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सुविधाभोगी व्यवस्था से त्रस्त है समाज

  • Updated on 10/27/2016

Navodayatimesनई दिल्ली, (टीम डिजिटल): ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के प्रमुख और देश के लिए देश में रहकर लडऩे वाले नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी का मानना है कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान का जो असर पिछले दो साल में होना चाहिए था, नहीं हुआ। यह अभियान महज नारा बनकर न रह जाए, इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ ही सामाजिक चेतना की जरूरत है।

एक पीढ़ी बचा और पढ़ा लीजिए, आगे आने वाली पीढ़ी खुद को बचा लेगी। बस, सोच बदलने की जरूरत है। उपभोग की वस्तु न मानकर लड़कियों-महिलाओं को बराबरी का दर्जा देना होगा। उन्हें शिक्षित करना होगा।

यह समाज सुविधाभोगी व्यवस्था से त्रस्त है। नवोदय टाइम्स के दफ्तर में आए सत्यार्थी ने बच्चों और बाल अधिकारों पर खुलकर चर्चा की। प्रस्तुत है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश...

बाल अधिकारों की लड़ाई आप लंबे समय से लड़ रहे हैं, नोबेल शांति पुरस्कार पिछले साल जाकर मिला। इसमें देरी नहीं हुई?

देरी और जल्दी जैसी कोई बात नहीं है। वास्तविक बात यह है कि मुझसे पहले अगर यह पुरस्कार महात्मा गांधी या जवाहर लाल नेहरू को मिला होता तो मुझे यह पुरस्कार लेने में और ज्यादा गौरव की अनुभूति होती। गांधी जी को 6 बार नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया था और नेहरू को 11 बार, लेकिन उन्हें नहीं मिला। पहली बार बच्चों के लिए किए गए कार्यों को दुनिया ने तरजीह दी और इस क्षेत्र के लिए नोबेल पुरस्कार तय किया। जब यह पुरस्कार मिला तो मैंने राष्ट्रपति के माध्यम से इसे देश और जनता को समर्पित कर दिया। राष्ट्रपति भवन के म्यूजियम में यह पुरस्कार रखा है। 

नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद अपने काम में आप किस तरह का बदलाव देखते हैं?

मैं अपना काम जिस तरह पहले करता था, वैसे ही अब भी कर रहा हूं। हां, अब मेरी जिम्मेदारी और व्यस्तता और बढ़ गई है। पहले आम लोगों और अपने कार्यकत्र्ताओं के बीच रहकर बाल अधिकारों की लड़ाई लड़ता था, अब राष्ट्राध्यक्षों और शासकों से मिलता हूं और उनके देश की नीतियों में बच्चों से जुड़े मुद्दे शामिल कराने पर जोर दे रहा हूं। लोगों में बाल अधिकारों के प्रति चेतना लाने की कोशिश कर रहा हूं।

क्या बाल अधिकारों के प्रति सरकारें कुछ चेतीं, समाज कुछ जागा?

बाल दासता सामाजिक बुराई है, एक ‘माइंडसेट’ है, जो निर्बल को गुलाम बनाने वाली सोच का द्योतक है। एक संगठित अपराध है, जो पैसे कमाने का जरिया बना हुआ है। मानव तस्करी, बाल बंधुआ मजदूरी कराने वाला ‘नेक्सस’ है, जो भ्रष्टाचार से भी जुड़ा हुआ है। मैंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियर का करिअर छोड़कर बाल अधिकारों की लड़ाई शुरू की थी। उस वक्त मेरे काम को पहले तिरस्कृत किया गया, फिर अनदेखी की गई और बाद में जो लोग प्रभावित हुए, हमले भी किया। लेकिन, आज बाल अधिकारों पर चर्चा हो रही है। 1989 में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने बाल अधिकारों को मान्यता दी, तब तक दुनिया के किसी देश में बाल अधिकारों के लिए कोई कानून नहीं था। 1999 में पहली बार अंतर्राष्ट्रीय कानून बना। आज सरकारें अपनी नीतियों में बच्चों से जुड़े मुद्दे शामिल करने लगी हैं।

पश्चिमी देशों में बच्चों के हालात ऐसे ही हैं?

पश्चिम में खासकर यूरोपीय देशों में बच्चों की शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया है। वह भी लड़कियों की शिक्षा पर। ताजा मामला टर्की का ही लें, जहां के शासक ने महिला शिक्षा अनिवार्य कर दिया। चीन में बड़ा बदलाव हुआ जब माओत्से तुंग ने वैश्याओं को अपनी बेटी कहकर उन्हें उस दुनिया से बाहर निकालने और समाज में स्थापित करने की कोशिश की। कोरिया को ही लें, यहां बच्चों को गुणवत्तायुक्त तकनीकी शिक्षा पर जो दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि कोरिया आज जापान और चीन से बेहतर क्वालिटी के इलेक्ट्रानिक सामानों का उत्पादन कर रहा है। श्रीलंका में 1971-72 में बच्चों की शिक्षा पर जोर दिया गया। जहां तक भारत का सवाल है तो यह अभी काफी पीछे है। यहां 41 फीसदी आबादी बच्चों की है, लेकिन इनके शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा पर जीडीपी का 4 फीसदी बजट खर्च किया जाता है।

‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान के बाद भी देश में लड़कियों की स्थिति सुधरती नहीं दिख रही है?

