Sunday, Dec 04, 2022
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zubair gets bail in case registered in up, but will remain in custody in delhi case

यूपी में दर्ज मामले में जुबैर को मिली जमानत, लेकिन दिल्ली के केस में हिरासत में रहेंगे

  • Updated on 7/8/2022


नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप में ‘ऑल्ट न्यूज’ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर के खिलाफ उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में दर्ज प्राथमिकी के संबंध में शुक्रवार को उन्हें पांच दिन के लिए अंतरिम जमानत दे दी, लेकिन वह एक अन्य मामले में दिल्ली की एक अदालत के आदेशानुसार हिरासत में रहेंगे। शीर्ष अदालत ने जुबैर से मामले को लेकर कुछ भी ट्वीट नहीं करने और किसी सबूत, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण या सामग्रियों से छेड़छाड़ नहीं करने को कहा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अंतरिम जमानत से जुड़ा आदेश सीतापुर में दर्ज प्राथमिकी के संबंध में है और इसका दिल्ली में जुबैर के खिलाफ दायर एक अन्य मामले से कोई लेना-देना नहीं है। जुबैर इस समय दिल्ली में न्यायिक हिरासत में हैं। 

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जुबैर के वकील कॉलिन गोंजाल्वेस ने पत्रकार की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि यह विडम्बना है कि जो घृणा फैलाने वाले भाषण देते हैं, वे जमानत पर हैं, जबकि उनके ऐसे भाषणों का खुलासा करने वाला याचिकाकर्ता हिरासत में है। उन्होंने कहा, ‘‘यह देश क्या बन गया है?’’ गोंजाल्वेस ने कहा कि घृणा फैलाने वाली इस प्रकार की सामग्रियों और फर्जी खबरों का खुलासा करना जुबैर का काम है। न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी और न्यायमूर्ति जे. के. माहेश्वरी की अवकाशकालीन पीठ ने जुबैर की याचिका पर उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया और मामले को 12 जुलाई को आगे की सुनवाई के लिए नियमित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध कर दिया। 

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पीठ ने स्पष्ट किया कि उसने सीतापुर में दर्ज मामले में जांच पर रोक नहीं लगाई है और जरूरत पडऩे पर पुलिस लैपटॉप एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त कर सकती है। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जुबैर एक अन्य मामले में दिल्ली में न्यायिक हिरासत में है। शीर्ष अदालत ने इस दलील पर गौर करते हुए कहा कि इस चरण पर उसका उत्तर प्रदेश में दर्ज मामले के अलावा किसी अन्य प्राथमिकी से कोई लेना-देना नहीं है और उत्तर प्रदेश के मामले में उसके समक्ष सुनवाई हो रही है। 

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हिंदू शेर सेना की सीतापुर जिला इकाई के अध्यक्ष भगवान शरण द्वारा जुबैर के खिलाफ उत्तर प्रदेश में की गई शिकायत के आधार पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 295 ए (धार्मिक भावनाओं को आहत करने के इरादे से जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कार्य करना) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। जुबैर को एक ट्वीट के जरिये कथित तौर पर धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप में 27 जून को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था। 

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मामले की सुनवाई की शुरुआत में मेहता ने जुबैर को अग्रिम जमानत देने से इनकार करने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर प्रारंभिक आपत्ति जताई और कहा कि जुबैर ने तथ्यों को जानबूझकर छिपाया कि सीतापुर अदालत ने बृहस्पतिवार को उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी और वह अदालत के मौखिक आदेश के तहत पुलिस हिरासत में हैं। मेहता ने कहा कि जुबैर दिल्ली की अदालत के आदेशानुसार न्यायिक हिरासत में रहेंगे। उत्तर प्रदेश मामले में जांच अधिकारी की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 295 (ए) और धारा 152 ए (समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना) के तहत प्रथम दृष्ट्या मामला बनता है। 

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उन्होंने कहा कि जुबैर द्वारा सार्वजनिक रूप से संतों को ‘‘घृणा फैलाने वाले’’ कहने से एक विशेष समुदाय की धार्मिक भावनाएं उद्वेलित हो सकती हैं और हिंसा भड़क सकती हैं, क्योंकि उन्होंने जिस व्यक्ति के खिलाफ ट््वीट किया है, वह ‘‘सम्मानित’’ हैं और उसके बड़ी संख्या में उनके अनुयायी हैं। गोंजाल्वेस ने कहा कि उनके मुवक्किल ने ट््वीट करने की बात स्वीकार की है, लेकिन इन ट््वीट से कोई अपराध नहीं हुआ है और उन्होंने घृणा पैदा करने वाले भाषण देने के अपराधों का केवल जिक्र किया था और पुलिस ने बाद में अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई की।  मेहता ने कहा कि यह एक या दो ट्वीट की बात नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि वह एक ऐसे ‘सिंडिकेट’ का हिस्सा हैं, जिसने देश को अस्थिर करने के इरादे से नियमित रूप से इस प्रकार के ट्वीट किए हैं। 

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उन्होंने कहा, ‘‘हम अधिक खुलासा नहीं कर सकते, क्योंकि जांच लंबित है, लेकिन इस मामले में धन की संलिप्तता का सवाल है। उन्हें उन देशों ने धन अनुदान में दिया है, जो भारत के विरोधी हैं।’’  गोंजाल्वेस ने कहा कि उनके मुवक्किल के जीवन को खतरा है और उनकी रक्षा की जानी चाहिए, क्योंकि यह उनके जीवन के अधिकार का प्रश्न है। पीठ ने निर्देश दिया कि उत्तर प्रदेश सरकार का अंग्रेजी में अनुवाद किया गया आदेश सुनवाई की अगली तारीख से पहले अन्य दस्तावेजों के साथ दाखिल किया जाए। 

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