Thursday, Oct 28, 2021
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एटा में मिली गुप्तकालीन मंदिर की सीढियां, शंख लिपि में है अभिलेख

  • Updated on 9/11/2021

नई दिल्ली। अनामिका सिंह। गुप्तकालीन मंदिर की सीढियां मिलने से आगरा सर्किल के पुरातत्वविदों में काफी खुशी का माहौल है। बता दें कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के आगरा सर्किल के पुरातत्व अधीक्षक वसंत स्वर्णकार ने उत्सुकतावश गुप्तकालीन मंदिर की सीढियों की खोज कर ली। बता दें कि  उन्होंने यूपी के एटा जिले के एक गांव बिलसढ में गुप्तकालीन संरक्षित साईट की गहराई नापने का अभियान शुरू किया और 5 दिन बाद ही उनके सामने गुप्तकालीन 5 सीढियां मौजूद थीं। इन सीढियों पर लिखी गई लिपि ने इसका रहस्य खोला। दरअसल यह शंख लिपि थी जो गुप्तकाल के दौरान एक प्रचलित अलंकारिक भाषा थी। शंख लिपि में लिखे अभिलेखों को पढने के बाद पता चला कि यह गुप्तकालीन मंदिर की सीढियां हैं।
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कुमारगुप्त के समकालीन साहित्य में भी मंदिर होने की है पुष्टि
वसंत स्वर्णकार ने नवोदय टाइम्स से विशेष बातचीत के दौरान बताया कि यहां पहले से 4 पीलर मौजूद थे, जिनके गुप्तकाल का होना उनकी सजावट को देखकर साफ था। इनमें से 2 पीलर सर्कुलर थे व अन्य 2 पीलर चैकोर थे। जब कुछ दिन पहले इस जगह की सफाई करवाई जा रही थी, तो हमने इसकी ड्रिलिंग करने का फैसला लिया। हमारे मन में उत्सुकता इस बात को जानने की थी कि ये पीलर आखिर कितना जमीन के अंदर धंसे हुए हैं। इसी दौरान हमें 5 सीढियां मिली, जिसमें सबसे नीचे की पांचवी सीढी काफी बडी और चैडी है। इस पर 5वीं शताब्दी के शंख लिपि में लिखे अभिलेख से प्रथम दृष्टि में गुप्तकालीन मंदिर की सीढी होने के संकेत मिल चुके थे। इसके अलावा कुमारगुप्त के समकालीन साहित्य में भी उक्त स्थान पर मंदिर होने की पुष्टि की गई है।
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महेंद्रादित्य का मिला जिक्र
इन पांचवी सीढी पर लिखे अभिलेख को पढने के लिए चंडीगढ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर देवेंद्र कुमार हाडा को बुलाया गया जोकि शंख लिपि के एक्सपर्ट हैं। उन्होंने बताया कि इस पर शंखलिपि में महेंद्रादित्य का नाम खुदा हुआ है, जिन्हें कुमारगुप्त प्रथम के नाम से जाना जाता है। कुमारगुप्त ने बाद में महेंद्रादित्य की उपाधि धारण की थी।
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कौन है कुमारगुप्त
गुप्तकालीन राजाओं में कुमारगुप्त का नाम बडे सम्मान के साथ लिया जाता है। एटा क्षेत्र में कई गुप्तकालीन स्थान प्राप्त हुए हैं जोकि कुमारगुप्त द्वारा बनवाए गए थे। उनका शासन वर्तमान उत्तर-मध्य भारत का इलाका था। इतिहासकारों के अनुसार 5वीं शताब्दी के दौरान करीब 40 सालों तक कुमारगुप्त का शासन रहा है। 
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एटा का पुरा इलाका है पुरास्थल
डाॅ. स्वर्णकार ने बताया कि एटा का पूरा इलाका पुरास्थल है लेकिन आबादी अधिक होने की वजह से उत्खन्न संभव नहीं है। इस इलाके को व जहां मंदिर की सीढियां मिली हैं उस साईट को साल 1928 में ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने संरक्षित स्थल घोषित कर दिया था। जब पहली बार यहां गुप्तकाल के सजावटी स्तंभ प्राप्त हुए थे।
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अश्वमेघ यज्ञ भी करवाया था कुमारगुप्त ने 
डाॅ. स्वर्णकार कहते हैं कि गुप्तकालीन मंदिर की सीढियां मिलने के बाद हमने लखीमपुर खीरी में मिली एक घोडे की मूर्ति जिसे वर्तमान में लखनऊ स्टेट म्यूजियम में रखा है उसे देखा। उस पर भी शंखलिपि में अभिलेख दिखाई दिए। तब इस अलंकारिक और प्राचीन लिपि को पढने के लिए डाॅ. हांडा को भेजा गया। डाॅ. स्वर्णकार का कहना है कि घोडे की प्रतिमा का मिलना यह स्पष्ट करती है कि कुमारगुप्त ने अपने शासनकाल के दौरान अश्वमेघ यज्ञ करवाया होगा। 
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हस्ताक्षर के लिए होता था शंखलिपि का प्रयोग
शंखलिपि काफी अलंकारिक और प्राचीन शैली की लिखावट है। कहते हैं कि इस लिपि का इस्तेमाल चैथी से 8वीं शताब्दी के दौरान नाम और हस्ताक्षर लिखने के लिए किया जाता था। गुप्तकालीन शासकों ने ब्राहमणों, बौद्ध और जैनों के अनुयायियों के लिए चट्टानों को काटकर मंदिरों का निर्माण करवाया था। जिसके अवशेष आज भी कई जगह मिलते हैं।
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सीढियों का होगा संरक्षण
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा एटा में मिले इस गुप्तकालीन 5वें अवशेष को संरक्षित करने का प्रयास किया जा रहा है। जिसके लिए यहां शेड लगाई जाएगी। साथ ही पर्यटकों को गुप्तकालीन वास्तुशैली व उसकी विशेषता की जानकारी देने के लिए यहां साइनबोर्ड भी लगाए जाएंगे।

 

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