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young writers are interested in hindi and have to focus on making them job oriented pragnt

युवा लेखकों पर है हिंदी का दारोमदार, रोजगारोन्मुखी बनाने पर देना होगा ध्यान

  • Updated on 9/12/2020

नई दिल्ली/ अनामिका सिंह। हिंदी सिर्फ भाषा ही नहीं बल्कि हिंदुस्तान की बदलती तस्वीर भी है। जिसने कई सालों के सफर के बाद अपना दम-खम विश्व पटल पर स्थापित किया है। यही वजह है कि दिल्ली विश्वविद्यालय, जामिया हो या फिर जेएनयू भारतीय छात्रों के साथ ही विदेशी छात्र भी हिंदी के शोधार्थी हैं। सिर्फ जरूरत है हिंदी को रोजगारोन्मुखी बनाने की ताकि वो सिर्फ भाषा ही नहीं बल्कि मुख से पेट तक जुड़ सके।

युवा लेखकों पर है पूरी जिम्मेदारी
हालांकि हिंदी के भविष्य को लगातार सुधारने का काम लेखकों की कलम करती आ रही है। हिंदी के कार्यक्षेत्र को बढ़ाने के लिए कई आंदोलन भी चलाए जा रहे हैं। लेकिन सही मायने में हिंदी को बचाने का अब सारा दारोमदार युवा लेखकों के कंधे पर है। हिंदी दिवस (Hindi Diwas) के अवसर पर हमने कुछ युवा लेखकों से बातचीत की, आइए जानते हैं कि क्या कहते हैं वो हिंदी भाषा को लेकर।

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ऐसे हो सकता है हिंदी का विस्तार
हिंदी एक नई राह पर चल निकली है। अभी यह शुरुआत ही है, लंबी दौड़ बाकी है। बीते कुछ वर्षों में परिस्थितियां और स्थितियां बदली हैं और युवा लेखकों ने हिंदी कहानियों को सरल हिंदी भाषा में लिखना शुरू किया जिससे हिंदी के पाठक वर्ग का व्यापक विस्तार हुआ है। मेरा मानना है कि आम बोलचाला की भाषा अगर हिंदी की किताबों में इस्तेमाल की जाए, तो पाठकों की संख्या में विस्तार होता है। आज हिंदी की किताबें युवाओं के हाथों में देखी जाती हैं, ठीक वैसे ही जैसे सफर के दौरान पहले केवल अंग्रेजी की किताबें देखी जाती थीं। आज नामचीन बुकस्टोर्स से लेकर एयरपोर्ट पर भी हिंदी की किताबों की डिमांड की जाने लगी है। बेस्ट सेलर लिस्ट में हिंदी की किताबें प्रमुखता से जगह बना रही हैं। 

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सीमित दायरे से बाहर निकली हिंदी
19वीं सदी के आखिरी दशक में हिंदी जड़ होती चली गई थी। डिस्ट्रीब्यूशन का तंत्र टूटता चला और पाठक छूटते। लेकिन 21वीं सदी के दूसरे दशक में नए लेखक जुड़े जो हिंदी विभाग नहीं बल्कि एमबीए, बीटेक किए थे। उन्हें हिंदी की दुनियादारी नहीं पता थी, उन्होंने किताबों की मार्केटिंग जोर-शोर से शुरू की, हिंदी फिर आकर्षण का केंद्र बनी। यह तब हुआ जब हिंदी अपने सीमित दायरे से बाहर निकली, हिंदी डिजिटल माध्यमों का उपयोग करने लगी। किताबों के ईबुक, ऑडियो बुक्स, फिल्म और वेब सीरीज के राइट्स बिकने लगे। आज हालत यह है कि हिंदी के पांच से आठ युवा लेखक ऐसे हैं, जो हिंदी से अपना जीविकोपार्जन चला पा रहे हैं। हिंदी का लेखक अब गरीब नहीं रहा।

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