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विंटेज कारें चालू होते ही हुई फुस्स, कैसे होगा भारत भ्रमण ?

  • Updated on 2/16/2020

नई दिल्ली पी मार्कण्डेय/टीम डिजिटल। देश-विदेश की सैकड़ों साल पुरानी कारों का काफिला पूरे तामझाम के साथ जैसे ही निकला, चंद किलोमीटर चलते ही हांफने लगा। सौ से डेढ़ सौ साल पुरानी कारों और दो पहिया वाहन गुडग़ांव से मानेसर तक पहुंचने में ही खराब होने लगे। तकरीबन आधा दर्जन गाडिय़ों के इंजिन, टायर आदि में समस्या आई जिसे लेकर वाहन स्वामी परेशान दिखे। यही कारण है कि इन पुरानी गाडिय़ों के पार्ट-पुर्जे प्राप्त करना दुर्लभ है तो वहीं इसकी मरम्मत करने वाले जानकारों का भी अभाव है।

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भ्रमण पर है देश-विदेश के सौ साल पुरानी कारों का काफिला
हीरोहोंडा चौक फ्लाईओवर पर ही जहां साल 1950 की एक विंटेज गाड़ी खराब हो गई तो केरल से प्रतिभागी वाहन स्वामी परेशान दिखे। थोड़ा आगे बढ़ते ही करीब 80 साल पुरानी एक और विंटेज कार का पिछला पहिया ही उड़ गया जो कि पास से गुजरते एक वाहन में जा टकराया। जिससे कार का पहिया क्षतिग्रस्त हो गया। हांलाकि किसी को चोट नहीं आई लेकिन उसमें जज की भूमिका में बैठे एक विदेशी व्यक्ति से गुडग़ांव नंबर का वाहन चालक शिकवा शिकायत करता रहा। मानेसर तक पहुंचने में तकरीबन दर्जन भर गाडिय़ों की यही हालत रही जबकि 80 से 100 साल पुराने दो पहिया चालकों के प्रतिभागियों में से कई ने अपने दो पहिया को कार अथवा दूसरे वाहन में डालकर ले गए। जिससे सवाल खड़ा होता है कि आखिर ये गाडिय़ां देश के चार राज्यों में कैसे अपनी यात्रा पूरा कर पाएंगी।

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गुडग़ांव से मानेसर तक चंद किलोमीटर की दूरी तक पहुंचने में ही खराब होने लगे सौ साल पुराने वाहन
उल्लेखनीय है कि राजे-रजवाड़ों से लेकर फिरंगी दौर तक की सौ से डेढ़ सौ साल पुरानी कारों का काफीला गुडग़ांव से होते हुए देश के चार राज्यों में चार हजार किलोमीटर की यात्रा पर निकला है। इन कारों में 1901 और 1902 मॉडल की कारें मुंबई से आई है तो केरल, कर्नाटक, दिल्ली सहित विभिन्न प्रदेशों से गाडिय़ों ने हिस्सा लिया है। कुछ अत्यंत पुरानी कारें बेलजियम, फ्रांस, अमेरिका और अन्य देशों से शिकरत कर रही हैं। गुडग़ांव के लैजर वैली से शुरु होने वाले इस आयोजन को 21 गल सैल्यूट कांकर नाम दिया गया है जिनमें कुल 150 अत्यंत पुरानी कारों का काफीला निकल रहा है।

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कनॉट प्लेस से शुरु हुई कार रैली
आयोजन की शुरुआत 15 फरवरी को इंडिया गेट से विंटेज कार रैली निकाली गई जो कि लुटियंस दिल्ली की परिक्रमा करते हुए गोल्फ कोर्स और गुडग़ांव के लेजर वैली होते हुए भारत भ्रमण के लिए रवाना कर दी गई है। इन कारों में पोस्ट-वॉर यूरोपीय क्लाास, पोस्ट-वॉर अमेरिकन क्लाास, प्री-वॉर अमेरिकन क्लाास, प्रिजर्वेशन क्लास, एमजी क्लास, पेबेल बीच क्लास, जगुआर, और डेमलर क्लास रोल्स रॉयस क्लास, इंडियन हेरिटेज क्लास, क्लासिक फोक्सवैगन क्लास, बेंटले क्लास, एडवॢडयन क्लास सहित विभिन्न क्लास के लिए देशभर से दुर्लभ कारों को जुटाया गया है।

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महाराजा सिंधिया की बुलेट ने भी खींचा लोगों का ध्यान
राजे-रजवाड़े के दौर से लेकर खेतड़ी के महाराजा और देश-विदेश की विंटेज कारों के साथ ग्वालियर के महाराजा सिंधिया की बुलेट भी लोगों का ध्यान आकर्षित करती रही। विंटेज कारों के देश के चार राज्यों के भ्रमण अभियान में शामिल यह बुलेट महज डेढ़ फीट की है जिसे कभी दूसरे विश्वयुद्घ में अमेरिकी सेना ने प्रयोग किया था। इस बुलेट की खासियत है कि इसे सैनिक फोल्ड कर सकते थे और अपनी पीठ पर बांधकर पैरासूटस से आसमान से जमीन पर उतरते थे। विश्वयुद्घ के दौरान इसे जंगलों, रेतीली जमीन और पहाड़ी इलाकों में प्रयोग किया जाता था। इस बुलेेट के वर्तमान स्वामी दिल्ली निवासी आशीष शर्मा बताते हैं कि इसमें ईंधन की टंकी महज ढाई लीटर की है जो आसानी से तीस से चालीस किलोमीटर तक चल जाती है। बुलेट को स्टार्ट करने का तरीका भी अनोखा है कारण कि इसमें किक मारने अथवा सैल्फस्टार्टर जैसी सुविधा बनाई ही नहीं गई है। बल्कि इसे स्टार्ट करने के लिए बाईक को लेकर थोड़ी दूर दौडऩा पड़ता है जिसके बाद यह स्टार्ट हो जाती है।

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अमेरिका से महाराज सिंधिया ने खरीदी थी बुलेट
1939 में अमेरिका निर्मित इस बुलेट को देश की आजादी के समय ग्वालियर के महाराजा सिंधिया ने खरीदी थी। इस बुलेट के वर्तमान स्वामी दिल्ली निवासी आशीष शर्मा बताते हैं कि दूसरे विश्व युद्घ की समाप्ती के बाद शायद 1949 के आसपास ग्वालियर के महाराजा ने इसे अमेरिका से खरीदा था। जबकि यह बुलेट मेरे दादा जी ने महाराजा से महज 30 हजार रुपए में 1970 के आसपास खरीदी है। उनसे जब पूछा गया कि क्या आज भी आप इसका प्रयोग करते हैं तो बोले जी हां करता हूं लेकिन अब इसके पार्ट-पुर्जे मिलने मुश्किल है। इसके टायर विदेश से ही मंगाना पड़ता है। जो महंगा होने के साथ ही रखरखाव कठिन है इसलिए शौकिया प्रयोग ही कर पाता हूं।

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