Friday, May 27, 2022
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challenge of repeating the record to the bjp in saharanpur, it was the center of dalit politics

दलित सियासत का केंद्र रहे सहारनपुर में भाजपा को रिकॉर्ड दोहराने की चुनौती

  • Updated on 1/25/2022

नई दिल्ली/शेषमणि शुक्ल। लकड़ी पर खूबसूरत नक्काशी और इस्लाम के देवबंदी थॉट ऑफ स्कूल के लिए दुनियाभर में मशहूर सहारनपुर में लंबे वक्त तक दलित केंद्रित सियासत हावी रही और यह जिला बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का गढ़ रहा। लेकिन 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे से बने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और 2014 में मोदी लहर ने इस जिले की न केवल सामाजिक बल्कि सियासी समीकरण बदल कर रख दिया। मौजूदा वक्त में सहारनपुर की चार सीटों पर भाजपा काबिज है। लेकिन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों में उपजी नाराजगी और धर्म सिंह सैनी जैसे पिछड़ी जाति के नेताओं के भाजपा छोड़ जाने से इस बार जिले की सियासत में बदलाव साफ दिख रहा है। ऊपर से भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ की आजाद समाज पार्टी दलित वोटों को बांटती दिख रही है।

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सहारनपुर के मुन्नीलाल एंड जयनारायण खेमका गर्ल्स कॉलेज की रीडर डॉ. गुंजन त्रिपाठी का कहना है कि नेताओं के इधर-उधर होने और किसान आंदोलन का असर ज्यादा पडऩे की उम्मीद नहीं दिखती, क्योंकि जिले की पूरी सियासत पर जाति-धर्म ही हावी है। बेरोजगारी और महंगाई जरूर एक मुद्दा बन सकता है। कानून-व्यवस्था में हुए सुधार से न केवल हिंदू, बल्कि मुस्लिम समुदाय भी काफी संतुष्ट दिखता है। डॉ. गुंजन के मुताबिक उनके कॉलेज में करीब 50 फीसद मुस्लिम समुदाय की छात्राएं पढ़ती हैं। आते-जाते छेड़छाड़ और फिकरे बाजी की शिकार वे भी होती थीं। योगी सरकार आने के बाद एंटी रोमियो स्क्वाड सक्रिय हुआ तो यह सब बंद हो गया। अब लड़कियां बेफिक्र होकर कॉलेज आती-जाती हैं। उनका कहना है कि सहारनपुर व्यापारिक केंद्र है। अपराध और गुंडागर्दी का सीधा असर कारोबार और कारोबारी पर पड़ता था। अपराध पर नियंत्रण से कारोबार सुगम हुआ है।

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वहीं, जिले के एक और कॉलेज में प्रिंसिपल डॉ. कुलदीप पवार का कहना है कि 2017 में भाजपा के प्रति जो लोगों में उत्साह था, इस बार उसमें कुछ कमी दिख रही है। जातीय समीकरण भले ही भाजपा के पक्ष में जाते दिख रहे हों, मगर किसान हो या युवा, सभी मोदी-योगी सरकार से असंतुष्ट हैं। डॉ पवार की मानें तो जिले की पांच-छह सीट पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक स्थिति में होते हैं और इनमें से चार-पांच सीट पर इमरान मसूद का प्रभाव रहता है। पिछले चुनाव में भी इमरान भले ही अपना चुनाव हार गए, लेकिन दो सीटें कांग्रेस को दिलवाने में सफल रहे हैं। हालांकि इस बार इमरान न कांग्रेस में हैं और न ही अब तक किसी और दल में शामिल हुए हैं।

बसपा का गढ़ रहा सहारनपुर
यूपी का सहारनपुर जिला एक तरफ उत्तराखंड से मिलता है तो दूसरी तरफ हरियाणा की सीमा आती है। यह जिला फर्नीचर के कारोबार का बड़ा केंद्र है। इस्लाम की दीनी शिक्षा का एक अहम केंद्र है। सियासी तौर पर बहुत ही जागरूक जिला है। 2022 के विधानसभा चुनावों के दूसरे चरण में जिन जिलों में 14 फरवरी को मतदान होना है, उसमें सहारनपुर भी शामिल है। जिले में सात विधानसभा सीटें हैं। 51 फीसद हिंदू और 46 फीसद मुस्लिम आबादी है। हिंदुओं में भी करीब 23 फीसद दलित हैं। यही कारण है कि एक वक्त सहारनपुर बसपा का गढ़ था। 1996 में मुख्यमंत्री बनने के बाद बसपा प्रमुख मायावती इसी जिले की हरोड़ा (सुरक्षित) विधानसभा सीट से पहली बार चुनाव जीत कर उत्तर प्रदेश की विधानसभा में पहुंचीं थी। बसपा के संस्थापक कांशीराम ने भी 1999 में सहारनपुर से ही लोकसभा चुनाव लडक़र अपना सियासी भाग्य आजमाया था, हालांकि वे हार गए थे। लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव तक सहारनपुर में बसपा का दबदबा रहा। 2012 के विधानसभा चुनाव में जिले की चार सीटें बसपा के पास थीं और भाजपा, कांग्रेस एवं सपा को एक-एक सीट मिली थी। उसके पहले 2007 में जिले की सात में से पांच सीटें बसपा ने जीती थी।

