off-the-record-what-is-the-meaning-of-changing-political-mood-in-bihar

ऑफ द रिकॉर्डः क्या है बिहार में बदलते राजनीतिक मिजाज के मायने

  • Updated on 6/11/2019

नई दिल्ली/ कुमार आलोक भास्कर।  जब मोदी सरकार केंद्र में दोबारा सत्ता में आई तो अपने पहले के कार्यकाल से भी ज्यादा 303 सीटें लाकर अपने विरोधियों सहित राजनीतिक पंडितो के होश उड़ा दिए। और फिर जब 30 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सहयोगियों के साथ शपथ ग्रहण लिया तो बिहार में खलबली मच गई। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जेडीयू को उम्मीद था कि उनके 3 सांसदों को मंत्रिमंडल में जगह दिया जाएगा। लेकिन ऐसा न होने से नाराज नीतीश ने त्योरी चढ़ाने में देरी भी नहीं की। नीतीश ने अपने मंत्रिमंडल के विस्तार में भी भाजपा को 'जैसा को तैसा' दिखाते हुए भाजपा और लोजपा के विधायकों को जगह नहीं दी।

जल्द ही राज्यपाल के पद पर दिखेंगे भाजपा के कई दिग्गज नेता! शुरू हुई लॉबिंग

अब इसके कई मायने निकाले जा रहे है। अगर दीवार पर लिखी ईबारत को पढ़ा जाए तो ऐसा लगता है कि फिर से नीतीश कुमार अपने म्यान से तलवार खीचेंगे और भाजपा से एक झटकें में सारे रिश्ते को तोड़ डालेंगे। जैसा उन्होंने 2013 में भाजपा के नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने वक्त किया था। उस समय मोदी से तो इतने चिढ़ गए थे कि उनके 2014 में प्रधानमंत्री बनते ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। और तबके अपने राजनीतिक हनुमान जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया। लेकिन जब मांझी विभिषण बन गए तो खुद उसे हटाने से गुरेज भी नहीं किए।Navodayatimes

फिर गंगा में काफी पानी बह गया। 2015 के विधानसभा में राजद के साथ सत्ता में वापसी की और मुख्यमंत्री बने। लेकिन 2017 जुलाई में राजद के 'प्रेशर पालिटिक्स' से परेशान होकर नाता तोड़ लिया और फिर आ गए अपने पुराने साथी भाजपा के पास। भाजपा-जेडीयू की सरकार बनी। उस समय कहा गया कि नीतीश कि एक तरह से घर वापसी हुई है।

क्यों न हो आखिर भाजपा से तो उनकी पार्टी का गठबंधन 1996 से हुआ था जब समता पार्टी हुआ करती थी। उस समय जेडीयू को भाजपा का स्वाभाविक सहयोगी बताया गया। जेडीयू ने कहा कि 2013 में जो विकास पर ब्रेक लग गया था उसे फिर तेजी से चलाया जाएगा। नीतीश अपने पुराने रफ्तार में आ गए। लालू की पार्टी हाशिए पर जा चुकी है। कांग्रेस के तो किया कहने है।

PM मोदी के संसदीय क्षेत्र के बाल गृह का Video वायरल, बच्चों से साफ कराया जा रहा है टॉयलेट

जैसा उनके विरोधी नीतीश को 'पलटूराम' भी कहते है। वे इनसे बेपरवाह होकर महागठबंधन में फिर से जा सकते है। शायद सही समय का इंतजार किया जा रहा है। हालांकि यह भी चर्चा में है कि आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा नीतीश कुमार को आईना दिखाने में लगी हुई है। इसलिए उन्हें मंत्रिमंडल में 1 सीट दी जा रही थी जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। राजनीति के माहिर खिलाड़ी नीतीश भी भांपने में देरी नहीं लगाया।

PM मोदी से नवीन पटनायक ने की मुलाकात, ओडिशा के लिए मांगा विशेष राज्य का दर्जा

कहा जा सकता है कि भाजपा आगामी विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल के अलावा पंजाब, और बिहार में अपने सहयोगियों की परवाह किये बगैर अलग चालें चल सकती है। भले ही कोई नाराज हो तो हो। बंगाल की जीत से उत्साहित भाजपा मानती है कि यही सही समय है कि पार्टी को विस्तार दिया जाए। बिहार में तो फिर भी राजनीतिक जमीन बहुत हद तक तैयार है। बिहार भाजपा अध्यक्ष नित्यानंद राय को गृह राज्य मंत्री का पद देकर लगता है कि भाजपा राज्य के यादव वोट बैंक को साधने की कोशिश की है। तो वहीं गिरिराज सिंह के इफ्तार पार्टी पर दिए बयान से फिर से भाजपा हिंदुत्व पिच पर विधानसभा चुनाव में उतर सकती है।  

वर्ल्ड कप में टीम इंडिया को बड़ा झटका- शिखर धवन 3 हफ्ते के लिए टीम से बाहर
 
लेकिन अगर फिर से नीतीश भाजपा से रिश्ता तोड़ते है तो राजनीतिक पंडितों का कहना है कि यह बिहार के विकास पर फिर से एक ब्रेक लग जाएगा। माना जाता है कि केंद्र में जो पार्टी सरकार में रहती है अगर राज्य में भी उन्हीं की सरकार या सहयोगी पार्टी की सरकार हो तो विकास के काम तेजी से किये जा सकते है। अगर ऐसे मौके पर जब भाजपा केंद्र सरकार में हो तो उसके विपरीत जाने से भले ही नीतीश को तात्कालिक राजनीतिक फायदा मिल जाए लेकिन बिहार का नुकसान हो सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं है।

 

Hindi News से जुड़े अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करें।हर पल अपडेट रहने के लिए NT APP डाउनलोड करें। ANDROID लिंक और iOS लिंक।

comments

.
.
.
.
.