Monday, Oct 25, 2021
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सरकार से बातचीत के बाद कृषि कानूनों के समर्थन में उतरा शेतकारी संगठन, जानें क्या हैं इसका इतिहास

  • Updated on 12/17/2020

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। तीन नए कृषि बिल (Farm Bill) के खिलाफ आंदोलन कर रहे किसानों का प्रदर्शन लगातार बढ़ता जा रहा है। सरकार के साथ बात न बनने के बाद अब किसान भूख हड़ताल बढ़ाने की बात करने लगे हैं तो वहीँ, कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से कुछ किसान संगठनों ने मुलाकात की और फिर नए कृषि कानूनों का समर्थन किया। 

नए कृषि कानून का समर्थन करने वालों में शेतकारी संगठन भी शामिल है। यह संगठन चर्चित किसान नेता रहे शरद जोशी का संगठन है जो महाराष्ट्र का है। शरद जोशी किसानों के मुद्दे पर काम करने से पहले यूनाइटेड नैशन्स स्विट्जरलैंड में काम करते थे।

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शेतकारी संगठन का जन्म 
शरद जोशी ने भारत आकर पुणे जिले में खेड़ तालुका के पास जमीन खरीदी और फिर वहीँ किसानी करने लगे। जोशी के संगठन का जन्म 1979 में तब हुआ था जब प्याज की अच्छी कीमत मांग रहे किसानों ने पुणे-नासिक हाइवे को जाम करते हुए सड़कों पर प्याज फेंक दी थी। इसी आंदोलन में ही शेतकारी संगठन का जन्म हुआ।

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मोनोपॉली के खिलाफ लड़ाई 
जोशी ने कॉटन यानि सूती कपड़े को वर्ष 1984 में महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव कॉटन मार्केटिंग फेडरेशन की मोनोपॉली के खिलाफ लड़ाई छेड़ी थी। उस समय सिर्फ फेडरेशन ही रूई को खरीद पाता था। जबकि किसानों को अपने उत्पाद को बेचने के लिए कई दिनों तक लाइन लगानी पड़ती थी। इस फेडरेशन पर भ्रष्टाचार के भी आरोप लगाए गए थे। इसी के लिए विरोध प्रदर्शन करते हुए जोशी के संगठन ने किसानों के साथ मिलाकर हाइवे जाम किया और रेलवे ट्रैक पर प्रदर्शन किए थे। 

उनकी मांग थी कि कॉटन के प्रोक्योरमेंट में राज्य का एकाधिकार और गन्ने की अच्छी कीमत किसानों को मिले। उनका आंदोलन उस वक़्त सफल हुआ था और सरकार को आख़िरकार कानून वापस लेना पड़ा था।

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किसानों के पक्षधर हैं जोशी 
शरद जोशी ने किसानों का साथ देने का हमेशा पक्ष लिया है और उनका मानना रहा है कि जब तक गांव का किसान अपनी समस्याओं को शहर में जाकर नहीं उठाया जाएगा तब तक इसका समाधान नहीं निकल सकेगा। इसलिए भी जोशी का संगठन विरोध प्रदर्शन शहरी इलाकों में करता था और इससे वहां का जनजीवन प्रभावित होता था। 

जोशी का कहना था कि किसानों की बाजारों तक सीमित पहुंच ही बड़ी समस्या का कारण है। जबकि होना तो यह चाहिए कि बाजार खुले होने चाहिए और किसानों के उत्पाद की सही कीमत के लिए यहां संघर्ष होना चाहिए। वो मानते हैं कि सरकार ग्राहकों को सस्ते में सामान देने के लिए और अपने फायदे के लिए जानकर किसानों की फसल की कीमत कम कर देती है।

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