Friday, Jan 24, 2020
hyderabad priyanka reddy murder rape case

हैदराबाद की हैवानियतः लड़ने की गलती मत करो, डरो क्योंकि हम सब अपाहिज हैं!

  • Updated on 11/30/2019

‘यह आज समझ तो पाई हूं मैं दुर्बलता में नारी हूं
अवयव की सुंदर कोमलता लेकर मैं सबसे हारी हूं’

जयशंकर प्रसाद की ये पंक्तियां आधुनिक भारत में भी कितनी प्रासंगिक है न? धरती से लेकर आकाश तक परचम लहरा जहां हर क्षेत्र में बेटियां नाम रोशन कर रही हैं उसी देश में बेटियों को ज्यादा छूट नहीं देनी चाहिए, वो भोली-भाली होती हैं, सब पर भरोसा कर लेती है और बाहर जो भेड़िये उसको नोचने के लिए बैठे हैं उनसे वो अंजान हैं। अगर आपने उसे छूट दे दी को क्या पता कौन हवस का भूखा भेड़िया उसे अपना शिकार बना ले।

अपनी बेटियों के घर से बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दीजिए। उन्हें चार दीवारी में कैद कर लीजिए। ये दुनिया इस लायक नहीं कि बेटियों को खुली हवा में सांस लेने की आजादी दे सके। ये सस्ता लोकतंत्र, भ्रष्ट प्रशासन, कमजोर पुलिस और अपाहिज समाज महिलाओं के स्वतंत्र कदमों का बोझ झेल नहीं पा रहा है।

देखो न कैसे हवस के भूखे भेड़ियों ने उसको शिकार बनाया और फिर जला दिया। ये कोई पहली बार नहीं है। इस देश में ये घटनाएं आम हो चुकी हैं। मैं हैरान हूं फिर से लोग हैदराबाद की प्रियंका रेड्डी (Priyanka Reddy) के लिए न्याय की मांग कर रहे हैं। उन्नाव रेप पीड़िताओं को इंसाफ मिला क्या? निर्भया को न्याय मिला क्या? 1 साल की तो छोड़िए, यहां तो नवजात को नहीं बख्शा जाता, छोटी-छोटी बच्चियों का रेप कर उन्हें कूड़े के ढेर में फेंक दिया जाता है। जहां 70 साल की महिला का रेप हो सकता है तो एक 25 साल की लड़की के रेप की खबर आपको आम सी नहीं लगती?

लेकिन ये काम किसी आम इंसान का नहीं होता। मानसिक रूप से बीमार, हॉरमोनल इंबैलेंस के शिकार वो जो हवस के भेड़िये हैं वो ऐसा करने पर मजबूर हैं। शापित हैं। कानून व्यवस्था लचर है। कैसे पहले से बीमार को फांसी दी जा सकती है। ऐसा लगता है कि उन पर न्यायालय को दया आ जाती है!  

सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखकर जगाते हैं क्रांति की अलख
फिर सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखकर ये समाज कौन सी क्रांति की अलख जगाने निकला है। चार दिन मोमबत्तियां जलाकर, नारे लगाकर, महिला सुरक्षा की बात कर आप लोग क्या कर लेंगे? कौन सुन रहा है आपको? फोन पर स्टेटस अपडेट करने से न्याय दिलाया जा सकता है क्या? क्या आप लोग अपना सब कुछ छोड़कर तब तक लड़ सकते हैं जब तक की हर रेप पीड़िता को न्याय नहीं मिलता? नहीं! कोई ऐसा नहीं कर सकता। सबके अपने काम है, जिंदगी है, क्यों किसी के न्याय के लिए अपने जीवन की शांति भंग की जाए। अपने जमीर को संतोष दिलाने के लिए फेसबुक स्टेट लिखना ज्यादा बेहतर है। नहीं?  

अकेली महिला से डर जाती है जाबाज पुलिस
दिल्ली में आज सुबह 7 बजे अनु नाम की एक बहुत मजबूत और संवेदनशील लड़की प्रियंका रेड्डी को इंसाफ दिलाने और महिला सुरक्षा की मांग करने के लिए संसद के बाहर के इलाके में प्रदर्शन कर रही थी। वो नादान अकेली ही निकल पड़ी। मीडिया वालों को उसके पास आता देख हमारी जाबाज पुलिस डर गई और उसको उठाकर ले गई। यही होता है, तभी हम सब बेचारे, सिस्टम से परेशान, लाचार लोग कुछ नहीं कर सकते। केवल अफसोस करो, क्योंकि यही कर सकते हो।

हम सब अपाहिज हैं। अपाहिज बस सावधानी बरत सकते हैं, लड़ नहीं सकते। इसलिए कहते हैं - तुम घर से कब निकली? सुनो ध्यान से जाना माहौल खराब है। मैं तुमको लेने आ जाउंगा, तब तक ऑफिस से या घर से बाहर मत निकलना। ये महिला सश्क्तिकरण और 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' जैसी बातें प्रशासन का मजाक है। ऐसी कोई नई योजना आए तो उस पर हसो और डरो। क्योंकि यही कर सकते हो।

लेखिका: कामिनी बिष्ट

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार पंजाब केसरी समूह के नहीं हैं, तथा पंजाब केसरी समूह उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है। 

 

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