरीद सकता है....’

आरबीआई को कैसे पता चलेगा कि कोई व्यक्ति किस धर्म से संबंधित है? क्या अब हमें बैंक खाता खोलने के लिए अपना धर्म भी बताना होगा? इस बात पर सरकार की ओर से विचार नहीं किया गया था जब तक कि पिछले हफ्ते यह बात सामने आई जब केन्द्रीय गृहमंत्री ने एक ट्वीट किया, ‘भारतीय नागरिकों’’ को अपना धर्म बताने की जरूरत नहीं होगी। समस्या यह है कि इस बात का निर्णय कौन करेगा कि कौन नागरिक है और कौन आप्रवासी। 

मुसलमानों के दिमाग में कुछ बातें बिल्कुल स्पष्ट हैं और वे इस प्रकार हैं : यह सरकार पिछले कुछ समय से एक ऐसी प्रक्रिया शुरू करने की योजना बना रही थी जिसके द्वारा भारतीय  मुसलमानों को अलग-थलग किया जा सके। सबसे पहले मतदाता सूची से मुस्लिम नामों का ब्यूरोक्रैटिक परिष्करण होगा। उसके बाद जो लोग ‘संदिग्ध’ पाए जाएंगे उन्हें अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष उपस्थित होकर अपनी बेगुनाही साबित करनी होगी। इस बीच क्या होगा। उनके डी-वोटर्स स्टेट्स के कारण उनका पासपोर्ट तथा लाइसैंस   भी छिन जाएगा। इसके अलावा वे सम्पत्ति से भी अधिकार खो देंगे (क्योंकि आर.बी.आई. के सर्कुलर के अनुसार केवल गैर मुसलमानों को यह अधिकार होगा), वे बैंक खाते और नौकरी का भी अधिकार खो देंगे। 

सरकार को देश भर में ‘डिटैंशन सैंटर’ भी नहीं बनाने होंगे। केवल ऊपर जो बात कही गई है उसे करने से ही भारतीय मुसलमानों की स्थायी व्यवस्था हो जाएगी। जो मुसलमान इससे बच जाएंगे उन्हें भी यह भय सताता रहेगा कि क्या उन्हें भी इस तरह की जांच से गुजरना पड़ेगा। क्या अब हम यह समझ पाएंगे कि वे लोग विरोध क्यों कर रहे हैं। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री द्वारा कही जा रही बातों  और उनके आश्वासन में इन लोगों का भरोसा शून्य है और मैं उन्हें दोष नहीं देता। उत्तर प्रदेश में ङ्क्षहसा के दौरान मारे गए 16 लोगों में से 14 पुलिस की गोलियों से मारे गए थे लेकिन प्रधानमंत्री का कहना यह था कि हिंसा प्रदर्शनकारियों द्वारा की जा रही है। यही कारण है कि दुनिया भारत की तरफ निराशा की नजरों से देख रही है और कौन कह सकता है कि यदि वे हमारे बारे में इस तरह से सोच रहे हैं तो वे गलत हैं। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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