Sunday, Jan 23, 2022
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temple corridor is fine, west up asks for more

विधान सभा चुनाव 2022ः मंदिर- कॉरीडोर तो ठीक, वेस्ट यूपी मांगे 'More'

  • Updated on 1/12/2022

नई दिल्ली/शेषमणि शुक्ल। अयोध्या में राम मंदिर, काशी में विश्वनाथ कॉरीडोर और अब मथुरा की बारी जैसे नारे इस बार फिर उत्तर प्रदेश के चुनाव में काफी अहम होते दिख रहे हैं। लेकिन सूबे का पश्चिमी इलाका (वेस्ट यूपी) इन सबके साथ-साथ और भी कुछ चाहता है। वह रोजगार भी चाहता है, महंगाई पर नियंत्रण चाहता है, समय पर गन्ना भुगतान और वाजिब कीमत चाहता है। यहां के मतदाताओं के अपने स्थानीय मुद्दे भी हैं तो मौजूदा जन प्रतिनिधि से नाराजगी भी है। हालांकि अपराध नियंत्रण में आई सुधार से लोग संतुष्ट हैं।

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किसान बहुल इस इलाके के मतदाताओं की सबसे बड़ी मांग गन्ना मूल्य है। यूपी सरकार से इस बार भी गन्ने की सही कीमत नहीं घोषित की गई। इस बात से किसान नाराज हैं। सरकार ने वादा किया था कि 14 दिन के भीतर चीनी मिलों से किसानों का भुगतान हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। करोड़ों रुपये किसानों का चीनी मिलों पर बकाया है।

युवाओं की एक पीढ़ी ओवर एज होने को है, जो नौकरियों का इंतजार करती रह गई। जितनी भी सरकारी नौकरियों की रिक्तियां घोषित की गईं, ज्यादातर सिरे नहीं चढ़ सकीं। कभी पेपर लीक होने के चलते परीक्षा रद्द हो गई तो कभी कोर्ट में जाकर अटक गई। युवा मतदाता इससे निराश दिखते हैं। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर डॉ. जयवीर राणा इस बात पर ज्यादा जोर देते हैं कि युवा मतदाता में मौजूदा सरकार को लेकर निराशा है।

डॉ. राणा का कहना है कि इस चुनाव में किसान आंदोलन का असर पूरे वेस्ट यूपी में दिखेगा ही, रोजगार और महंगाई भी एक अहम मुद्दा है, जिससे मतदाता नाराज है। किसानों को धान की भी एमएसपी नहीं मिली सकी थी और गन्ने का मूल्य भी अपेक्षित नहीं घोषित किया गया। डॉ. राणा का कहना है कि 2017 में वेस्ट यूपी में भाजपा की जीत के पीछे 2013 का मुजफ्फरनगर दंगा था, जिसे मुद्दा बनाकर भाजपा ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किया और क्लीन स्वीप कर ली। इस बार हालात बदले हुए हैं। 

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डॉ. राणा के मुताबिक पूरे वेस्ट यूपी में जाट-गूजर और मुस्लिम प्रभावशाली समुदाय है। मिहिर भोज वाले विवाद से गूजरों में सरकार के प्रति नाराजगी साफ दिख रही है। जाट समुदाय राष्ट्रीय लोकदल के उदय के साथ से ही उसका कॉडर वोट रहा है। 2013 के दंगे के चलते जो जाट रालोद से छिटक गया था, वह इस बार वापस आता दिख रहा है।

किसान आंदोलन और अब रालोद-सपा का गठबंधन से भी जाट-मुस्लिमों के बीच की खांई कम होती दिख रही है। डॉ. राणा के मुताबिक 2017 में कांग्रेस की कोई रणनीति नहीं थी, लेकिन इस बार प्रियंका गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस खासकर शहरी क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाती दिख रही है। इसका भी इस बार काफी असर पडऩे वाला है।

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रालोद के मुख्यालय, बागपत के बड़ौत कॉलेज के राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर डॉ. स्नेहवीर पुंडीर भी मानते हैं कि सपा के साथ रालोद के गठबंधन ने भाजपा के सामने चुनौती खड़ी कर दी है। मंहगाई एक ऐसा मुद्दा है, जिससे भाजपा का प्रमुख वोटर कहा जाने वाला ब्राह्मण, बनिया और राजपूत भी परेशान है।

किसान आंदोलन का असर तो पूरे वेस्ट यूपी में दिख ही रहा है। सरकारी कर्मचारियों में भी नाराजगी दिख रही है। खासकर पेंशन योजना और निजीकरण को लेकर। सरकारी कर्मचारी पुरानी पेंशन योजना वापस चाहते हैं। डॉ. स्नेहवीर का कहना है कि चुनाव इस बार भी हिंदू-मुस्लिम ही करने की कोशिश हो रही है, लेकिन यह ज्यादा असरकारी नहीं होता दिख रहा है। इसलिए भाजपा को कुछ और रणनीति बनानी होगी। मौजूदा जनप्रतिनिधियों से लोगों में नाराजगी भी भाजपा को नुकसान पहुंचाती दिख रही है।

डॉ. स्नेहवीर के मुताबिक मायावती का निष्क्रिय होकर बैठ जाने से दलित वोटर अपने लिए नए घर की तलाश करता दिख रहा है। उसके लिए एक विकल्प चंद्रशेखर आजाद की पार्टी हो सकती है। जहां तक मुस्लिम मतदाताओं की बात है तो कुछ हिस्सा पहले बसपा को जाया करता था, इस बार मायावती ज्यादा सक्रिय नहीं दिख रही हैं तो मुस्लिम वोट के एकजुट होने की पूरी संभावना है।

हां, वेस्ट यूपी में जहां शाम ढलते ही अपराधी सडक़ों पर होते थे और लोगों में एक खौफ भरा हुआ था, प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने माहौल बदला है और आज अपराध नियंत्रित है। यह बात भाजपा के पक्ष में जाती है। 

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