भाजपा ने भुनाया मुजफ्फरनगर दंगा

2017 का विधानसभा चुनाव मोदी लहर के साथ-साथ 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के साए में हुआ था। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि 2017 में जिले की नकुड़, देवबंद, रामपुर मनिहारन (सुरक्षित) और गंगोह सीट पर भाजपा को मिली जीत के पीछे 2013 का मुजफ्फरनगर दंगा मुख्य कारण बना था। उस वक्त इस दंगे का असर पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर था। इस दंगे के चलते हुए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का फायदा बेहट और सहारनपुर देहात में कांग्रेस को और सहारनपुर शहर में सपा को मिला था। बसपा संघर्ष करते हुए चार सीटों पर दूसरे नंबर पर रही और कोई भी सीट नहीं जीत सकी। रामपुर मनिहारन में तो बसपा प्रत्याशी महज 595 मतों के अंतर हारा। 2014 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा के राघव लखनपाल की जीत के पीछे का कारण जितना मोदी लहर रहा है, उतना ही वह दंगा और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण भी रहा। लेकिन 2019 का लोकसभा चुनाव आते-आते मुजफ्फरनगर दंगे का असर कुछ कम हुआ और 2016 की नोटबंदी व जीएसटी का असर कारोबार पर दिखने लगा। मोदी लहर के बाद भी यहां बसपा के फजलुर्रहमान भाजपा के राघव लखनपाल पर भारी पड़ गए और जीत कर संसद पहुंचे।

दलित मतों में ‘रावण’ की सेंधमारी
भाजपा नेता और योगी सरकार में आयुष मंत्री रहे धर्म सिंह सैनी इस बार सपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं तो बसपा के मुकेश चौधरी और जगपाल भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं। कांग्रेस के दोनों विधायक नरेश सैनी भाजपा में चले गए हैं तो मसूद अख्तर ने भी इमरान मसूद के साथ कांग्रेस छोड़ दी है। इमरान के जुड़वा भाई नोमान मसूद ने भी कांग्रेस छोड़कर बसपा ज्वाइन कर लिया है और पार्टी ने उन्हें टिकट भी दे दिया है। जिले की सियासत में जमे-जमाए इन नेताओं के इधर-उधर होने, पांच साल की योगी और सात साल की केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ पनपी सत्ता विरोधी लहर, कृषि कानूनों के खिलाफ चले आंदोलन से किसानों में उपजी नाराजगी और भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ के उभार ने भाजपा के सामने पिछला रिकॉर्ड दोहराने की चुनौती बढ़ा दी है। हालांकि भाजपा ने टिकट बंटवारे में जातीय समीकरण को साधने की भरसक कोशिश की है। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार 2013 जैसा जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण की गुंजाईश नहीं दिख रही है। इसलिए हालात थोड़ा बदले हुए हैं। 2017 में जिले के शब्बीरपुर गांव में ठाकुरों और दलितों के बीच हुई जातीय हिंसा के बाद उभरे भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ अब दलित वोट बैंक में भाजपा-बसपा के साथ एक और हिस्सेदार बन गए हैं। चंद्रशेखर सहारनपुर के ही रहने वाले हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूरे यूपी में दलित युवाओं के आइकन बनते जा रहे हैं। चंद्रशेखर की राजनीतिक पार्टी आजाद समाज 2022 का चुनाव लड़ रही है। कई सीटों पर अपने प्रत्याशी घोषित कर चुकी है। चंद्रशेखर खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ गोरखपुर से चुनाव लडऩे की घोषणा कर चुके हैं। इन सबसे सहारनपुर ही नहीं, पूरे यूपी में जातीय और सियासी समीकरण तेजी से बदलता दिख रहा है।

विरासत की सियासत
सहारनपुर जिले की पूरी सियासत एक समय तक रशीद मसूद और गुर्जर नेता चौधरी यशपाल के इर्द गिर्द घूमा करती थी। रशीद मसूद पांच बार लोकसभा और चार बार राज्यसभा सांसद रहे। उनका मुकाबला चौधरी यशपाल करते रहे जो सपा सरकार में मंत्री भी रहे। अब मसूद की विरासत को उनके भतीजे इमरान मसूद संभाल रहे हैं और यशपाल की विरासत रुद्रसेन। इमरान का जिले की कई विधानसभा सीटों पर अच्छा खासा प्रभाव है। खुद भी दो बार कांग्रेस के टिकट पर विधायक रहे और अपने कई करीबियों को जितवाते रहे। रुद्रसेन सपा के जिला अध्यक्ष हैं। हाल के दिनों तक योगी सरकार में मंत्री रहे धर्म सिंह सैनी के उभरने के बाद जिले में पिछड़ों की राजनीति गुर्जरों के हाथ से निकल कर सैनियों-कश्यपों के हाथ जा चुकी है। भाजपा भी 2014 और 2017 में गुर्जर, ठाकुर, सैनी, कश्यप जैसी पिछड़ी जातियों और गैर जाटव दलितों के दम पर ही जिले में अपना वजूद कायम कर सकी थी। लेकिन पिछले दिनों स्वामी प्रसाद मौर्य के भाजपा छोड़ने पर उनके साथ ही योगी सरकार में आयुष मंत्री रहे नकुड़ विधायक धर्म सिंह सैनी के भी सपा में चले जाने से जिले में पिछड़ी जाति के मतदाता बंटते दिख रहे हैं।
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