Wednesday, Oct 27, 2021
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not only old fort, these places of delhi are also associated with pandavas

पुराना किला ही नहीं, दिल्ली के इन स्थानों के भी जुडे़ हैं पांडवों से नाम

  • Updated on 9/16/2021

नई दिल्ली। अनामिका सिंह। जब भी दिल्ली के इतिहास की बात की जाती है तो उसमें सबसे पहला जिक्र आता है पांडवों का। हस्तिनापुर के वो युवराज जिन्होंने खांडव प्रदेश को बसाया था और उसे किकर के जंगलों के बीच इंद्रप्रस्थ नामक इतनी सुंदर नगरी का निर्माण करवाया जोकि इंद्रदेव के महल सरीखा खूबसूरत था।

लेकिन सिर्फ इंद्रप्रस्थ ही नहीं बल्कि इसके अलावा सात अन्य भी ऐसे स्थल है जिन्हें पांडवों के नाम से याद किया जाता है। मुगलों व अंग्रेजों की बसाई इस दिल्ली में हालांकि हिंदूओं की दिल्ली काफी कम दिखती है लेकिन बावजूद पांडवों के दिल्ली का इतिहास आज भी अधूरा लगता है। आइए जानते हैं कि आखिर वो 8 जगह कौन से हैं जिनके तार पांडवों से जुडे हुए हैं।

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निगमबोध घाट के नजदीक हनुमान मंदिर
बता दें कि निगमबोध घाट को पांडवों से भी पुरातन काल का स्थान माना जाता है। निगमबोध घाट पर जो हनुमानजी का मंदिर है उसे 5 पांडवों में से तीसरे नंबर के अर्जुन द्वारा स्थापित बताया जाता है। कहा जाता है कि हनुमान जी के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रदर्शित करने के लिए उन्होंने यहां कीर्ति स्तंभ उनके नाम से स्थापित किया था, जहां बाद में मूर्ति स्थापित कर दी गई है। इस मंदिर में आज भी हनुमान भक्तों का तांता लगा रहता है।

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यमुना के किनारे बनाया नीली छतरी मंदिर
यमुना के किनारे बने सलीमगढ के उत्तरी द्वार के सामने शहर से यमुना के पुल को जाते समय सडक के बाएं हाथ पर नीली छतरी नाम का एक छोटा सा मंदिर है। कहते हैं कि महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ कर जब खुद को सम्राट घोषित किया तब इस छतरी को बनवाया था। जिसमें शिव मंदिर की स्थापना की गई थी, इसके कुछ खंभों में नीले रंग की सजावट आज भी देखने को मिलती है। लेकिन इतिहासकारों का कहना है कि नीली छतरी मंदिर को मुगलों ने तुडवा दिया था सिर्फ कुछ सीढियां, खंभे, शिवलिंग व दीवारों पर कहीं- कहीं नक्काशी बची थी। लेकिन इसका पुर्ननिर्माण मराठों ने अपने दिल्ली पर अधिकार के समय बनाया।

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कृष्ण की बहन योगमाया का मंदिर
श्रीकृष्ण के जन्म के संबंध में भागवत में कथा है कि वह योगमाया की सहायता से कंस के जाल से बच पाए थे, उसी योगमाया की स्मृति में पांडवों ने योगमाया मंदिर को बनवाया था। जिसे साल 1827 में अकबर द्वितीय के शासनकाल के दौरान लाला सेठमल ने पुर्ननिर्माण करवाया। मंदिर में मूर्ति नहीं है बल्कि काले पत्थर का गोलाकार पिंडी रूप आज भी देखने को मिलता है। यह मंदिर महरौली में स्थित है, इसे हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता है क्योंकि यहां फूलवालों की सैर मेला लगता है।

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कालकाजी अथवा काली देवी मंदिर
इस मंदिर का इतिहास बहुत प्राचीन है कहते हैं लाखों वर्ष पूर्व जब इस मंदिर में देवताओं का निवास था तो उन्हें दो दैत्य सताया करते थे। जिससे तंगा आकर देवता ब्रह्मा के पास शिकायत लेकर पहुंचे लेकिन उन्होंने दखल ना देकर उन्हें पार्वती के पास जाने को कहा। पार्वती के मुंह से कुश्की देवी निकली और उन्होंने दैत्यों का संहार किया लेकिन उनके रक्त से और राक्षस प्रकट होने लगे तो पार्वती को कुश्की देवी पर दया आ गई। कुश्की देवी की पलकों से विकराल काली देवी का जन्म हुआ और उन्होंने दैत्यों का संहार कर उनका खून पी लिया तब कहीं जाकर दैत्यों का अंत हुआ। तबसे कहा जाता है कि काली देवी यहां आकर बस गईं और पांडवों ने उनका मंदिर बनावाया। हालांकि वर्तमान मंदिर का सबसे पुराना भाग साल 1768 में बना बताया जाता है।

