Saturday, Mar 23, 2019

विश्व सूफी संगीत महोत्सव ‘जहान-ए-खुसरो’ का आयोजन 8, 9 और 10 मार्च को

  • Updated on 3/7/2019

नई दिल्ली/डॉ. अश्विनी शर्मा। पूर्वी निजामुद्दीन स्थित अरब की सराय में प्रसिद्ध फिल्मकार मुज्जफर अली द्वारा संयोजित तीन दिवसीय ‘जहान-ए-खुसरो’ के 14वें संस्करण के संबंध में नवोदय टाइम्स ने उनसे एक खास बातचीत की । प्रस्तुत हैं उसी के कुछ अंश.....

कुछ सूफिज्म के बारे में बताएं.....

सूफिज्म एक जरिया है बंदे को खुदा से मिलाने वाला। इंसान को खुदा के साथ और इंसान को इंसान के साथ मोहब्बत करने का यह पैगाम देता है। इश्क में समर्पण का बहुत बड़ा हाथ होता है। यदि इंसान इंसान के प्रति समर्पित है और वही श्रद्धा उसके मन में खुदा के लिए भी है तो गीत-संगीत के जरिए भगवान को पाना बहुत आसान है और सूफी संत या उनके कलाम यही सीख हमें देते हैं।

‘जहान-ए-खुसरो’ क्या है और खुसरो से इतना मुतास्सिर होने की वजह क्या रही ?

खुसरो यानि बादशाह। इस कार्यक्रम में हमारा मतलब हजरत अमीर खुसरो से भी है, जिन्होंने फारसी, उर्दू और हिन्दी में कुछ ऐसी रचनाएं लिखीं जो कि हजरत निजामुद्दीन ओलिया के प्रति समर्पित थीं और उनमें बड़े आसान तरीके से उस ईश्वर के साथ लौ लगाने का तरीका भी समझाया गया था। उनके और दूसरे कई सूफी संतों के कलामों से सजा हमारा यह कार्यक्रम है जो कि 2001 में हमने शुरू किया था। इसमें देश-विदेश के कई कलाकार आकर अपनी हाजरी लगाते हैं और इस साल यह 14वां संस्करण है। रही बात खुसरो से लगाव की तो उनके कलामों ने मेरे दिल को बहुत गहरे तक छुआ जो कि अक्ल वालों की नहीं केवल दिल वालों की बात करते हैं।

सूफी संगीत में पंजाब और पंजाबी भाषा की अधिकता का क्या कारण है ? 

देखिए, पंजाब सूफी परंपरा का गढ़ रहा है। गुरू नानक देव ने बुनियादी तौर पर सूफी परंपरा शुरू की जिसे बुल्लेशाह, बाबा फरीद, वारिस शाह, सुल्तान बाहु वगैरह ने अपने कलामों के जरिए गा-गाकर जन-जन तक पहुंचाया और कालांतर में यह इतना मशहूर हुआ कि कई आधुनिक कवियों ने भी इस पर कई गीत लिखे और अब तो यह फैशन का रूप ले चुका है। 

इतनी बड़ी दिल्ली में आपने अपने इस कार्यक्रम के लिए ’अरब की सराय’ को ही क्यों चुना ?

देखिए, मेरा यह मानना है कि खंडहरों में हर एक चीज अच्छी लगती है और इनमें आकर आप खुद को कुदरत से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। आपको महलों में बनावटीपन नजर आएगा, लेकिन यहां अजीब सा सकून दिल को मिलता है और आप यहां आकर जिंदगी की हकीकत से रू-ब-रू होते हैं। फिर यह जगह हजरत निजामुद्दीन की दरगाह के काफी नजदीक है इसीलिए हम पिछले कई सालों से इसे यहीं मुनक्किद कर रहे हैं। एक फिल्मकार होने के नाते भी मुझे यहां सेट्स की ओरिजिनलटी, यूजर फ्रैंडली स्टेज क्राफ्ट्स और काफी तादाद में आने वाले लोगों को बिठाने के वास्ते जगह अच्छी लगती है।

कुछ प्रमुख कलाकारों के नाम बताएं और यदि कोई संदेश देना चाहें तो.....

हां, इस बार सतिन्दर सरताज, कंवर ग्रेवाल और जावेद अली की पेशकश खास रहेंगी तथा कई दूसरे कलाकार भी अपने हुनर का मुजाहिरा करेंगे। मेरी बस सबसे यही ताकीद है कि ज्यादा-से-ज्यादा तादाद में आकर हमारी मेहनतों और कलाकारों को दुआएं दें, क्योंकि इस आयोजन के लिए हमारी पूरी टीम और मेरी पत्नी मीरा अली स्क्रिप्ट, कॉस्ट्यूमस, सेट्स से लेकर दूसरे इंतजामों को बखूबी अंजाम देते हैं।

 

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