देश में लड़कियों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। प्रधानमंत्री बेटियों के प्रति चिंतित लगते हैं। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान भी शुरू किया है, लेकिन आज भी 3 साल, 5 साल की बच्चियों से बलात्कार हो रहा है। गर्भ में ही बच्चियां मार दी जा रही हैं। असम, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल जैसे प्रांतों से छोटी-छोटी बच्चियां तस्करी करके लाई जाती हैं और वैश्यावृत्ति में झोंक दी जा रही हैं। हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विवाह के लिए एक से डेढ़ लाख में लड़कियां बेची जा रही हैं। पूरी दुनिया में भारत सबसे तेजी से आर्थिक विकास वाला देश बन रहा है, साथ में यह कलंक भी चिपका हुआ है कि छोटी बच्चियों के साथ यहां बलात्कार की घटनाएं हो रही हैं।

पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई जैसी कम उम्र की बच्ची के साथ आपको पुरस्कार मिला, कैसा लगा?

मलाला मेरी बेटी है इसलिए उसके बारे में तो मुझे कुछ नहीं कहना। वैसे भी मलाला की इच्छा पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनने की है और राजनीति से मेरा दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। मैं आर्य समाजी हूं। किसी धर्म या विचारधारा से कभी नहीं जुड़ा रहा और न ही मैं ऐसे किसी मंच पर जाता हूं।

पिछले कुछ वर्षों में देश में एनजीओ का बड़ा गोरखधंधा फैल गया है। आप इसे किस रूप में देखते हैं..?

जब मैंने बचपन बचाओ आंदोलन शुरू किया था, तब एनजीओ जैसा कोई शब्द भी नहीं जानता था। आज हर 400 व्यक्ति पर एक एनजीओ काम कर रहा है। इनमें कुछ बिना किसी शोर-शराबे और प्रचार के देश के ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छा काम कर रहे हैं। लेकिन, तमाम ऐसे भी हैं जो सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार में सहयोगी बनकर सिर्फ धन कमाने का जरिया हैं। आज एनजीओ में करिअर बनाने के विज्ञापन अखबारों में आ रहे हैं। सरकार और सरकारी तंत्र को चाहिए कि एनजीओ का सही उपयोग करे। पुख्ता निगरानी करे और फंड लीक को रोके। विकास के क्षेत्र में आज पूरी दुनिया में एनजीओ (जिसे सिविल सोसाइटी भी कहा जाता है) और कॉरपोरेट की सबसे ज्यादा जरूरत महसूस की जाने लगी है।

जब नोबेल का पता चला

मैं अपने दफ्तर में काम कर रहा था, तभी एक प्रमुख न्यूज चैनल के रिपोर्टर का फोन आया। उसने नोबेल-नोबेल कहकर फोन रख दिया। अत्यधिक उत्साह में वह पूरी बात नहीं कह पाए। मैं उसकी बात पूरी तरह समझ नहीं पाया। मुझे लगा वह नोबेल के संबंध में कोई जानकारी चाहता है। मैंने कुछ वेबसाइटें खंगालनी शुरू कीं, तब तक न्यूज फ्लैश हो गई कि मुझे नोबेल मिला है। इस सूचना के बाद दफ्तर का माहौल ही बदल गया, सभी खुशी से झूमने लगे। साथियों ने आकर मुझे नोबेल मिलने की जानकारी दी। यह खबर सुनकर मुझे दिल से लगा कि मेहनत और लगातार संघर्ष जो मैंने और मेरे साथियों ने किया तथा समाज का जो उसमें योगदान था, उसे पूरी दुनिया में पहचान मिली है। 

अंत में कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि- दुनिया भर में 1600 अरब डॉलर सालाना युद्ध कार्यों पर खर्च किया जा रहा है। जबकि महज 40 अरब डॉलर सालाना खर्च करने से दुनिया का हर बच्चा शिक्षा पा सकता है। दुनिया में कहीं भी बच्चे सरकारों की प्राथमिकता में नहीं हैं। सबसे कम बजट शिक्षा, स्वास्थ्य और बाल सुरक्षा का है। आज दुनिया में 450 करोड़ बच्चे हिंंसा के शिकार हैं। सीरिया, नाइजीरिया, इराक, लेबनान या फिर साऊथ सूडान इन देशों के जो हालात हैं, सबसे ज्यादा बच्चे प्रभावित हैं। आतंकवाद और घरेलू युद्धों के चलते दुनिया भर में 8.5 करोड़ बच्चे स्कूल छोडऩे को अभिशप्त हैं। शरणार्थी बने बच्चों की मनोवैज्ञानिक और मानसिक सुरक्षा की जरूरत है।  

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