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बटुक भैरव मंदिर
पांडवों ने दूधिया व किलकारी भैरव के साथ ही फतहगढ की पहाडियों यानि नेहरू पार्क में बटुक भैरव का मंदिर बनवाया था। एकमात्र इस मंदिर की मूर्ति को पांडव काल का माना जाता है। मूर्ति पिंडी रूप में है जिसका चेहरा जमीन में बना हुआ है और चारों ओर 6 इंच ऊंची संगमरमर की दीवार है। कहा जाता है कि पांडव किले की सुरक्षा के लिए यज्ञ करते तो राक्षसों द्वारा उन्हें बार-बार भंग कर दिया जाता तब श्रीकृष्ण ने कहा कि भैरव जी का मंदिर बनाया जाए।

भीम, भैरव बाबा को लेने काशी गए और इंद्रप्रस्थ चलने को कहा तब उन्होंने शर्त रखी कि भीम उन्हें जहां पहले रख देंगे वो वहीं विराजमान हो जाएंगे। भीम ने शर्त मानी और कंधे पर उठाकर भैरव बाबा को चल दिए, बाबा की माया से भीम ने उन्हें यहां कंधे उतारकर रख दिया तबसे वो यहीं विराजमान है। उन्होंने अपनी जटा काटकर इंद्रप्रस्थ की सुरक्षा के लिए भेज दी थी। इस मंदिर की देखभाल नाथ संप्रदाय के पुजारियों द्वारा की जाती है और इसकी विशेष मान्यता है।

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किलकारी भैरव मंदिर
मथुरा रोड पर बाएं हाथ में पुराने किले की उत्तरी चारदीवारी के बराबर जो सडक अंदर को गई है वहां किले की दीवार से सटा है। उसे पांडवों द्वारा बनावाया गया किलकारी भैरव मंदिर बताया जाता है जिसका निर्माण पांडवों ने इंद्रप्रस्थ बसाने के दौरान किया था। इस मंदिर के भीतर आज भी भैरव जी के अलावा भीमसेन और हनुमान जी की मूर्तिंया हैं। साथ ही पुजारी नाथों की तीन समाधियां है। दिल्ली के 52 भैरव मंदिरों में इसे सबसे प्राचीन और श्रेष्ठ माना जाता है। कहा जाता है कि बटुक भैरव ने यहां जो अपनी चोटी काटकर भीम द्वारा भेजी थी उसे रखकर मंदिर का निर्माण करवाया गया ताकि किले की सुरक्षा की जा सके।

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दूधिया भैरव मंदिर
दूधिया भैरव मंदिर भी किलकारी भैरव मंदिर से करीब एक फर्लांग की दूरी पर ही है। इसका निर्माण भी पांडवकालीन माना जाता है। यह भी पुराने किले की दीवार से सटा हुआ मंदिर है जहां भैरव की मूर्ति सिंदूर से ढकी है। ये काफी अद्भूत मंदिर है क्योंकि बाबा भैरवनाथ पर यहां कच्चा दूध चढाया जाता है। साथ ही कुत्तों को भगवान भैरव का वाहन माना गया है इसलिए मंदिर परिसर में कई कुत्तों का पोषण किया जाता है। कहते हैं कि महाभारत प्रारंभ होने से पूर्व कुंती ने यहां आकर बाबा को दूध चढाया था और उनसे दूध की लाज रखने के बदले पांडवों की विजय व कुशलता की गुहार लगाई थी। जिसके बाद पांडवों को युद्ध में विजय प्राप्त हुई।

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पुराना किला या इंद्रप्रस्थ
पांडवों द्वारा बसाए गए किले इंद्रप्रस्थ को अब पुराना किला के नाम से जाना जाता है हालांकि अभी तक खुदाई मंे पांडवकालीन साक्ष्य प्राप्त नहीं हुए हैं लेकिन एएसआई लगातार प्रयासरत है। पुराणों के अनुसार युधिष्ठिर ने इंद्रप्रस्थ का राज अपने पुत्र व्रज और हस्तिनापुर का परीक्षित को दिया लेकिन व्रज अपना राज्य मथुरा ले गया और इंद्रप्रस्थ परीक्षित के अधीन आ गया। युधिष्ठिर की 30 पीढी ने इस पर राजा किया जिसका अंतिम राजा क्षेमक था। लेकिन वो अत्यंत दुर्बल साबित हुआ, जिसे मारकर मंत्री विस्त्रवा ने सिंहासन पर कब्जा कर लिया। पांडवों की पीढी का राज इतिहासकार 1 हजार 745 वर्ष का बताते हैं।
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