Friday, May 27, 2022
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up elections 2022: all three seats of baghpat under the shadow of farmers'''''''''''''''' movement

यूपी चुनाव 2022: किसान आंदोलन के साए में बागपत की तीनों सीटें

  • Updated on 1/27/2022

नई दिल्ली/शेषमणि शुक्ल। उत्तर प्रदेश का बागपत जिला अपने ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है। कहते हैं कि महाभारत काल में पांडवों की ओर से श्री कृष्ण ने कौरवों से जिन पांच गांवों को मांगा था, उसमें से एक बागपत भी था। इसका प्राचीन नाम व्याग्रप्रस्थ या व्यगतप्रस्थ बताया जाता है। मौजूदा वक्त में यह एक व्यापारिक केंद्र है। गुड़, शूगर, चादरों का कारोबार होता है। हाल के दिनों में यह जिला नामी शूटर प्रकाशो तोमर और चंद्रा तोमर के चलते चर्चाओं में रहा, जिन पर हिंदी फिल्म ‘सांड की आंख’ बनी है। सियासी तौर पर यह जाट बहुल यह जिला राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) का गढ़ है, लेकिन 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के चलते बिखरे जाट वोट का फायदा भाजपा को मिला और 2017 में जिले की दो सीटें ले उड़ी। रालोद ने केवल छपरौली सीट जीती, बाद में रालोग विधायक भाजपा में शामिल हो गया। इस तरह मौजूदा वक्त में जिले की तीनों सीटें भाजपा के पास हैं। 2022 का चुनाव किसान आंदोलन के साए में हो रहा है। किसानों की नाराजगी और जाट-मुस्लिम का दोबारा बन रहा समीकरण भाजपा की मुश्किलें बढ़ती दिख रही है।

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बागपत जिले के बड़ौत डिग्री कॉलेज में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर डॉ. स्नेहवीर पुंडीर का कहना है कि यह जिला किसान बहुल है, जिसमें जाट-मुस्लिम के साथ बाकी जाति के लोग भी कृषि कार्य से ही जुड़े हुए हैं। यह रालोद का गढ़ रहा है। 2017 का चुनाव 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के साए में हुआ था। उस दंगे की वजह से जाट वोट में बिखराव हुआ, जिसका फायदा भाजपा को मिला था। लेकिन इस बार हालात बदले दिख रहे हैं। कृषि कानूनों के खिलाफ हुए किसान आंदोलन में बागपत जिले के किसानों की बड़ी भागीदारी थी। केंद्र सरकार ने इस आंदोलन को केवल जाटों और सिखों का आंदोलन बता कर अनदेखी की थी, जिससे किसानों में उपजी नाराजगी अब तक दिख रही है। डॉ. स्नेहवीर के मुताबिक 2017 में भाजपा ने अपने प्रत्याशी भी काफी मजबूत उतारे थे, जो इस बार भी मैदान में हैं। इसलिए यह कहना कि चुनाव पूरी तरह रालोद के पक्ष में है, ठीक नहीं होगा। मगर, चुनाव भाजपा के लिए भी आसान नहीं है। जाट और मुस्लिमों में दंगे की वजह से जो दूरी बन गई थी, वह कुछ कम हुई दिख रही है। वहीं, कारोबारी, छोटे व्यापारी केंद्र सरकार की कुछ नीतियों से खुश नहीं तो युवा अपनी बेरोजगारी और सरकारी नौकरियों की भर्तियां बार-बार रद्द होने से खफा है। इन सबका असर चुनाव में रहने वाला है।

