Friday, May 07, 2021
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MCD चुनावों में लोकल नेताओँ की नैया कुछ यूं पार लगाती हैं पत्नियां!

  • Updated on 4/5/2017
  • Author : Usha Khokhar

Navodayatimesनई दिल्ली/उषा खोखर। देश की राजधानी दिल्ली में जल्द ही नगर निगम के चुनाव होने हैं। ऐसे में राजनीतिक घमासान होना वाजिब है, कहीं टिकट को लेकर तो कहीं उम्मीदवारों को लेकर, कहीं मुद्दों को लेकर तो कहीं वादों को लेकर इन दिनों दिल्ली के गलियारों में खूब शोर हो रहा है।

इस सब के अलावा नगर निगन चुनावों में एक और मुद्दा है जो कई बार सामने आता है लेकिन स्वयं नेता उसके बारे में खुलकर बात करते कम ही दिखते हैं। नगर निगम चुनावों में अक्सर होता है कि पार्टियां उन लोगों को अचानक टिकट दे देती है जो इस चुनावी दौड़ में होते ही नहीं हैं। आज हम ऐसे ही एक खास मसले पर बात करेंगे।

यूं तो देश की राजनीति में महिलाएं बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते नजर आती हैं। लेकिन नगर निगम चुनावों में महिलाओं की एक अलग ही भूमिका है। आपने वो नारा तो सुना ही होगा कि पत्नी पति की ढाल होती है तो बस यूं समझ लीजिए कि इन चुनावों में लगभग 70 प्रतिशत महिलाएं यही करती नजर आती हैं।

यूं हुआ है सीटों का बंटवारा

दिल्ली के तीनों निगमों में कुल 272 सीटे हैं जिनमें से 46 सीटें अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं। इन 46 सीटों में भी 24 सीटें अनुसूचित जाति की महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं। इसके अलावा जनरल कैटेगरी में 114 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गई हैं। 

Navodayatimesमहिला नेतृत्व की कमी

जनरल और अनुसूचित जाति की सीटों को मिलकार करीब 138 सीटें महिलाओँ के लिए आरक्षित की गई हैं। चुनाव आयोग महिला विकास और सशक्तिकरण के मुद्दे को लेकर ये कदम उठा रही है। लेकिन सवाल ये है कि क्या सच में इससे ऐसा होगा? ये कह पाना थोड़ा मुश्किल जरूर लगता है। दरअसल, जब चुनाव आयोग कोई सीट महिला के लिए आरक्षित कर देता है तो सभी राजनीतिक पार्टियों के लिए ये मजबूरी हो जाता है कि वो अपनी महिला उम्मीदवार को ही टिकट दे। लेकिन जितनी सीटें आरक्षित की गई हैं उतनी महिलाएं भी निगम के चुनावों में दिलचस्पी लेती नजर आती। ऐसे में पार्टियां एक अलग ही समीकरण बनाती हैं टिकट के लिए महिला उम्मीदवारों का चुनाव करती हैं। 

ये है अनोखा समीकरण

जब पार्टियों को बहुत अधिक सशक्त महिला उम्मीदवार नहीं मिलती है जिस पर चुनावी दांव खेला जा सके। तो ऐसी स्थिति में पार्टी के बड़े नेता उन पुरुष उम्मीदवारों का चयन करते हैं जिनके जीतने के आसार सबसे प्रबल होते हैं। इन उम्मीदवारों के चन के बाद पार्टी को उनको टिकट न देते हुए उनकी पत्नियों को टिकट दे देती हैं। पार्टियों का ये दांव कहीं न सही साबित भी होता है और जब पार्टी की महिला उम्मीदवार जीत जाती है तो उनके पति अपने आप में सत्ता में आ जाते हैं। भले ही प्रत्यक्ष रूप से उनकी पत्नियां ही पार्षद की कुर्सी पर बैठें लेकिन असल सत्ता में तो उनके पति ही दिखते हैं।

पत्नी का सहारा ले लगाएंगे ऊंची छलांग

अपनी पत्नियों को टिकट दिलाकर और पार्षद की कुर्सी पर बैठाकर ये नेता पति आखिर क्या हासिल करेंगे, ये सवाल तो उठना लाजमी है। अब भला सत्ता के लिए पापड़ कोई और बेले और खाने का मजा कोई और उठाए ये बात तो हजम होती नहीं दिखती। आपका सवाल एकदम सही है, इस सब के पीछे इन छोटे नेताओँ का सपना सत्ता की ऊंची छलांग लगाने का होता है। जब भी कोई लोकल नेता आपनी पार्षद पत्नी या बहू को चुनाव जीतवा देता है पार्टी में उसका रुतबा और बढ़ जाता है। जिससे भविष्य में उसके विधायक की टिकट के लिए किए जाने वाला दावा और प्रबल हो जाता है।

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