Monday, Aug 15, 2022
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राजनीति में कहां से आएंगे 'गुदड़ी के लाल', जमीनी नेता तैयार करते रहे छात्र संघ चुनाव, अब पाबंदी

  • Updated on 1/15/2022

नई दिल्ली/शेषमणि शुक्ल। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हो रहा है, लेकिन बीते कई साल से सूबे में छात्र संघ चुनावों पर पाबंदी है। जबकि छात्र संघों से ही निकले कई चेहरे देश के सर्वोच्च पदों को सुशोभित कर चुके हैं। कुछ तो अभी भी हैं। छात्र संघ चुनावों को राजनीतिक की नर्सरी कहा जाता है, जिनके माध्यम से सियासी दलों को ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले जमीनी नेता मिलते रहे हैं। अब ऐसे नेताओं की भागीदारी भी सियासी दलों में कम ही दिख रही है। शायद इसी के चलते युवाओं से जुड़े मुद्दे भी कहीं नेपथ्य में खोते जा रहे हैं।

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में 2017 के बाद से छात्र संघों के चुनाव नहीं हुए हैं। एक वक्त भारत का ऑक्सफोर्ड कहा जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भी 2019 के बाद छात्र संघ के चुनाव नहीं हुए। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में तो नब्बे के दशक से ही छात्र संघ चुनावों पर पाबंदी है। चुनाव की मांग को लेकर छात्रों का आंदोलन हुआ तो पुलिस ने लाठियां भांजी और तमाम मुकदमे लाद दिए। पीडि़त छात्र आज भी अदालतों के चक्कर काट रहे हैं। इन सबका नुकसान यह हुआ कि युवा से जुड़े मुद्दे नेपथ्य में कहीं खोते जा रहे हैं। नुकसान सियासी दलों को भी हो रहा है। 

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छात्र संघ चुनाव राजनीति की नर्सरी है। इस नर्सरी में जमीनी नेता तैयार होते हैं, जो गांवों से निकल कर आते हैं। टिकट वितरण में जमीनी नेता ढूढऩा सियासी दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। कांग्रेस से जुड़े बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता राम प्रकाश ओझा का कहना है कि छात्र संघ चुनाव पर रोक तो होनी ही नहीं चाहिए। इस पर पाबंदियां लगाने से आम ग्रामीण के लिए सियासत का रास्ता बंद होता है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ के उपाध्यक्ष रहे समाजवादी पार्टी के नेता डॉ. निर्भय सिंह पटेल का कहना है कि छात्र संघ चुनावों पर पाबंदी के दूरगामी परिणाम होने वाले हैं। इससे सैद्धांतिक और वैचारिक राजनीति कमजोर हो जाएगी। पटेल का कहना है कि छात्र राजनीति का लंबा इतिहास है। आजादी की लड़ाई से लेकर आईएएस परीक्षा की आयु सीमा और अवसर बढ़ाने, पीसीएस की परीक्षा में अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म करने जैसे तमाम मसले छात्रों ने उठाए और सरकार को मानना पड़ा।

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ की 2015 में अध्यक्ष रही ऋचा सिंह का कहना है कि छात्र राजनीति सरकारों और विश्वविद्यालय प्रबंधन पर अंकुश का काम करती है। लेकिन सूबे की मौजूदा सरकार को ऐसे अंकुश बर्दाश्त नहीं। सरकार नहीं चाहती कि कोई उससे सवाल करे। यह न केवल देश और समाज के लिए दिक्कत पैदा करने वाला है, बल्कि सियासी दलों को भी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। 2016-17 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रहे रोहित मिश्रा का कहना है कि हमने एक रुपये की पर्ची से अपने लोगों का इलाज करवाया है। हमें पता है एक रुपये की कीमत। अगर जमीन से जुड़े युवा राजनीति की मुख्यधारा में नहीं पहुंच सकेंगे तो नेताओं के बच्चे ही आगे बढ़ंगे। बाहुबली अपने धनबल और जनबल पर टिकट लेकर विधानसभा-लोकसभा पहुंचेगा। ऐसे लोग आम जनता की समस्या कैसे समझेंगे।

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चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ से जुड़े एनएएस डिग्री कॉलेज छात्र संघ के 2012 में अध्यक्ष रहे जयराज का कहना है कि छात्र दलगत सियासत से अलग रहते हुए विचारों और सिद्धांतों की सियासत करता है। रोजगार हो, महंगाई हो या फिर अन्य कोई मुद्दा, छात्र मुखरता से अपनी आवाज उठाते रहे हैं। अब ये आवाजें पहले तो सुनाई नहीं देतीं और अगर कुछ सीमित आवाज उठती भी है तो सरकार-प्रशासन उन्हें आसानी से दबा देता है। 

राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री रहे छात्र संघों से निकले नेता
छात्र संघों से निकले नेता देश के सर्वोच्च पदों तक पहुंचे हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से निकले डॉ शंकर दयाल शर्मा देश के राष्ट्रपति रहे। वी.पी. सिंह, चंद्र शेखर और गुलजारी लाल नंदा प्रधानमंत्री रहे। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे एन.डी. तिवारी स्वतंत्रता के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पहले छात्र संघ के अध्यक्ष रहे। ये सभी वैचारिक और सैद्धांतिक राजनीति के पुरोधा रहे। मौजूदा केंद्र सरकार में भी कई नेता हैं, जो छात्र राजनीति से निकल कर आए हैं। इसमें सबसे अहम नाम रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का ही है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) में रहे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा हों, प्रकाश जावड़ेकर, धर्मेंद्र प्रधान, राधा मोहन सिंह, रवि शंकर प्रसाद या फिर दिवंगत नेता अरुण जेतली और अनंत कुमार रहे हों, ये सभी भी छात्र राजनीति से ही निकल कर आए।

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