यहां समझें तीनों सीटों का सियासी गणित-
छपरौली-बागपत जिले की छपरौली विधानसभा सीट सबसे अहम है। यह वही सीट है, जहां से पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने अपना सियासी सफर शुरू किया था। बाद में उनके पुत्र चौधरी अजीत सिंह ने जब रालोद का गठन किया तो यह विधानसभा सीट रालोद का गढ़ बन गई। लंबे वक्त से यह सीट रालोद के कब्जे में है। 2017 में जब जाट वोटों में बिखराव हुआ और रालोद अपनी सारी सीटें हार गई थी, छपरौली ही एकमात्र सीट थी, जहां जीती थी। यह अलग बात है कि यहां से जीते रालोद विधायक सहेंद्र रमाला बाद में भाजपा में चले गए और रालोद शून्य पर पहुंच गई। इस बार भाजपा ने सहेंद्र रमाला को अपना उम्मीदवार बनाया है। रालोद ने उनके सामने पूर्व विधायक वीरपाल राठी को पहले प्रत्याशी घोषित किया, लेकिन इसका विरोध होने पर उनकी जगह पूर्व विधायक प्रोफेसर अजय कुमार को टिकट दे दिया। जबकि बसपा ने यहां मोहम्मद शाहीन को और कांग्रेस ने डॉ. यासीन चौधरी को अपना उम्मीदवार बनाया है। रमाला और राठी दोनों जाट समुदाय से आते हैं। जाट वोट का बंटना तय है, लेकिन बसपा-कांग्रेस की ओर से मुस्लिम प्रत्याशी दिया जाना, भाजपा के पक्ष में जाता दिख रहा है। 2017  में भाजपा यहां महज 3842 वोट से ही हारी थी। 2012 में वीरपाल ने बसपा प्रत्याशी देवपाल सिंह को 21571 वोटों से हराया था और 2007 में भी यह सीट रालोद ने ही 15 हजार से ज्यादा वोटों से बसपा को हरा कर जीता था। डॉ. स्नेहवीर का कहना है कि इस बार इस सीट पर जाट-मुस्लिम के बंटवारे से मुकाबला कांटे का है, लेकिन बाकी जातियां जिसके साथ जाएंगी, यह सीट उसकी होगी।

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बड़ौत-बागपत जिले की बड़ौत सीट सबसे पुरानी विधानसभा सीट है। 1952 में यह सीट अस्तित्व में आई। जाट, वैश्य, मुस्लिम और दलित आबादी वाली यह सीट वैसे जाट बहुल है। यहां के जाटों के व्यवहार से स्थानीय वैश्य थोड़े नाराज रहते हैं और अक्सर गैर जाट प्रत्याशी की ओर चले जाते हैं। लेकिन 2017 में जाट समुदाय के ही भाजपा के कृष्णपाल मलिक विजयी हुए थे। मलिक नगर पालिका के चेयरमैन रहे हैं और सभी जाति-बिरादरी में अच्छी रसूख रखते हैं। वे एक मजबूत प्रत्याशी हैं और भाजपा ने इस बार भी उन्हें ही मैदान में उतारा है। उनके सामने रालोद ने जयवीर तोमर को प्रत्याशी बनाया है। बसपा ने यहां ब्राह्मण प्रत्याशी अंकित शर्मा को उतारा है। बदले समीकरण में यह सीट भाजपा के लिए फंसी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि 2017 का चुनाव 2016 के नोटबंदी के तीन महीने बाद हुआ था, जिसमें नोटबंदी का असर दिख नहीं पाया था और जीएसटी बाद में लागू हुई। पांच साल में केंद्र के इन दोनों फैसलों का व्यापक असर छोटे व्यवसायी और कारोबारी पर पड़ा है। बड़ौत व्यावसायिक केंद्र है। इन फैसलों पर भाजपा अपना बचाव नहीं कर सकी तो उसके लिए यह सीट फंसी हुई दिख रही है। हालांकि अपराध पर नियंत्रण भाजपा के पक्ष में जाता दिख रहा है।

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बागपत-करीब 20 लाख मतदाताओं वाली यह विधानसभा सीट खेकड़ा विधानसभा सीट के परिसीमन से अस्तित्व में आई। गुर्जर, त्यागी, ब्राह्मण के साथ मुस्लिम-जाट की मिलीजुली आबादी है। इस सीट पर कोकब हमीद लंबे वक्त तक विधायक रहे और राज्य सरकार में मंत्री भी रहे। उनके निधन के बाद रालोद ने उनके बेटे अहमद हमीद को इस बार टिकट दिया है। जबकि भाजपा ने अपने मौजूदा विधायक योगेश धामा को ही उतारा है। धामा जिला पंचायत अध्यक्ष रहे और 2017 में भाजपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़े। जाट समुदाय के धामा को अपने जिला पंचायत अध्यक्ष के प्रभाव के साथ-साथ 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे का फायदा मिला। जाट वोट में बिखराव से रालोद को नुकसान हुआ और बसपा के मुस्लिम प्रत्याशी की तरफ मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण का फायदा धामा को मिला। हिंदू वोट एकजुट होकर भाजपा के साथ चले गए। लेकिन इस बार यह सीट भी भाजपा के लिए आसान नहीं है। रालोद ने पिछली बार के बसपा प्रत्याशी रहे अहमद हमीद को इस बार अपना प्रत्याशी बनाया है। अहमद हमीद के साथ उनके पिता कौकब हमीद की विरासत है। प्रोफेसर स्नेहवीर की मानें तो इस बार जाट बड़ी संख्या में रालोद के साथ जाता दिख रहा है। ऊपर से मुस्लिम का साथ भी मिलता दिख रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि रालोद यहां वापसी कर पाती है या नहीं।

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