Sunday, May 22, 2022
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parties engaged in creating caste equations in west up, a contest between sp alliance-bjp

वेस्ट यूपी में जातीय समीकरण साधने में जुटे दल, मुकाबला सपा गठबंधन- भाजपा में

  • Updated on 1/17/2022

नई दिल्ली/शेषमणि शुक्ल। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के लिए सियासी दलों की ओर से घोषित प्रत्याशियों की पहली सूची से ही चुनाव किस दिशा में जा रहा है, इसका इशारा मिलने लगा है। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के साए में 2014, 2019 का लोकसभा और 2017 का विधानसभा चुनाव हो चुका है। किसान आंदोलन ने इस दंगे के असर को अब काफी हद तक कमजोर कर चुका है, लेकिन टिकट बंटवारा यही इशारा कर रहा है कि अंत में चुनाव प्रचार ध्रुवीकरण पर ही केंद्रित होने वाला है।

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पहली सूची में बसपा ने 14 मुस्लिम और नौ दलित प्रत्याशी दिया है तो समाजवादी पार्टी-राष्ट्रीय लोकदल गठबंधन ने अपनी दो सूचियों में 10 मुस्लिम प्रत्याशियों का टिकट घोषित किया है। कांग्रेस भी 10 से ज्यादा मुस्लिम प्रत्याशी अब तक घोषित कर चुकी है। इसी तरह जाट और दलित का भी समीकरण साधा जा रहा है, जिसमें भाजपा ने अपनी पहली सूची में पिछली बार से ज्यादा टिकट दिया।

अब तक घोषित प्रत्याशियों में भाजपा ने 17 जाट, सात गुर्जर और 19 दलित को टिकट दिया है। जबकि 2017 में भाजपा ने इस इलाके में 16 जाट, सात गुर्जर और 18 दलित को टिकट दिया था। इसके दम पर पार्टी ने इलाके की 85 फीसद सीटें जीतने में सफल रही। जाट-गुर्जर से भाजपा पिछड़ी जाति को साधने का काम कर रही है, जिसका संदेश पूर्वी उत्तर प्रदेश तक जाना तय है। 

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2014, 2017 फिर 2019 के चुनाव में भाजपा ने 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे को भुनाया था। इस बार हालात बदले दिख रहे हैं। किसान आंदोलन ने जाट और मुस्लिमों के बीच बनी खाईं को काफी हद तक कम करने का काम किया है। इसके बावजूद भाजपा की रणनीति में ज्यादा बदलाव नहीं दिख रहा है। कम से कम प्रत्याशी घोषणा में तो उसने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया।

जानकारों का कहना है कि भाजपा अपना चुनाव प्रचार हिंदू-मुस्लिम पर ही ले जाने वाली है। उन सभी विधायकों को टिकट रिपीट किया है, जिनका नाम दंगे को हवा देने में आया था। पार्टी ने सपा-रालोद के टिकट को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रिया दी, उसी से ही इसके संकेत साफ हो गए। सपा-रालोद गठबंधन अब तक दो लिस्ट में 36 प्रत्याशी घोषित कर चुका है। इसमें 10 मुस्लिम प्रत्याशी हैं। 

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भाजपा के एक नेता ने इसी को आधार बनाते हुए कहा कि भाजपा की सरकार प्रदेश में आने के बाद इलाके में छेड़छाड़, गुंडागर्दी और बाकी अपराध लगभग खत्म हो गए थे, सपा और रालोद मिल कर फिर 2017 से पहले की स्थिति बनाना चाहते हैं। भाजपा नेता ने इशारो इशारो में संकेत दे दिया कि उसका चुनाव प्रचार आने वाले दिनों में किस दिशा में जाने वाला है।

बसपा ने दलित से ज्यादा मुस्लिम प्रत्याशी उतारा है। यह मुस्लिम वोटों को बांटने की रणनीति का हिस्सा है। इसीलिए सपा-रालोद अब बसपा को भाजपा की मददगार बता रही है। मुस्लिम वोट बंटने का फायदा भाजपा को ही मिलता रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में करीब 19 फीसद मुस्लिम आबादी है। इस वोट बैंक पर बसपा और सपा दोनों दावा करती रही हैं और 2014 से पहले रालोद को भी इस वोट बैंक का बड़ा हिस्सा मिलता रहा है। अगर, मुस्लिम वोट फिर से सपा-रालोद की ओर एकजुट हुआ तो पश्चिमी यूपी की अधिकांश सीटों पर भाजपा और सपा गठबंधन आमने-सामने होंगे।

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शायद इसी को ही ध्यान में रख कर चुनाव प्रचार तेज करने से पहले अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, काशी विश्वनाथ कॉरीडोर के बाद अब मथुरा कृष्ण जन्मभूमि का मुद्दा गरमा कर भाजपा माहौल आकने में लगी है। अगर मतदाताओं का समर्थन मिलता दिखा तो पार्टी एक बार फिर ध्रुवीकरण के अपने आजमाए हुए हथकंडे को ही आगे बढ़ाएगी।

फिलहाल तो जातीय, सामाजिक समीकरण और विकास के मुद्दे को आगे कर पार्टी चुनाव में उतरने की बात कह रही है। हालांकि पिछड़ी जाति से जुड़े कुछ मंत्रियों और विधायकों के सपा में जाने से भाजपा के नेताओं की परेशानी भी झलक रही है। कहा यह भी जा रहा है कि इस घटना के चलते कई विधायकों के टिकट बच गए, अन्यथा भाजपा अपने सर्वे को आधार बना कर कई और टिकट काटने वाली थी, जिसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज्यादा हैं। विधानसभा क्षेत्र में न रहने और काम नहीं करने संबंधी कई विधायकों की शिकायत पार्टी तक पहुंची हुई है।

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